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उमेशचंद्र बैनर्जी का जीवन परिचय हिन्दी में

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कांग्रेस के सर्वप्रथम सभापतित्व का गौरव जिन्हें प्राप्त हुआ वह उमेशचन्द्र बनर्जी अपने समय के एक विशिष्ठ पुरुष थे। आपका व्यक्तित्व विलक्षण था। दिसम्बर 1844 में खिदिरपुर ( बंगाल ) में उमेशचंद्र बैनर्जी का जन्म हुआ और 26 जुलाई 1906 को  इंग्लैंड में देहावसान। स्वदेश विदेश का यह सम्मिश्रण न केवल आपके जन्म-मरण मे बल्कि सारे जीवन क्रम मे मिलता है।   उमेशचंद्र बैनर्जी का जीवन परिचय हिन्दी में   जिस कुटुम्ब मे उमेशचंद्र बैनर्जी का जन्म हुआ उसे वकीलो का घराना कहा जा सकता हैं। उमेशचंद्र बैनर्जी के न केवल पिता किन्तु पितामह बाबू पीताम्बर बैनर्जी भी एटर्नी थे। उमेश बाबू अपने पिता बाबू गिरीशचन्द्र बनर्जी के द्वितीय पृत्र थे। ओरियएंटल समिनरी ओर हिन्दू स्कूल में आपकी पढ़ाई हुई लेकिन 17 वर्ष की उम्र होते-होते जब मैट्रिक की परीक्षा निकट आई तो पिता ने स्कूल छुड़ा दिया। स्कूल छुड़ाकर आप डब्लू० पी० डाउनिंग नामक एटर्नी के यहां कलर्क रखे गये। वहां आप एक साल से अधिक नहीं रहे और डब्लू० एफ० गैलेणडर्स के यहां चले गये जहां दस्तावेज और दलील तैयार करने मे काफ़ी प्रवीणता प्राप्त की। उसके बाद 1864 में ...

बदरुद्दीन तैयबजी कौन थे और उनका जीवन परिचय

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बदरुद्दीन तैयबजी 8 अक्टूबर 1844 को एक सम्मानित अरबी घराने में जो बहुत समय से  बम्बई आ बसा था, पैदा हुए थे। बदरुद्दीन तैयब के पिता तैयबजी भाई मियां एक समृद्ध व्यापारी ओर सूरुचि वाले सुसंस्कृत व्यक्ति थे।   बदरुद्दीन तैयबजी का जीवन परिचय हिन्दी में   बचपन मे उर्दू फारसी की शिक्षा आपने दादा मखरा के मदरसे में प्राप्त की। फिर एलफिस्टन इंस्टीट्यूशन ( अब कालेज ) में भर्ती हुए, पर वहां ज्यादा नहीं रहे। आंख के इलाज के लिए पिता ने आपको फ्रांस भेज दिया, वहां से इंग्लैंड गये और लन्दन के न्यूबरी हाईपार्क कालेज में भर्ती हुए। वहां लन्दन यूनिवर्सिटी से मैट्रिक पास किया, पर तन्दुरुसती खराब होने के कारण उसके बाद शीघ्र ही हिन्दुस्तान लौट आये। एक साल यहां रहकर 1865 में फिर इंग्लैंड गये और अप्रैल 1867 में बेरिस्टरी पास की। नवम्बर 1867 में भारत लौटे और दिसम्बर में बम्बई हाईकोर्ट के एडवोकेट बन गये यही आपके भाई कमरूद्दीन तैयबजी एटर्नी थे, जिससे आपका बड़ी सुविधा रही। अपनी योग्यता से, खासकर जिरह में, आपने बहुत ख्याति प्राप्त की।   बदरुद्दीन तैयबजी   बेरिस्टरी शुरू करने के बाद पहले दस व...

जॉर्ज यूल का जीवन परिचय हिन्दी में

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जॉर्ज यूल पहले अंग्रेज थे, जिनको भारत की महान राष्ट्रीय संस्था के सभापति के सर्वोच्च सम्मान के आसन पर बिठाया गया था। उस समय सरकार की कांग्रेस के साथ सहानुभूति नहीं रही थी और सरकारी अधिकारी कांग्रेस को संदेह की दृष्टि से देखने लग गये थे। संयुक्त प्रान्त के लेफ्टिनेट-गवर्नर आकलैण्ड कॉलविन कांग्रेस से सहानुभूति रखने को आग से खेलने की उपमा दे चुके थे। ऐसे समय जॉर्ज यूल का अंग्रेज होकर सबसे पहले कांग्रेस का सभापतित्व स्वीकार करना असाधारण बात थी।   जॉर्ज यूल का जीवन परिचय हिन्दी में   जॉर्ज यूल कलकत्ते में व्यापार करने वाली एक प्रसिद्ध अंग्रेज़ी फर्म के प्रमुख साझीदार थे। शुरू से ही भारतीय विषयों में आप बहुत रुची रखते थे। आप भारत और  इंग्लैंड दोनों देशों में सरकारी अधिकारियों के सामने भारतीय प्रश्नों को उपस्थित करते रहते थे। आपका कहना था कि भारतवर्ष का शासन उस योग्यता ओर उत्तमता से नहीं होता, जिससे होना चाहिए। आपने अंग्रेज़ जनता को यह समझाने का बहुत प्रयत्न किया कि भारतीयों और उनके हितो की उपेक्षा से काम नहीं चलेगा।   भारत के सम्बन्ध में लगातार प्रचार और सवाओं के उपलक्ष्य...

फिरोजशाह मेहता बायोग्राफी इन हिन्दी

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सर फिरोजशाह मेहता उन व्यक्तियों में से हैं जिनका हाथ कांग्रेस की स्थापना में था ओर जिनका कांग्रेस की नीति ओर कार्यक्रम के निर्माण में बहुत प्रमुख भाग रहा है। आप बहुत मेधावी, ऊंचे दर्जे के वक्ता और खूब कमाने व खुले हाथों खर्च करने वाले शाही आदमी थे।   फिरोजशाह मेहता का जीवन परिचय हिन्दी में   4 अगस्त 1845 को बम्बई के एक पारसी परिवार में फिरोजशाह मेहता जन्म हुआ था। आपके पिता एक बड़े भारी व्यापारी थे। बुद्धि आपकी बचपन से ही बड़ी कुशाग्र थी। 1861 में मैट्रिक किया, 1864 में बी० ए० हुए, और छः मास बाद ही एम० ए० भी हो गये। फिर बेरिस्टरी के लिए इंग्लैंड गये और तीन साल बाद बैरिस्टर होकर बम्बई लौटे। थोड़े ही दिनो में आपकी बेरिस्टरी चमक उठी। फौजदारी के मामलों में आप उच्च श्रेणी के बैरिस्टर गिने जाने लगे और आमदनी इतनी बढ़ गई, जितनी कि मुम्बई तो क्या, कहते हैं कि, हिन्दूस्तान भर में और किसी वकील बैरिस्टर की नहीं थी।   इंग्लैंड  में जब पढ़ते थे तब दादाभाई नौरोजी का आप पर प्रभाव पड़ा, जिससे राजनैतिक कार्यों में रुचि हुईं। वही उमेशचन्द्र बनर्जी और मनमोहन घोष से मित्रता हुई, जिनक...

अलफ्रेड वेब का जीवन परिचय हिन्दी में

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पार्लियामेंट के जिन अंग्रेज सदस्यों ने भारत के शासन सुधार आन्दोलन में भाग लिया, उनमें अलफ्रेड वेब का भी एक स्थान है। अलफ्रेड वेब आयरलैंड के निवासी थे। आयरलैंड पर भी भारत की तरह  इंग्लैंड का शासन था और आयरलैंड सदियों से उसके शासन से मुक्त होने के लिए जी तोड़ परिश्रम कर रहा था। इस दृष्टि से  भारत और आयरलेंण्ड की समस्याएं एक थी। इसलिए स्वभावतः अलफ्रेड भारत की स्वाधीनता और उन्नति के मामलों में रुचि रखते थे।   अलफ्रेड वेब का जीवन परिचय हिन्दी में   कांग्रेस के प्रारम्भिक काल में दादाभाई नौरोजी आदि नेताओं का यह विश्वास था कि ब्रिटिश जनता और ब्रिटिश सरकार की न्याय-बुद्धि को अपील करने से भारत का कल्याण हो सकता है। इसलिए उन दिनों अधिकतर आन्दोलन इंग्लैंड में होता था, पार्लियामेंट के सदस्यों को भारतीय पक्ष का समर्थन करने के लिए प्रेरित किया जाता और उनकी सहानुभूति प्राप्त करने की कोशिश की जाती थी। अलफ्रेड वेब भी भारतीय मामलों में दिलचस्पी लेते थे, इसलिए सन् 1894 में अलफ्रेड वेब को कांग्रेस का सभापतित्व करने के लिए निमन्त्रित किया गया।     इसके बाद आयरिश मामलों में ही...

रहीमतुल्ला एम सयानी का जीवन परिचय हिन्दी में

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रहीमतुल्ला एम सयानी उन थोड़े से लोगो में से थे, जिनके व्यक्तित्व, अध्यवसाय, उदारता, विद्वता और जाति व देश की सेवाओं के कारण न केवल सब बातो में पिछड़ी हुई खोजा जाति में ही क्रान्ति हो गई, किन्तु राष्ट्र की सेवा भी कुछ कम नहीं हुई।   रहीमतुल्ला एम सयानी का जीवन परिचय हिन्दी में   रहीमतुल्ला एम सयानी का जन्म 4 अप्रैल 1847 को बम्बई में हुआ था। आपके दादा कच्छ से  बम्बई आये थे। आपने जब बम्बई में पढ़ाई शुरू की तब खोजा मुसलमानों की शिक्षा की ओर बिलकुल प्रवृत्ति न थी। शिक्षा से उन्हे यहां तक घृणा थी कि एक बार जब आप स्कूल जा रहे थे, कुछ खोजा ‘नास्तिक नास्तिक’ कहकर आपके पीछ दौड़े, और आप पर कुछ पत्थर भी फैके। इसी तरह एक बार चश्मा लगाने पर आपको तंग किया गया था। एलफ़िन्स्टन-स्कूल से मैट्रिक पास करके रहीमतुल्ला मुहम्मद सयानी उसी कालेज में दाखिल हो गये। 1866 मे जब आपने एम० ए० की परीक्षा दी, तब ही नहीं, किन्तु उसके पच्चीस साल बाद तक भी कोई मुसलमान खोजा एम० ए० नहीं बना था। इससे आपका विद्या-प्रेम प्रकट होता है।   रहीमतुल्ला एम सयानी   सन् 1870 में कानून की परीक्षा देकर वकालत करने...

सी शंकरन नायर का जीवन परिचय हिन्दी में

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सन् 1857 में जिस वर्ष उत्तर  भारत मे स्वतंत्रता की पहली लड़ाई लड़ी जा रही थी, उसी वर्ष दक्षिण भारत में सी शंकरन नायर का जन्म हुआ था। आपके पिता मद्रास प्रान्त की वानिक्कर नामक तहसील में तहसीलदार थे। आश्रय की बात है कि उनको अंग्रेज़ी का ज्ञान बिलकुल न था, लेकिन हिन्दी का अच्छा ज्ञान था। चितूर शंकरन नायर ने वानिक्कर में अपनी प्रारंभिक शिक्षा ग्रहण की। कुछ समय बाद पिता की कनानूर और कालिकट में क्रमशः बदली होने से सी शंकरन नायर भी साथ-साथ गये और वहां के स्कूलों में पढ़ते रहे। एफ० ए० पास करके  मद्रास के प्रेसिडेंसी कालेज में चले गये, जहां से 1879 में बी० ए० पास किया। कुछ समय बाद क़ानून की परीक्षा अत्यन्त योग्यता के साथ पास की। समस्त प्रान्त में पहले रहने के कारण आपकी योग्यता की धाक खूब जम गई। 1880 से आप मद्रास हाईकोर्ट में वकालत करने लगे। लेकिन कुछ ही महीनों बाद आपकी योग्यता से प्रभावित होकर सरकार ने आपको पोलाई का मुन्सिफ़ बना दिया। वहां आप इतने लोकप्रिय हो गये कि जब आपकी बदली हुई, तो लोगों ने देवालयों में आपके वापस आने की प्रार्थना की।   सी शंकरन नायर का जीवन परिचय हिन्दी में...

आनंद मोहन बोस का जीवन परिचय हिन्दी में

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आनंद मोहन बोस (वसु) जिन्को कांग्रेस बुजुर्गों की पंक्ति में पूर्वी बंगाल का चमकता हुआ सितारा कहा जाता है, कांग्रेस के ही एक महान पुरुष नहीं थे, बल्कि ब्रह्म-समाज के भी एक चोटी के नेता थे और बंगाल को न केवल राजनैतिक बल्कि सामाजिक, नैतिक एवं शिक्षा के लिए प्रेरणा देने में भी अग्रणी थे पूर्वी  बंगाल के मैमनसिंह जिले में 1846 में आनंद मोहन बोस का जन्म हुआ। बाल्यकाल का कोई विशेष ब्यौरा नहीं मिलता, पर यह तय है कि आप छोटी आयु से ही प्रतिभा-सम्पन्न थे।   आनंद मोहन बोस का जीवन परिचय हिन्दी में   प्रारम्भिक शिक्षा आपकी कलकत्ता में हुई और 16 वर्ष की अवस्था में 1862 में कलकत्ता-यूनिवर्सिटी की मैट्रिक परीक्षा में आप प्रथम रहे। एफ़० ए० और बी० ए० की परीक्षाओं में पास होने वाले विद्यार्थियों में आपका नम्बर सब से ऊपर रहा। एम० ए० की परीक्षा गणित में दी और उसमें भी सर्व प्रथम रहे। इससे उच्चाधिकारियो में खास कर यूनिवर्सिटी के तत्कालीन वाइस चान्सलर सर हेनरी समरनमैन के दिल में आपकी इज्ज़त बढ़ गई और साथ ही आपको 10000 रु०की रायचन्द्र प्रेमचन्द छात्रवृत्ति भी मिल गई। कुछ समय तक आनंद मोहन बोस प्र...

रमेश चन्द्र दत्त का जीवन परिचय हिन्दी में

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सार्वजनिक सेवा की सीढ़ी पर पेर रखकर सरकार द्वारा सम्मान पाने वाले तो बहुत व्यक्ति हुए हैं, लेकिन उन दिनों भारतीयों के लिए दुर्लभ कमिश्नर का ऊंचा पद पाकर सार्वजनिक सेवा के लिए उसे ठुकराने वाले श्री रमेश चन्द्र दत्त जैस व्यक्ति बिरले ही मिलेंगे।   रमेश चन्द्र दत्त का जीवन परिचय हिन्दी में   रमेश चन्द्र दत्त का जन्म कलकत्ता में 13 अगस्त 1848 को एक बहुत ही कुलीन परिवार में हुआ था। रमेशचन्द्र दत्त के पिता ईशान चन्द्र बंगाल में पहले भारतीय डिप्टी कलेक्टर थे। माता-पिता के देहान्त हो जाने के कारण रमेश चन्द्र दत्त अपने चाचा शशि चन्द्र दत्त की संरक्षकता में रहने लगे। ऐन्ट्रेंस पास होने से पहले ही आपका विवाह हो गया। एफ० ए० पास कर चुकने के बाद आपकी इच्छा लंदन जाकर सिविल सर्विस की परीक्षा देने की थी, लेकिन चाचा इससे सहमत न थे। इसलिए आप भाग कर बम्बई पहुंचे और उस जहाज़ पर सवार हुए, जिस पर सुरेन्द्रनाथ बनर्जी सिविल सर्विस की परीक्षा देने के लिए इंग्लैंड जा रहे थे। सिविल सर्विस की परीक्षा बड़ी शान के साथ पास कर रमेश चन्द्र दत्त 1871 में भारत वापिस आ गये।   1871 से 1892 तक 21 साल तक आप बंग...

नारायण गणेश चंदावरकर का जीवन परिचय हिन्दी में

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सर नारायण गणेश चंदावरकर का जन्म उत्तरी  कर्नाटक के हनोवर शहर में रहने वाले एक संभ्रान्त परिवार में 1855 में हुआ था। अपने शहर और जिले के स्कूलों में कुछ साल पढ़ने के बाद 1869 में वह बम्बई चले गये और 1873 में एलर्फिस्टन कालेज में भर्ती हो गये। अपनी प्रतिभा और योग्यता के कारण वहां के प्रोफ़ेसर के कृपा पात्र होने में आपको अधिक समय नहीं लगा। समाज सुधार, देश-भक्ति, सार्वजनिक सेवा आदि की भावना आपके हृदय में कालेज जीवन में ही पैदा हो चुकी थी।   नारायण गणेश चंदावरकर का जीवन परिचय हिन्दी में   सन् 1877 में बी० ए० पास करके आप“इन्दुप्रकाश” के अंग्रेज़ी कालमों का सम्पादन करने लगे। दो साल बाद सम्पादन छोड़कर आपने कानून पढ़ना शुरू किया और 1881 में वकालत की परीक्षा दी। हाईकोर्ट में आपकी प्रतिभा खूब चमकी और शीघ्र ही ऊंची कोटि के वकीलों में गिने जाने लगे। वकालत के साथ ही सार्वजनिक जीवन में आपका प्रवेश हुआ। नारायण गणेश चंदावरकर को सार्वजनिक जीवन में आए थोड़ा ही समय हुआ था। उन दिनों की परिपाटी के अनुसार जब 1885 में पार्लिमेन्ट के चुनाव के समय इंग्लैंड की जनता के सामने भारतीय समस्याओं को रखने...

दिनशा वाचा का जीवन परिचय - दिनशा ईदलजी वाचा

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फारस से निकाली जाकर भारत में आ बसने वाली पारसी जाति ने उन्नीसवीं सदी के अन्त में एक साथ तीन महा पुरुषों को जन्म देकर उस ऋण को अदा किया है, जो भारत में बसने के नाते उस पर चढ़ा हुआ था।  भारत के वृद्ध पितामह दादाभाई नौरोजी, बम्बई के बेताज बादशाह फिरोजशाह मेहता और अर्थशास्त्र के महा पंडित दिनशा वाचा का नाम इस सम्बन्ध से सदा याद किया जाता रहेगा।   दिनशा वाचा का जीवन परिचय हिन्दी में   दिनशा वाचा का पूरा नाम दिनशा ईदलजी वाचा था। दिनशा वाचा का जन्म 2 अगस्त 1844 को बम्बई मे हुआ था। एलफिंस्टन इंस्टिट्यूट में प्रारम्भिक शिक्षा प्राप्त करके आप 1858 में उसी कालेज में भर्ती हो गये। विद्यार्थी जीवन में आपकी योग्यता और उत्तम स्वभाव के कारण आप अन्य विद्यार्थियो की अपेक्षा सभी अध्यापकों के बहुत अधिक प्रिय थे। अपने व्यापारिक कार्य में सहायता लेने के लिए आपको पिता ने कालेज से जल्दी ही उठा लिया। पिता के साथ कार्य करते हुए आपने अर्थशास्त्र का जो व्यावहारिक ज्ञान प्रात्त किया, वह आपके बहुत काम आया। उस समय अर्थशास्त्र में आपकी ऐसी रुचि पैदा हुई कि उसमें पंडित्य प्रात्त करके सरकार की आर्थिक नीत...

सुरेंद्रनाथ बनर्जी का जीवन परिचय हिन्दी में

सुरेंद्रनाथ बनर्जी का नाम किसने नहीं सुना, हिमालय से कन्याकुमारी तक और सिन्ध से आसाम तक, किसी समय बंगाल के इस शेर की आवाज गूंजती रही है। यही नहीं बल्कि  भारत में कांग्रेस के मंच से उठी आपकी बुलन्द आवाज सभ्य संसार के दूर-दूर के कोने तक पहुंचती थी। भाषा-प्रभुत्व, रचना-नेपुण्य, कल्पना-प्रवणता, उच्च भावुकता, वीरोचित हुंकार, डा० पट्टाभि सीतारामैया के शब्दों में, “इन गुणों में आपकी वक्त॒त्व-कला को पराजित करना कठिन है, आज भी कोई आपकी समता तो क्या, आपके निकट भी नहीं पहुँच सकता।   सुरेंद्रनाथ बनर्जी का जीवन परिचय हिन्दी में शिक्षा कलकत्ता के एक कुलीन ब्राह्मण परिवार में सन् 1848 में सुरेंद्रनाथ बनर्जी का जन्म हुआ था। सुरेंद्रनाथ बनर्जी के पिता बंगाल के उस समय के एक मशहूर एलोपैथ डाक्टर दुर्गाचरण बनर्जी थे, जिनके पांच पुत्रों में आप दूसरे पुत्र थे। शिक्षा-प्राप्ति के लिए पहले पाठशाला भेजा गया, फिर 7 वर्ष के होने पर डोवेटन-कालेज में भर्ती हुए, जो मुख्यतः एंग्लो-इण्डियनों की शिक्षा-संस्था है। 1863 में द्वितीय भाषा के रूप में लेटिन लेकर प्रथम श्रेणी में प्रवेशिका परीक्षा पास की और जूनियर छ...

लालमोहन घोष का जीवन परिचय हिन्दी में

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लालमोहन घोष कांग्रेस के मंच पर तो पहले-पहल छठे अधिवेशन ( कलकत्ता, 1890 ) में आये, जब कि आपने ब्रैडला साहब के भारत-सरकार-सम्बन्धी बिल पर प्रस्ताव उपस्थित किया था, किन्तु देश के लिए आप कांग्रेस के निर्माण से पहले से ही काम कर रहे थे। उससे पहले दो बार देश के मिशन पर ओर एक बार पार्लियामेंट की सदस्यता के लिए आप इंग्लैंड के चक्कर भी लगा चुके थे, जिसमें दो बार तो  भारत लौटने पर भारतीय जनता की ओर से सार्वजनिक सम्मान करके आपका आभार माना गया था ओर तीसरी बार जिस निर्वाचन-क्षेत्र से पार्लियामेंट की सदस्यता के लिए उम्मीदवार हुए थे उसके निर्वाचकों ने वहां से भारत के लिए, विदा होते समय आपको मानपत्र दिया था।   लालमोहन घोष का जीवन परिचय हिन्दी में   लालमोहन घोष का जन्म 17 दिसम्बर 1849 को कृष्णनगर ( बंगाल ) में हुआ था। आपके पिता रायबहादुर रामलोचन घोष ढाका-कालेज के संस्थापकों में से एक थे और बंगाल के न्याय-विभाग में तरक्क़ी करते हुए ख़ास सदर अमीन के औहदे तक जा पहुँच थे। लालमोहन घोष की प्रारम्भिक शिक्षा कलकत्ता में हुई और कलकत्ता यूनिवर्सिटी की एण्ट्रेन्स ( मेट्रिक ) परीक्षा में आप सारे प्र...

सर हेनरी कॉटन का जीवन परिचय हिन्दी में

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सर हेनरी कॉटन उन थोड़े से भारत हितैषी सह्रदय अंग्रेजों में ऊंचा स्थान रखते थे, जो सिविल सर्विस में रहकर भी भारत की वास्तविक उन्नति हृदय से चाहते थे और समय समय पर सरकार से तीव्र मतभेद प्रकट करते हुए उसकी नाराजगी और क्रोध की परवा नहीं करते थे।   सर हेनरी कॉटन का जीवन परिचय हिन्दी में   सर हेनरी कॉटन का जन्म 13 सितम्बर सन्‌ 1845 को तंजौर के एक गांव में हुआ था। सर हेनरी कॉटन के परिवार का संबन्ध भारत से बहुत पुराना था। सर हेनरी कॉटन के दादा कप्तान जोजेफ़ कॉटन ईस्ट इण्डिया कम्पनी में नौकर थे और बाद में उसके डारेक्टर हो गये। उनके पुत्र जान कॉटन भी तंजौर में कलक्टर रहे और बाद में डारेक्टर बना दिये गये। उनके पुत्र और हेनरी कॉटन के पिता जोजेफ़ जान कॉटन ने मद्रास की सिविल सर्विस में सन्‌ 1831 में प्रवेश किया और वहीं सर हेनरी कॉटन का जन्म हुआ। चक्रवर्ती विजयराघवाचार्य का जीवन परिचय हिन्दी में आक्सफोर्ड और  लंदन के किंग्स कालेज में सर हेनरी कॉटन ने उच्च शिक्षा प्राप्त की। 1867 में सिविल सर्विस की परीक्षा देकर भारत आये और 22 वर्ष की आयु में मिदनापुर जिले के असिस्टैंट मजिस्ट्रेट नियुक्...

विलियम वेडरबर्न का जीवन परिचय हिन्दी में

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भारत हितैषी सर विलियम वेडरबर्न, गोपाल कृष्ण गोखले के शब्दों में अत्यन्त आदरणीय व्यक्ति और आधुनिक ऋषि थे। उनकी दृष्टि में आपका व्यक्तित्व इतना महान, उत्साहप्रद और स्फूर्ति-दायक था कि उसका वर्णन लेखनी या वाणी से नहीं किया जा सकता। प्रेम, सम्मान और श्रृद्धा का वह विषय है। निस्तब्ध, शान्त या मौन रह कर उसका चिन्तन किया जाना चाहिए। इसमें अतिशयोक्ति बिलकुल भी नहीं है। आधी शताब्दी तक निरन्तर भारत की निःस्वार्थ सेवा करने वाले कांग्रेस के संस्थापक इस महापुरुष के यथार्थ स्वरूप को अभिव्यक्ति करने के लिए महादेव गोविन्द रानाडे ने भी ठीक ही कहा था कि “जितने अंग्रेज़ों से उनका परिचय हुआ, उनमें से कोई भी सर विलियम वेडरबर्न के साथ खड़ा नहीं किया जा सकता।”   सर विलियम वेडरबर्न का जीवन परिचय हिन्दी में   विलियम वेडरबर्न का जन्म ग्लोसैस्टर शायर ( इंग्लैंड ) में 25 मार्च 1836 को हुआ था। अपने अनेक सम्बन्धियों के समान आपने भी एडिनबरा यूनिवर्सिटी में शिक्षा प्राप्त कर इण्डियन सिविल सर्विस की परीक्षा दी, और उसमें सफल हो 25 नवम्बर 1860 को बम्बई प्रान्त की सिविल-सर्विस में प्रवेश किया।   1860 से 188...