सी शंकरन नायर का जीवन परिचय हिन्दी में
सन् 1857 में जिस वर्ष उत्तर भारत मे स्वतंत्रता की पहली लड़ाई लड़ी जा रही थी, उसी वर्ष दक्षिण भारत में सी शंकरन नायर का जन्म हुआ था। आपके पिता मद्रास प्रान्त की वानिक्कर नामक तहसील में तहसीलदार थे। आश्रय की बात है कि उनको अंग्रेज़ी का ज्ञान बिलकुल न था, लेकिन हिन्दी का अच्छा ज्ञान था। चितूर शंकरन नायर ने वानिक्कर में अपनी प्रारंभिक शिक्षा ग्रहण की। कुछ समय बाद पिता की कनानूर और कालिकट में क्रमशः बदली होने से सी शंकरन नायर भी साथ-साथ गये और वहां के स्कूलों में पढ़ते रहे। एफ० ए० पास करके मद्रास के प्रेसिडेंसी कालेज में चले गये, जहां से 1879 में बी० ए० पास किया। कुछ समय बाद क़ानून की परीक्षा अत्यन्त योग्यता के साथ पास की। समस्त प्रान्त में पहले रहने के कारण आपकी योग्यता की धाक खूब जम गई। 1880 से आप मद्रास हाईकोर्ट में वकालत करने लगे। लेकिन कुछ ही महीनों बाद आपकी योग्यता से प्रभावित होकर सरकार ने आपको पोलाई का मुन्सिफ़ बना दिया। वहां आप इतने लोकप्रिय हो गये कि जब आपकी बदली हुई, तो लोगों ने देवालयों में आपके वापस आने की प्रार्थना की।
सी शंकरन नायर का जीवन परिचय हिन्दी में
कुछ समय मुन्सिफ़ी करने के बाद आपने फिर वकालत शुरु कर दी ओर क़ानून की बारीकियों को समझने और योग्यता पूर्वक बहस करने के कारण आप पर चांदी की वर्षा होने लगी। हाईकोर्ट के जज सर चार्ल्स टनर ने तो आपकी सूक्ष्म प्रतिभा पर मुग्ध हो आपको तत्वदर्शी न्याय वेत्ता कहना शुरू कर दिया। 1884 में लगान-संबंधी कमीशन के सदस्य की हैसियत से आपने किसानों का पक्ष इतनी योग्यता व दृढ़ता से रखा कि आप साधारण जनता में भी लोकप्रिय हो गये और किसान सी शंकरन नायर को अपना हितैषी मानने लगे।

सार्वजनिक जीवन में आपका वकालत के साथ ही प्रवेश हो चुका था। आप सभी दिशाओं में चमकने लगे थे। सन् 1885 में आप स्टेचुटरी सिविल सर्विस में नियुक्त हुए और सन् 1889 में आप मद्रास यूनिवर्सिटी के फैलो बनाये गये। सन् 1890 में आप मदरास लैजिस्लेटिव कौंसिल के सदस्य नियुक्त हुए। ‘विलेज सर्विस बिल” आपके विरोध के कारण ही रह गया। मलाबार मैरिज एक्ट के निर्माण में आपने प्रमुख भाग लिया। कौंसिल विधान में आपने एक बहुत महत्वपूर्ण परिवर्तन कराया। वह यह कि कौंसिल में पेश होने से पहिले बिल की प्रतियां सरकारी और गैर सरकारी सदस्यों में बांटी जाने लगीं। कुछ दिनों तक सी शंकरन नायर मद्रास ला जरनल और ‘मद्रास रिव्यू’ पत्रों के सम्पादक भी रहे।
यह असंभव था कि इतना कुशाग्र बुद्धि, प्रतिभा सम्पन्न व्यक्ति देश के राष्ट्रीय जीवन की ओर न जाता। कांग्रेस के जन्मकाल से ही आप राजनैतिक आन्दोलन में सहयोग देने लगे थे। 1897 में न केवल आप प्रान्तीय कान्फ्रेंस के सभापति चुने गये, लेकिन अमरावती में होने वाले कांग्रेस के अधिवेशन के भी सभापति बनाये गये। अपने भाषण में आपने तत्कालीन स्थिति का बड़े साहस के साथ स्पष्ट विवेचन और विश्लेषण करते हुए सरकारी नीति की खूब आलोचना की। आपने बहुत ही स्पष्ट शब्दों में कहा कि “यह सच है कि अंग्रेज़ी राज्य ने बहुत उपकार किये हैं, उनके चले जाने से देश में अराजकता फैल जायगी, रूस और फ्रांस भी हमला करेंगे, लेकिन इन सबका यह अर्थ नहीं है कि हमें राष्ट्रीय स्वतंत्रता न दी जाये। केवल इसे प्राप्त करने की आशा ही इंग्लैंड और भारत के संबन्ध को कायम रख सकती है।” बहुत समय तक आप कांग्रेस के कार्यों में क्रियात्मक भाग लेते रहे।
वस्तुतः आप अपने समय में एक ताक़त थे। डील-डोल में जैसे बड़े थे, वैसे ही दिमागी लियाक़त में भी बड़े होने से उन दिनों के कांग्रेसी नेताओं में आपका स्थान बहुत ऊंचा था। कांग्रेस के अलावा समाज सुधार के आन्दोलन में भी आप बहुत भाग लेते रहे। सी शंकरन नायर का यह स्पष्ट मत था कि विद्यार्थियों को राजनीति में अवश्य भाग लेना चाहिए। 1908 में आप सोशल कान्फ्रेंस के सभापति बनाये गये।
प्रतिभा बुद्धि के इस पुज पर सरकार की दृष्टि पड़नी आवश्यक थी और उन दिनों के अन्य अनेक राजनैतिक नेताओं के समान आप भी पहले एडवोकेट जनरल और बाद में हाईकोर्ट के जज बना दिये गये। आप अस्थायी तौर पर तीन बार जज बनाये गये और 1908 में आपको स्थायी तौर पर जज बना दिया गया। इससे कांग्रेस और देश के सार्वजनिक जीवन से आपका संबंध टूट गया। 1915 में आप वाइसराय की कायकारिणी के शिक्षा सदस्य बना दिये गये। इस पद पर रहते हुए आपने स्त्री शिक्षा के लिए काफ़ी प्रयत्न किया। सरकारी पिंजरे में बंद रहते हुए भी आपकी आत्मा स्वतंत्रता के वातावरण में उड़ने के लिए हमेशा उत्सुक रहती थी। 1919 में माण्टफोर्ड स्कीम पर भारत सरकार के अधिकांश विचारों से आप असहमत थे और उस के खरीतों में आपके असहमति सूचक नोट बहुत योग्यता के साथ लिखे गये थे। भारत सरकार के साथ आपका मतभेद बढ़़ता गया और समय आया कि भारत सरकार के पिंजरे से आप बाहर हो गये।
1919 में जलियांवाला बाग की दुर्घटना हो चुकी थी पंजाब में मार्शल ला कायम था, सरकार निरंकुशता का नंगा नाच नाच रही थी। सी शंकरन नायर ने उसका प्रतिवाद किया, लेकिन सफलता न मिलने पर उस के प्रतिवाद-स्वरूप इतने ऊंचे पद से 19 जुलाई 1919 को इस्तीफ़ा दे दिया , इससे आपकी लोकप्रियता खूब बढ़ गई , कांग्रेस ने एक प्रस्ताव द्वारा आपको बधाई दी और कांग्रेस कमेटी ने इंग्लैंड जाकर पंजाब-हत्याकांड का मामला अंग्रेजों के सामने रखने की आपसे प्रार्थना की। 31 जुलाई को आप सुधारों के संबंध में गये हुए भारतीय डेपुटेशन को सहयोग देने के लिए इंग्लैंड को रवाना हो गये।
अपनी इस लोकप्रियता को आप अन्त तक न निभा सके। गांधी जी की असहयोग व सत्याग्रह की नीति से तीव्र मतभेद होने के कारण आपने गांधी और अराजकता नाम से एक पुस्तक लिखी। इससे आप जनता में बहुत अप्रिय हो गये। पंजाब गवर्नर ओडवायर पर भी इसमें छींटे उड़ाये गये थे, उसने मानहानि का दावा किया, जिसमें आपको तीन लाख रुपये हर्जाने के तौर पर देने पड़े थे।
सन् 1922 में आप फिर एक बार चमके। अहमदाबाद कांग्रेस में सामूहिक सत्याग्रह शुरू करने का निश्चय हो चुका था। गांधी जी डिक्टेटर नियत हो चुके थे। कुछ एक देश हितैषियों ने कांग्रेस व सरकार में समझौता कराने के लिए बम्बई में 16 जनवरी 1922 को सर्वदल सम्मेलन का आयोजन किया। उसका सभापति सी शंकरन नायर को बनाया गया था। सम्मेलन की उप समिति द्वारा स्वीकृत प्रस्ताव जब सम्मेलन में रखा गया,तब उससे असहमत होने के कारण आप सम्मेलन छोड़ कर चले गये। उसके बाद आप सार्वजनिक जीवन से विरक्त रहे।
कुछ वर्षों तक फिर आप कौंसिल आफ स्टेट के सदस्य रहे । 1928 में साइमन कमीशन के आने पर सारे देश के सब दलों ने उसका बहिष्कार किया, लेकिन आपने उससे सहयोग देने वाली भारतीय समिति का अध्यक्षपद स्वीकार कर लिया। इससे आप देश भर में अत्यन्त अप्रिय हो गये। नरम-दल ने भी जब उसका बहिष्कार कर दिया था, तब आपका उसमें सहयोग देना वास्तव में आश्चर्य की बात थी। सी शंकरन नायर का जीवन इसी तरह सहयोग और असहयोग की डांवाडोल स्थिर में गुज़रा है। कभी आप सरकार के प्रिय बने ओर कभी जनता के। न सरकारी पदों की ही लालसा सदा रही और न जनता के प्रेमपात्र बने रहने का ही निरन्तर यत्न किया। 24 अप्रैल 1934 को सी शंकरन नायर का देहावसान हुआ और प्रारम्भिक-काल से कांग्रेस के साथ सम्बन्ध रखने वाला एक वृद्ध महान पुरुष उठ गया।
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