रहीमतुल्ला एम सयानी का जीवन परिचय हिन्दी में
रहीमतुल्ला एम सयानी उन थोड़े से लोगो में से थे, जिनके व्यक्तित्व, अध्यवसाय, उदारता, विद्वता और जाति व देश की सेवाओं के कारण न केवल सब बातो में पिछड़ी हुई खोजा जाति में ही क्रान्ति हो गई, किन्तु राष्ट्र की सेवा भी कुछ कम नहीं हुई।
रहीमतुल्ला एम सयानी का जीवन परिचय हिन्दी में
रहीमतुल्ला एम सयानी का जन्म 4 अप्रैल 1847 को बम्बई में हुआ था। आपके दादा कच्छ से बम्बई आये थे। आपने जब बम्बई में पढ़ाई शुरू की तब खोजा मुसलमानों की शिक्षा की ओर बिलकुल प्रवृत्ति न थी। शिक्षा से उन्हे यहां तक घृणा थी कि एक बार जब आप स्कूल जा रहे थे, कुछ खोजा ‘नास्तिक नास्तिक’ कहकर आपके पीछ दौड़े, और आप पर कुछ पत्थर भी फैके। इसी तरह एक बार चश्मा लगाने पर आपको तंग किया गया था। एलफ़िन्स्टन-स्कूल से मैट्रिक पास करके रहीमतुल्ला मुहम्मद सयानी उसी कालेज में दाखिल हो गये। 1866 मे जब आपने एम० ए० की परीक्षा दी, तब ही नहीं, किन्तु उसके पच्चीस साल बाद तक भी कोई मुसलमान खोजा एम० ए० नहीं बना था। इससे आपका विद्या-प्रेम प्रकट होता है।

सन् 1870 में कानून की परीक्षा देकर वकालत करने लगे। 1878 में सालिसिटर हो गये। आप वकालत के साथ साथ कई प्रसिद्ध कम्पनियों में सालिसिटर का काम भी करते रहे। बम्बई के नागरिक जीवन में आप खूब दिलचस्पी लेते थे। 1876 में आप बम्बई कारपोरेशन के सदस्य चुने गये। तबसे आयु-पर्यन्त आप उसके सदस्य बने रहे। बम्बई की जनता के हित-कार्यो में आप काफी दिलचस्पी लेते थे। 1888 में आप कारपोरेशन के अध्यक्ष चुने गये। 1888 मे ही आप बम्बई-कौंसिल के सदस्य भी नियुक्त हुए। कौंसिल और कारपोरेशन के कार्यो के अलावा बम्बई के विभिन्न सार्वजनिक क्षेत्रों में भी बहुत। उत्साह से काम करने के कारण आपकी ख्याति बहुत बढ़ गई थी।
भारत राष्ट्र की दृष्टि से रहीमतुल्ला एम सयानी की सबसे बड़ी सेवा यह थी कि आप कांग्रेस के हमेशा समर्थक रहे। उन दिनों में मुसलमानों को कांग्रेस से अलग रखने का प्रयत्न बहुत जोरों के साथ किया जा रहा था। आपने उस प्रयत्न का तीव्र विरोध किया। इन सब सेवाओं के उपलक्ष्य में 1896 में कलकत्ता में रहीमतुल्ला एम सयानी कांग्रेस के सभापति बनाये गये। इस ऊंचे पद से आपने मुसलमानों से कांग्रेंस में रहने की ज़बरदस्त अपील की।
आप सुप्रीम लेजिस्लेटिंव कौंसिल के सदस्य भी नियत किये गये। कौंसिल में दिये गये आपके भाषण बहुत विद्धत्तापूर्ण होते थे। आपकी अन्य सेवाओं में सबसे बड़ी सेवा खोजा जाति की सेवा है। खोजा जाति में शिक्षा, व्यापार, व्यवसाय, सुधार की दिशाओ में आपके निरन्तर सक्रिय प्रयत्नों से क्रान्ति हो गई। 4 जून सन् 1902 को इस महान राष्ट्रीय नेता की मृत्यु हो गई।
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