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कॉमनवेल्थ गेम्स हिस्ट्री इन हिंदी -- राष्ट्रमंडल खेलों का इतिहास

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कॉमनवेल्थ गेम्स या राष्ट्रमंडल खेल विश्व का तीसरा बड़ा खेलोत्सव है। यह खेल उत्सव प्रत्येक चार वर्ष के बाद किसी भी राष्ट्रमंडलीय देश में आयोजित किया जाता है। राष्ट्रमंडल में ऐसे देश शामिल है जो कभी ब्रिटेन के उपनिवेश रहे है। अतः राष्ट्रमंडल खेलों में केवल वे ही खिलाड़ी भाग ले सकते है जो किसी भी राष्ट्रमंडलीय देश के निवासी हो। राष्ट्मंडल खेल उत्सव का शुरूआती नाम ब्रिटिश साम्राज्य खेल ( ब्रिटिश अम्पायर गेम्स ) है। इस खेल को शुरु करने का उद्देश्य मानवता, समानता और भाग्य की आजमाइश था। इंग्लैंड में लंदन शहर में और यूनाइटेड किंगडम में इसका मुख्यालय स्थापित है। सन् 1930 में कनाडा के हेमिल्टन नामक नगर में प्रथम कॉमनवेल्थ गेम्स का आयोजन हुआ था। जिसे उस समय ब्रिटिश अम्पायर गेम्स के नाम से जाना गया था। इन खेलों का यह नाम सन् 1954 तक प्रचलित रहा। इसके बाद सन् 1958 में इसका नाम बदलकर राष्ट्रमंडलीय खेल ( कॉमनवेल्थ गेम्स ) कर दिया गया। इससे पहले इन खेलों के पांच आयोजन ब्रिटिश अम्पायर के नाम से जाने गए और छठे खेल उत्सव से इस खेल के आयोजन को राष्ट्रमंडल खेल के नाम से जाना जाने लगा। सन् 1942 व सन् 1948...

एशियन कप हिस्ट्री इन हिन्दी - एशियाई खेलों का इतिहास

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एशियाड महाद्वीप के समस्त देशों को मिलाकर होने वाली महत्वपूर्ण खेल प्रतियोगिता एशियाड खेल के नाम से जानी जाती है । यह ओलम्पिक के बाद सम्पूर्ण विश्व में होने वाली दूसरी सबसे बड़ी खेल प्रतियोगिता है। जो एशियाई देशों के मध्य आपसी सौजन्य, सद्भावना एवं सांस्कृतिक आदान प्रदान के उद्देश्य को ध्यान में रखकर खेली जाती है। एशियन खेलों के नाम से भी जानी जाने वाली इस खेल प्रतियोगिता की शुरुआत 1951 में हुई थी। इस प्रतियोगिता के आयोजन को एशियन कप के नाम से संबोधित किया जाता है। एशियन कप हिस्ट्री इन हिन्दी भारत के भूतपूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय श्री जवाहर लाल नेहरू व एक अन्य खेल प्रेमी एंटनी डिमेला के प्रयासों से 1951 में ही नई दिल्ली में एशियाड कप का आयोजन प्रथम बार हुआ था। तब से प्रत्येक चार वर्ष के अंतराल में एशियाई खेलों का आयोजन होता है। 4 मार्च 1951 को दिल्ली के नेशनल स्टेडियम में आयोजित प्रथम एशियाई खेलों में 11 देशों के 2500 प्रतियोगी एवं अधिकारियों ने भाग लिया था। एशियाड खेलो का आयोजन खेल के इतिहास में एक नवीन क्रांति थी। इसने एशियाई देशों के मध्य एक नवीन खेल भावना का संचार किया। प्रथम एशियाड...

ओलंपिक खेल का इतिहास - ओलम्पिक गेम हिस्ट्री इन हिन्दी

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ओलंपिक खेल विश्व का सर्वाधिक प्रतिष्ठित खेल आयोजन है। इसे समर ओलंपिक भी कहा जाता है। किसी भी खिलाड़ी की यह सबसे बडी इच्छा होती है कि वह एक बार ही सही ओलंपिक खेलों का विजेता जरूर बने। सम्पूर्ण विश्व में खेल का मानक माना जाने वाला यह महत्वपूर्ण आयोजन प्रति पांच वर्ष के बाद होता है। और सम्पूर्ण विश्व के महानतम खिलाड़ी इस आयोजन में भाग लेते है। ओलंपिक खेलों की शुरूआत कैसे हुई ? यह एक विवाद का विषय हो सकता है, पर आम मान्यताओं के अनुसार इसका प्रारंभ ओलम्पिया नगर से हुआ माना जाता है। ओलम्पिया यूनान राज्य का एक नगर था। उस समय यूनान साहित्य, कला और संस्कृति का केंद्र था, इसलिए यदि यूनान में ओलंपिक का प्रारंभ किसी सांस्कृतिक उत्सव के रूप में हुआ हो तो उस पर अविश्वास नहीं किया जा सकता है। ओलंपिक खेलो के प्राचीन इतिहास के संबंध में यह मान्यता है कि स्पार्टा और एथेन्स में हुए भयानक युद्ध के नायक फिडीपीडीज की याद उस समय सबसे पहले ओलंपिक खेलों का आयोजन किया गया जो अनवरत चलता रहा। आधुनिक काल में सर्वप्रथम ओलंपिक खेलों का आयोजन सन् 1896 में यूनान में हुआ था। बरेन पियरे द कुवर्ते को इसका श्रेय दिया जाता...

मेजर ध्यानचंद हॉकी के जादूगर - मेजर ध्यानचंद की जीवनी

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हॉकी का जादूगर के नाम से प्रसिद्ध मेजर ध्यानचंद का जन्म इलाहाबाद में 29 अगस्त, 1905 में हुआ था। उनके पिता सेना में सुबेदार थे।वे कुशवाहा, मौर्य परिवार के थे, उनके पिता का नाम समेश्वर सिंह था, जो ब्रिटिश इंडियन आर्मी में एक सूबेदार के रूप कार्यरत थे, साथ ही होकी गेम खेला करते थे। ध्यानचंद के दो भाई थे, मूल सिंह एवं रूप सिंह। रूप सिंह भी ध्यानचंद की तरह हॉकी खेला करते थे, जो अच्छे खिलाड़ी थे। ध्यानचंद के पिता समेश्वर सिंह आर्मी में थे, जिस वजह से उनका तबादला आये दिन कही न कही होता रहता था। इस वजह से ध्यानचंद ने कक्षा छठवीं के बाद अपनी पढाई छोड़ दी, बाद में ध्यानचंद के पिता उत्तरप्रदेश के झाँसी में जा बसे थे। मेजर ध्यानचंद ने हॉकी को ख्याति के ऊचे शिखर तक पहुंचाया। उनकी अनछूई कला की बराबरी आज तक कोई नहीं कर सका। ध्यानचंद को केवल भारत ही नही विदेशों में भी हॉकी का जादूगर कहा जाता है। साधारण राजपूत परिवार से संबंध रखने वाले ध्यानचंद ने अभ्यास, लगन और संकल्प से सम्मान और प्रतिष्ठा अर्जित की और भारत के गौरव में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया है। 3 दिसंबर 1979 को मेजर ध्यानचंद की मृत्यु हो गई। अप...

कुवंर दिग्विजय सिंह की जीवनी -- हॉकी के महान खिलाड़ी दिग्विजय सिंह

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कुवंर दिग्विजय सिंह कौन थे? जी हां हॉकी खेल जगत में बाबू के नाम से प्रसिद्ध होने वाले खिलाडी कुवंर दिग्विजय सिंह एक महान खिलाड़ी थे। कुवंर दिग्विजय सिंह का जन्म 2 फरवरी 1922 को बाराबंकी उत्तर प्रदेश में हुआ था। उनका सारा परिवार ही खेल प्रेमी था। पिता स्वर्गीय श्री रायबहादुर रघुनाथ सिंह टेनिस के शौकीन थे। उनके बड़े भाई सुखदेव सिंह मोहन और कुवंर नरेश सिंह राजा भी खेलकूद में रूची रखते थे। ऐसे वातावरण में पढ़ाई के साथ साथ बाबू का खेलकूद में रूची रखना स्वाभाविक था। भारतीय हॉकी में ड्रिबलिंग और गजब की सूझबूझ के कारण बाबू समकालीन हॉकी के सर्वकालिक बादशाह थे, असल में मेजर ध्यानचंद युग के बाद बेहतरीन राइट इन होने के कारण बाबू हॉकी में एक मशहूर नाम है। लखनऊ के कान्यकुब्ज कॉलेज में उच्च शिक्षा प्राप्त करने के बाद बाबू 1938 में दिल्ली खेलने आ गए। किशोरावस्था में ही उन्होंने उत्तर प्रदेश से खेलना शुरू कर दिया था, और बीस साल 1939-59 तक राज्य का प्रतिनिधित्व किया। राष्ट्रीय टीम में कुवंर दिग्विजय सिंह ने 1946-47 में स्थान बना लिया था।   कुवंर दिग्विजय सिंह का जीवन परिचय 1949 के लंदन ओलंपिक में कु...

बलबीर सिंह की जीवनी - बलबीर सिंह हॉकी के प्रसिद्ध खिलाड़ी का जीवन परिचय

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बलबीर सिंह का जन्म 10अक्टूबर 1924 को हरीपुर, जालंधर पंजाब में हुआ था। प्रसिद्ध हॉकी खिलाड़ी बलबीर सिंह का नाम आज भी शीर्ष खिलाड़ियों में लिया जाता है। वे अपने खेल जीवन की शुरूआत से ही भारत के सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ियों में से एक समझे जाते रहे है। उनकी आज भी भारत में ही नहीं, विश्व में भी प्रशंसा होती है। उनकी हॉकी से ऐसे गोल निकलते थे, जिनका कोई जवाब नहीं। तीन बार उन्होंने ओलंपिक में स्वर्ण पदक जीता — 1948 में 1952 तथा 1956 में। वे पंजाब सरकार में खेलों के निदेशक भी रहे। मोगा में एक इनडोर स्टेडियम का नाम उनके नाम पर रखा गया है। बलवीर सिंह को 1957 में पद्मश्री सम्मान से भी सम्मानित किया गया। बलबीर सिंह की जीवनी इन हिन्दी बलवीर सिंह हॉकी टीम के सेंटर फारवर्ड खिलाड़ी रहे तथा तीन बार ओलंपिक में भारत का प्रतिनिधित्व किया। वे हॉकी के बेहतरीन स्ट्राइकर समझे जाते रहे है। बलवीर सिंह की प्रारंभिक शिक्षा देव समाज स्कूल तथा डी. एम कॉलेज मोगा में हुई। उन्होंने अमृतसर के खालसा कॉलेज से स्नातक शिक्षा प्राप्त की। उन्होंने पंजाब विश्वविद्यालय की हॉकी टीम का नेतृत्व किया। 1945 में अंतर विश्वविद्यालय चै...

अजीत पाल सिंह की जीवनी - वर्ल्डकप विजेता इंडियन हॉकी टीम के कप्तान

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अजीत पाल सिंह का जन्म 15 मार्च 1947 को संसारपुर, जालंधर पंजाब में हुआ था। सेंटर हाफ पर खेलने वाले अजीत पाल सिंह को भारतीय हॉकी टीम के एक अति कुशल खिलाड़ी के रूप में जाना जाता है। उन्होंने तीन बार ओलंपिक खेलों में भाग लिया। 1975 का विश्व कप जीतने वाली भारतीय टीम के वे कप्तान थे। उनकी खेल उत्कृष्टता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उन्हें 1970 में अर्जुन पुरस्कार और 1992 में पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित किया गया। राष्ट्रीय पुरस्कारों के अतिरिक्त उन्हें एक पैट्रोल पम्प भी पुरस्कार स्वरुप प्रदान किया गया। जिसका नाम उन्होंने सेंटर हाफ रखा। अजीत पाल सिंह को श्रेष्ठतम हाफ-बैक हॉकी खिलाड़ियों में एक माना जाता है। उनका नाम 1928 तथा 1932 की ओलंपिक टीम के. ई. पेनीगर के बाद हाफ बैक के रूप मे जाना जाता है। वे गेंद को बहुत कुशलतापूर्वक हिट कर जाते थे।   वर्ल्डकप विजेता भारतीय हॉकी टीम के कप्तान अजीत पाल सिंह का जीवन परिचय अजीत पाल सिंह ने हॉकी खेलना तभी आरंभ कर दिया था जब वह कैंटोनमेंट बोर्ड हायर सेकेंडरी स्कूल, जालंधर में पढ़ते थे। 1963 में पंजाब स्कूल टीम के लिए उन्होंने फुल बैक खिलाड...

अशोक कुमार ध्यानचंद की जीवनी - मेजर ध्यानचंद के पुत्र अशोक कुमार ध्यानचंद

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हॉकी जगत में अशोक कुमार ध्यानचंद को किसी परिचय की आवश्यकता नहीं, क्योंकि वे हॉकी जगत के महान खिलाड़ी मेजर ध्यानचंद के पुत्र है। अशोक कुमार ध्यानचंद का जन्म 1 जून 1958 को उत्तर प्रदेश के मेरठ शहर में हुआ था। पिता ही नहीं उनके चाचा रूप सिंह भी हॉकी की दुनिया के नामचीन खिलाड़ी हैं। और इसी बात का सीधा फायदा अशोक कुमार को मिला जिसके फलस्वरूप उन्होंने छः साल की उम्र से ही हॉकी स्टिक पकड़ ली, और अपने पिता और चाचा के पद चिन्हों पर चलते हुए उन्होंने सत्तर के दशक में अपनी हॉकी प्रतिभा से खेल जगत अपना अलग स्थान बनाया। और उन्होंने गति, गेंद पर नियंत्रण और खेल चातुर्य से बेहतरीन खिलाड़ी की छाप छोड़ी। मेजर ध्यानचंद के पुत्र अशोक कुमार ध्यानचंद का जीवन परिचय अशोक कुमार का हॉकी की ओर झुकाव बचपन से ही होने के बावजूद भी मेजर ध्यानचंद पुत्र के हॉकी खेलने व कैरियर के रूप में अपनाने के पक्ष में नहीं थे। उनके अनुसार इससे अधिक लाभ नहीं मिल सकते थे परंतु अशोक ने अपने निर्णय को नहीं बदला। पिता मेजर ध्यानचंद जी को अशोक के हॉकी खेलने का पता न लगे इसलिए शाम को ड्रेस, हॉकी व अन्य वस्तुएं अशोक घर लाने के स्थान पर द...

धनराज पिल्लै की जीवनी -- धनराज पिल्लै बायोग्राफी इन हिन्दी

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धनराज पिल्लै का जन्म 16 जुलाई 1968 में खड़की, पुणे, महाराष्ट्र में हुआ था। हॉकी में सेंटर फारवर्ड खेलने वाले धनराज खेल में गति और स्ट्राइकिंग के शौकीन है। धनराज पिल्लै का नाम भारतीय खेल जगत में बड़े सम्मान और गर्व के साथ लिया जाता है। यह उस हॉकी खिलाड़ी का नाम है, जिसने 1998 में बैंकॉक एशियाई खेलों में दस गोल किए थे। और फाइनल में भारत को जीत और 31 साल बाद एशियाई हॉकी खिताब दिलाया। 1989 में एशिया कप के अवसर धनराज ने अंर्तराष्ट्रीय कैरियर की शुरुआत की थी। उन्होंने पाकिस्तान के विरुद्ध दो गोल करते हुए शानदार खेल प्रदर्शन किया। फिर इन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। धनराज पिल्लै की कहानी एक ऐसे साधारण से परिवार के लड़के की असाधारण कहानी है जिसने गरीब परिवार से निकलकर कड़ी मेहनत करके वह मुकाम हासिल किया जिस पर आज वहीं नहीं सारा भारत गर्व महसूस करता है। और अपने इस लेख में हम हॉकी के इसी महान खिलाड़ी धनराज पिल्लै की जीवनी, धनराज पिल्लै की बायोग्राफी, धनराज पिल्लै का जीवन परिचय आदि के बारे में विस्तार से जानेंगे।   धनराज पिल्लै का जीवन परिचय धनराज को पांच बहन भाइयों के बीच धन की कमी होते ...

रणजीत सिंह क्रिकेटर भारत के प्रथम क्रिकेट खिलाडी

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भारत के पहले टेस्ट मैच खिलाड़ी रणजीत सिंह का जन्म 10 सितंबर, 1872 को सरोदर काठियावाड़ में हुआ था। इनका पुरा नाम कुमार रणजीत सिंह था। इन्होंने अपने क्रिकेट खेल की शुरुआत इग्लैंड से की थी। इन्हें सम्मान देने के लिए ही इनके नाम पर भारत के प्रथम श्रेणी क्रिकेट टूर्नामेंट का नाम रणजी ट्रॉफी रखा गया है। इस टूर्नामेंट का शुभारंभ 1935 में पटियाला के महाराजा भूपिंदर सिंह ने किया था। रणजीत सिंह भारत के सर्वश्रेष्ठ बल्लेबाजों में से एक थे। वे एक भारतीय.राजकुमार थे जिन्हें भारत का प्रथम क्रिकेट खिलाड़ी होने का श्रेय भी है। रणजीतसिंह जी का जन्म एक धनी परिवार में हुआ था। 1888 में वह ट्रिनिटी कॉलेज कैम्ब्रिज में दाखिला लेने ब्रिटेन चले गए। वहां उन्होंने अपना नाम बदलकर निक नेम स्मिथ कर लिया था, और उसी नाम से पहचाने जाने लगे थे। बाद में उन्हें कर्नल के नाम से भी जाना जाता था। उन्हें कर्नल हिज हाइनेस श्री सर रणजीत सिंह विभाजी कहकर सम्बोधित किया जाता था। वे नवानगर के महाराजा जैम साहब के नाम से भी जाने जाते थे।   रणजीत सिंह पहले भारतीय क्रिकेट टेस्ट मैच खिलाडी अपनी स्नातक शिक्षा पूरी हो जाने पर रणजीत ...

सी के नायडू की जीवनी - सी के नायडू भारतीय क्रिकेटर का जीवन परिचय

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सी के नायडू का जन्म 13 अक्टूबर 1895 को नागपुर महाराष्ट्र में हुआ था। उनका पूरा नाम कोट्टारी कंकैया नायडू था। वे भारत के पहले टेस्ट कप्तान थे। वे भारत के पहले क्रिकेटर थे जिन्हें पद्मभूषण से सम्मानित किया गया। 1933 में उन्हें विजडन द्वारा क्रिकेटर ऑफ द ईयर चुना गया। कर्नल कोट्टारी कंकैया नायडू को प्यार से सभी लोग सी के नायडू कहकर पुकारते थे। 1932 में इंग्लैंड के विरूद्ध खेले गए टेस्ट मैच में वे भारतीय टीम के कप्तान थे। यद्यपि इंग्लैंड की टीम उस समय पूरी तरह मजबूत थी लेकिन कोट्टारी कंकैया नायडू की कप्तानी में भारतीय टीम ने जमकर उनका मुकाबला किया। श्री कोट्टारी कंकैया नायडू ने आंध्रप्रदेश, केंद्रीय भारत, केंद्रीय प्रोविन्सेज एंड बरार, हिंदू होल्कर यूनाइटेड प्राविन्स तथा भारतीय टीमों के लिए क्रिकेट खेला।   सी के नायडू की बायोग्राफी इन हिन्दी 1932 में इंग्लैंड दौरे के दौरान नायडू ने प्रथम श्रेणी के सभी 26 मैचों में हिस्सा लिया, जिनमें 40.45 की औसत से 1618 रन बनाए और 65 विकेट लाए। अगले ही साल अर्थात 1933 में कोट्टारी कंकैया नायडू को विजडन द्वारा क्रिकेटर ऑफ द ईयर चुन लिया गया। श्री नायडू...

लाला अमरनाथ की जीवनी - स्वतंत्र भारत क्रिकेट टीम के पहले कप्तान

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लाला अमरनाथ का जन्म 11 सितंबर, 1911 को कपूरथला, पंजाब में हुआ था। लाला अमरनाथ ऐसे प्रथम भारतीय क्रिकेटर है, जिन्होंने अपने पहले टेस्ट मैच में शतक लगाया था। स्वतंत्र भारत के वे पहले टेस्ट कप्तान बने। उनका पूरा नाम अमरनाथ भारद्धाज है, परंतु वह लाला अमरनाथ के नाम से ही ज्यादा लोकप्रिय थे। अमरनाथ से एक और महत्वपूर्ण उपलब्धि जुडी हुई है। उन्हीं की कप्तानी में भारत ने अपनी पहली टेस्ट सीरीज जीती थी। यह सीरीज 1952 में पाकिस्तान के विरूद्ध खेली गई थी। अमरनाथ जी ने गुजरात, हिंदू, महाराजा पटियाला, रेलवे, उत्तर प्रदेश तथा भारतीय टीमों के लिए क्रिकेट खेला।   लाला अमरनाथ का जीवन परिचय स्वतंत्र भारत क्रिकेट टीम के प्रथम कप्तान लाला अमरनाथ क्रिकेट की दुनिया में चर्चा में तब आए जब उन्होंने 1933 में बम्बई जिमखाना में खेलते हुए इंग्लैंड के विरुद्ध टेस्ट मैच में शानदार शतक लगाया। यह उनका पहला टेस्ट मैच था। किसी भारतीय द्वारा टेस्ट शतक लगाए जाने उन्होंने भारतीय खिलाड़ी की नई आक्रामक झलक प्रस्तुत की, जो कि अपारम्परिक थी। उस वक्त जब भारत के 21 पर दो खिलाड़ी आउट हो चुके थे, तब अमरनाथ ने स्थिति को न केवल स...

वीनू मांकड़ की जीवनी - भारतीय क्रिकेटर वीनू मांकड़ का जीवन परिचय

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वीनू मांकड़ के नाम से प्रसिद्ध खिलाडी का वास्तविक नाम मलवंतराय हिम्मत लाल मांकड़ था। मीनू मांकड़ का जन्म 12अप्रैल 1917 को जामनगर गुजरात में हुआ था। वे अपने स्कूली दिनों के घरेलू नाम से ही क्रिकेट जगत में लोकप्रिय रहे। उन्होंने टेस्ट क्रिकेट में पहले विकेट की साझेदारी के लिए पंकज राय के साथ मिलकर 213 रन का विश्व रिकॉर्ड स्थापित किया। यह मैच 1956 में न्यूजीलैंड के विरूद्ध खेला गया था। वे एकमात्र ऐसे खिलाडी है जिन्होंने क्रिकेट टीम में सभी 11 पोजीशन पर रहकर क्रिकेट खेला है। 1947 में विजडन क्रिकेटर ऑफ द ईयर चुना गया था। उन्होंने मुख्य रूप से भारत, बंगाल, गुजरात, हिंदू, महाराष्ट्र, नवानगर, राजस्थान, पश्चिमी भारत की टीमों के लिए खेल।   वीनू मांकड़ का जीवन परिचय व बायोग्राफी इन हिंदी वीनू मांकड़ भारतीय क्रिकेटरों में सर्वश्रेष्ठ आलराउंडरो में से एक थे। वे दाहिने हाथ के श्रेष्ठ बल्लेबाज तथा बाएं हाथ के धीमी गति के गेंदबाज थे। उन्होंने भारत के लिए 44 टेस्ट मैच 1946 से 1959 तक खेले और 2109 रन 31.47 की औसत से बनाए। उन्होंने 231 के सर्वाधिक स्कोर के साथ 5 शतक बनाए। उनहोने 162 विकेट भी लिए जिनमें...

नवाब पटौदी का जीवन परिचय - सबसे कम उम्र के भारतीय क्रिकेट टीम के कप्तान

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नवाब पटौदी का जन्म 5 जनवरी 1941 को भोपाल मध्यप्रदेश में हुआ था। इनका पुरा नाम मंसूर अली खां पटौदी था। यह क्रिकेट जगत के जाने माने नाम है। वह क्रिकेट खेलने वाले सभी देशों की क्रिकेट टीमों में से आज तक के सबसे युवा क्रिकेट कप्तान रहे है। वे पूर्व पटौदी राजवंश के परिवार के सदस्य है। नवाब पटौदी मात्र 21 साल की उम्र में टीम के कप्तान बन गए थे। उस समय टीम के सभी सदस्य उनसे उम्र में बडे थे। मंसूर अली खां पटौदी को नवाब पटौदी जूनियर भी कहा जाता है और टाइगर पटौदी के नाम से भी वह जाने जाते थे। उन्हें क्रिकेट खेलने की प्रेरणा अपने पिता से मिली जो क्रिकेट को बहुत पसंद करते थे। नवाब पटौदी के पिता इर्तिखार अली खां पटौदी थे जो सीनियर नवाब पटौदी कहलाते थे। वह बहुत बडे क्रिकेट प्रेमी थे और खुद भी क्रिकेट खेला करते थे। इर्तिखार अली खां पटौदी ने क्रिकेट का खेल इंग्लैंड में सिखा था और टेस्ट मैचों में देश का प्रतिनिधित्व भी किया था। इसके पश्चात वे भारत वापस आ गए थे और उन्होंने राष्ट्रीय टीम का 1946 मे नेतृत्व भी किया था। नवाब पटौदी बायोग्राफी इन हिन्दी नवाब पटौदी ने भी खेल सीखने की शुरुआत अपने पिता के नक्शे...

सुनील गावस्कर की जीवनी - सुनील गावस्कर प्रोफाइल इन हिन्दी

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सुनील गावस्कर क्रिकेट के इतिहास में विश्व के महानतम बल्लेबाजों में से एक है। इनके पिता का नाम मनोहर गावस्कर और माता का नाम मीनल गावस्कर है। सुनील गावस्कर का जन्म 10 जुलाई 1949 को मुम्बई में हुआ था। गावस्कर ऐसी शख्सियत है जो पहले बल्ले से रनों का अम्बार लगाने के कारण और बाद में पत्रकार के रूप में और उसके बाद क्रिकेट कमेंट्री के क्षेत्र में चर्चा में रहे। एक प्रारम्भिक बल्लेबाज के रूप में हर समय और हर देश में जहां गावस्कर ने उच्च स्तर की छाप छोडी वहीं भारत के सम्मान और गरिमा में भी वृद्धि की। पहली ही टेस्ट श्रृंखला में सिर्फ चार मैचों में उनके 774 रन के प्रदर्शन ने सारी दुनिया को आकर्षित किया। 6 मार्च 1971 मे उन्होंने वेस्टइंडीज के खिलाफ अपना टेस्ट कैरियर शुरू किया और उसके 16 साल बाद 7 मार्च 1987 को अपने दस हजार रन भी पूरे कर लिए। क्रिकेट जगत को प्रतिभाशाली प्रारंभिक बल्लेबाज के आने का पता चल गया। गावस्कर के लिए 7 मार्च 1987 का दिन जितना अलौकिक, अद्वितीय और कीर्तिमान बना उतना कोई और अन्य नहीं। उनके लाखों प्रशंसकों और खुद गावस्कर के लिए यह दिन एक ऐतिहासिक दिन रहा।   सुनील गावस्कर का ज...