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राजा बदन सिंह का इतिहास भरतपुर राज्य

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ठाकुर बदन सिंह चूडामन जाट के भतीजे थे। ये आमेर  जयपुर के सवाई राजा जयसिंहजी के पास बतौर ( Feudatory cheif) रहे थे। सवाई महाराजा जयसिंहजी ने इन्हें सम्राट महम्मदशाह के जमाने में चुड़ामन जाट की जमीन और उपाधियाँ प्रदान की थीं। ये बड़े सत्य और शान्ति-प्रिय थे। लुटेरे सरीखा जीवन व्यतीत करना इनके स्वभाव के विरुद्ध था। इन्होंने एक नियमबद्ध शासक की तरह राज्य किया। इन्होंने बड़े सुसंगठिन रूप से अपने राज्य का विस्तार और दृढ़ीकरण किया। ये जाट जाति की उच्छ खल प्रकृति को बदल कर उसे नियम बद्ध बनाने में बहुत कुछ सफल हुए। इन्होंने नियम बद्ध शासन का आरंभ किया।   राजा बदन सिंह का इतिहास और परिचय   विधायक कार्यक्रम के द्वारा इन्होंने अपनी सत्ता को मजबूत किया और अपने आपको आमेर की अधीनता से स्वतन्त्र कर दिया। इनकी बढ़ती हुई ताकत को देखकर आमेर के तत्कालीन महाराजा ने 18 लाख रुपया प्रति साल आमदनी की जमीन देकर इन्हें प्रसन्न किया। सब से बड़ा और उल्लेखनीय कार्य आपने यह किया कि प्रायः सारे आगरा और मथुरा के जिलों में अपनी राज्यसत्ता स्थापित की। आपने उक्त जिलों के शक्तिशाली जाट कुटम्बों के साथ अपना ...

राजा सूरजमल का इतिहास और जीवन परिचय

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राजा सूरजमल का जन्म सन् 1707 में भरतपुर में हुआ था। राजा बदन सिंह की मृत्यु के बाद राजा सूरजमल जी भरतपुर राज्य के सिंहासन पर विराजे। ये महान और वीर राजनीतिज्ञ दूरदर्शी और प्रतिभा संपन्न महानुभाव थे। इनका नाम न केवल भरतपुर राज्य के इतिहास में नहीं वरन् भारत के इतिहास में अपना विशेष महत्व रखता है। ये भारत के एक ऐतिहासिक महापुरुष हैं। जिन महानुभावों ने अपने वीरत्व व चतुराई से भारत के इतिहास को बनाया है, उनमें सूरजमल जी का आसन ऊंचा है।   राजा सूरजमल का इतिहास और जीवन परिचय   सूरजमल जी लम्बे चौड़े और बदन से बड़े हट्टे-कट्टे थे। श्याम रंग के होने पर भी वे बढ़े तेजस्वी दिखलाई पड़ते थे। आपको पुस्तक ज्ञान विशेष न था, पर संसार में सफलता प्रदान करने वाले व्यवहारिक ज्ञान की आप में कमी न थी। एक सुप्रख्यात्‌ इतिहास- वेत्ता लिखता हे–“राजा सूरजमल जी की राज्यनैतिक क्षमता अद्भुत थी–उनकी बुद्धि बड़ी तीव्र और बड़ी साफ थी।” एक फारसी इतिहास-वेत्ता का कथन है;–“यद्यपि राजा सूरजमल किसानों की सी पोषाक पहनते थे ओर अपनी देहाती ब्रजभाषा बोलते थे, पर वे जाट जाति के प्लेटो थे। बुद्धिमत्ता और चतुराई में माल ...

महाराजा जवाहर सिंह का इतिहास और जीवन परिचय

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स्वर्गीय राजा सूरजमल जी के पाँच पुत्र थे, यथा:- जवाहर सिंह, ताहर सिंह, रतन सिंह, नवल सिंह, और रणजीत सिंह। इनमें सब से बड़े पुत्र जवाहर सिंह भरतपुर राज्य के सिंहासन पर आसीन हुए। महाराजा जवाहर सिंह जी बड़े पराक्रमी वीर थे। पर साथ ही वे बड़े दुराग्रही और हठी स्वभाव के थे। आपने अपने पिता का राज्य उनकी जीवित अवस्था ही में खूब बढ़ाया पर भीषण दुराग्रही स्वभाव के कारण इनकी इनके पिता के साथ नहीं पटती थी। राजा सूरजमल जी ने गुस्सा होकर इनसे उन्हें अपना मुंह न दिखलाने के लिये कह दिया था। इसके बाद तनातनी बढ़ते-बढ़ते दोनों में युद्ध होने तक की नौबत आ गई। राजा जवाहर सिंह जी गोपालगढ़ और रामगढ़ के किलों से तोपें दागने लगे और  राजा सूरजमल जी डींग और शाहबुर्ज के किलों से तोपों ही के द्वारा उत्तर देने लगे। इस लड़ाई में जवाहर सिंह के पैर में चोट लगी, जिसने उन्हें सदा के लिये लंगड़ा कर दिया। जब ये घायल होकर बिस्तरे पर पड़े थे, तब पुत्र-प्रेम से प्रेरित होकर महाराजा सूरजमल जी इनके पास आये और दु:ख प्रकट करने लगे। पर इस समय महाराजा जवाहर सिंह जी ने कपड़े से अपना मुंह ढक लिया और कहा कि में आपकी आज्ञा ही का...

महाराजा रणजीत सिंह का इतिहास और जीवन परिचय

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महाराजा केहरी सिंह जी के बाद महाराजा रणजीत सिंह जी  भरतपुर राज्य के राज्य सिंहासन पर अधिष्ठित हुए। इनके समय में राजनैतिक दृष्टि से कई महत्वपूर्ण घटनाएँ हुई, अतएवं उन पर थोड़ा सा प्रकाश डालना आवश्यक है। जिस समय महाराजा रणजीत सिंह जी राज्य-सिंहासन पर बैठे थे, उस समय अंग्रेज भारत में अपनी सत्ता मजबूत करने के काम में लगे हुए थे। कहने की आवश्यकता नहीं कि होलकर, सिन्धिया प्रभुति कुछ शक्तियों के द्वारा उनके इस कार्य में बड़ी-बड़ी बाधाएं उपस्थित की जा रहीं थीं। महाराजा रणजीत सिंह जी ने अंग्रेजों से सन्धि कर उनसे मैत्री का सम्बन्ध स्थापित कर लिया था। इतना ही नहीं वरन्‌ उन्होंने कुछ युद्धों में अंग्रेजों की अच्छी सहायता भी की थी। पर महाराजा रणजीत सिंह और अग्रेजों का यह मैत्री पूर्ण सम्बन्ध अधिक दिन तक स्थिर न रह सका। एक घटनाचक्र ने इसमें विच्छेद उत्पन्न कर दिया।   महाराजा रणजीत सिंह का इतिहास और जीवन परिचय   महाराजा रणजीत सिंह जी के समय में इन्दौर के महाराजा यशवन्त राव होलकर का उदय हो रहा था। कहने की आवश्यकता नहीं कि इन यशवन्तराव होलकर का आतंक उस समय सारे भारत में छा रहा था। सारे ...

महाराजा जसवंत सिंह भरतपुर का जीवन परिचय और इतिहास

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महाराजा बलवन्त सिंह जी के बाद उनके पुत्र महाराजा जसवंत सिंह जी भरतपुर राज्य के राज्य सिंहासन पर बिराजे। इस समय आप नाबालिग थे, अतएवं आगरा के कमिश्नर मि० टेलर ने राज्य के शासन-सूत्र को संचालित करने के लिए राज्य के सरदारों और माजी साहिबा की सलाह से धाऊ घासीराम जी को रिजेन्ट नियुक्त किया। अंग्रेजी सरकार ने इस नियुक्ति का समर्थन किया। हाँ, उसने राज्य कारोबार पर देख-रेख रखने के लिये पोलिटिकल ऐजेन्ट की नियुक्ति कर दी। उक्त घटना के चार वर्ष बाद महाराजा जसवन्त सिंह जी की माता का स्वर्गवास हो गया और इसी साल अर्थात्‌ सन्‌ 1853 की 8 जुलाई को आपका राज्याभिषेक हुआ। कहने की आवश्यकता नहीं कि धाऊ घासीराम जी ने उक्त महाराजा की परवरिश बहुत ही अच्छे ढंग से की। जसवन्त सिंह जी के पिता महाराजा बलवन्त सिंह जी के राज्यकाल में राज्य शासन का बहुत सा काम जबानी होता था। केवल राज्य-कोष का हिसाब और डिस्ट्रिक्ट ऑफिसरों को दिये जाने वाले हुक्म लिखे जाते थे। स्वर्गीय महाराजा खुले आम इजलास करते थे और मुकदमों के फैसले जबानी ही दे दिया करते थे। सन्‌ 1855 में एजेन्ट हु दी गवनर जनरल कर्नल सर हेनरी लारेन्स भरतपुर राज्य आये औ...

महाराजा किशन सिंह भरतपुर रियासत

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भरतपुर के महाराजा श्री विजेन्द्र सवाई महाराजा किशन सिंह जी बहादुर थे। आपको लेफ्टनेट कर्नल की उपाधि प्राप्त थी। आपका जन्म सन् 1899 की 4 अक्तूबर को हुआ था। आपके पिता महाराजा रामसिंह जी सन् 1900 की 27 वीं अगस्त को राज्य कार्य से अलग हुए। उस समय आपकी आयु लगभग एक वर्ष की थी। अतएवं आपके बालिग होने तक भरतपुर राज्य शासन पोलिटिकल एजेंट एवं कौसिल ऑफ रिजेन्सी के हाथों में रहा। आपने सन् 1916 तक अजमेर के मेयो कॉलेज में विद्याध्ययन किया। इसके पश्चात्‌ डिप्लोमा की परीक्षा उत्तीर्ण कर आप भरतपुर में शासन कार्य सीखने लगे। दो वर्ष तक आप लगातार शासन व्यवस्था का अध्ययन करते रहे। सन्‌ 1918 की 28 वीं नवंबर को आपको तत्कालीन वायसराय लॉर्ड चेम्स फोर्ड द्वारा सम्पूर्ण शासनाधिकार प्राप्त हुए।   महाराजा किशन सिंह भरतपुर रियासत   सन् 1913 की तीसरी मार्च को आपका विवाह फरीदकोट के स्वर्गीय महाराजा साहब की कनिष्ठ भगिनी के साथ सम्पन्न हुआ। सन् 1914 में आप इंग्लैंड पधारे तथा वेलिंगटन कालेज में भर्ती हुए। वहाँ आपने उस वर्ष के नवंबर मास तक विद्या अभ्यास किया। इसके पश्चात आप वापस लौट आये। आपके युवराज का नाम महाराज ...