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मल्हराराव होलकर का जीवन परिचय

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होल्कर राज्य के मूल संस्थापक मल्हारराव होलकर का उदय महाराष्ट्र साम्राज्य के प्रकाशमान दिनों में ही हुआ था। नवयुवक मल्हारराव होलकर ने महान पेशवा बाजीराव से महाराष्ट्र धर्म का पवित्र मन्त्र सीखा था। इसका यह प्रभाव था कि होल्कर राजवंश हमेशा से स्वतन्त्रता और आत्म-सम्मान आदि उच्च गुणों का पुजारी रहा है। अगर सूक्ष्म दृष्टि से होल्कर राज्य के सच्चे इतिहास का अवलोकन किया जाये तो यह प्रतीत हुए बिना न रहेगा कि भारत वर्ष के इतिहास में इस गौरवशाली राजवंश ने स्वतन्त्रता, स्वाधीनता ओर राष्ट्र सम्मान की रक्षा के लिये जो जो महान कार्य किये थे, वैसे कार्य बहुत कम राजवंशों ने किये होंगे। राष्ट्रीय दृष्टि से, साम्राज्य संगठन की दृष्टि से, तथा समय सूचकता और राजनीतिज्ञता की दृष्टि से, होल्कर राजवंश का इतिहास प्रायः अद्वितीय है। हम तो बड़े अभिमान के साथ यों कहगें कि मल्हारराव होलकर, तुकोजीराव प्रथम, प्रात:स्मरणीया अहिल्याबाई तथा तुकोजीराव द्वितीय-इनके नाम भारतवर्ष के इतिहास के पन्नों को तब तक शोभायमान करते रहेंगे जब तक कि संसार में हिन्दू वीरत्व, स्वदेश भक्ति, राज्य-संगठन का अद्भुत ससामर्थ्य तथा उच्च श्रेण...

तुकोजीराव होलकर प्रथम का जीवन परिचय

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इसमें तिलमात्र भी सन्देह नहीं कि श्री तुकोजीराव मल्हारराव के योग्य उत्तराधिकारी थे। आपने कई युद्धों में असाधारण चतुराई और वीरत्व का परिचय दिया था। उन्होंने अपनी फौजों में यूरोपियन युद्ध-कला और नियम-पालकता (Discipline) का प्रचार किया। सन्‌ 1767 में पेशवा ने रोहिलों को दंड देने के लिये जो फौज भेजी थी उसमें सिन्धिया के साथ साथ तुकोजीराव ने भी बहुत बड़ा भाग लिया था। इसका कारण यह था कि रोहिलों ने पानीपत की लड़ाई में मराठों के खिलाफ़ अहमदशाह अब्दाली का साथ दिया था। पहले पहल मराठों की यह फौज तीन हिस्सों में विभक्त हुईं। उसकी एक टुकड़ी सिन्धिया के हाथ में, दूसरी होल्कर के हाथ में, ओर तीसरी दूसरे सेनापतियों के हाथ में रही। सिन्धिया ने उदयपुर पर कूच किया ओर वहाँ के महाराणा पर 60 लाख का खिराज लगाया। तुकोजीराव ने कोटा और बूँदी पर चढ़ाई कर उन पर खिराज लगाया। अन्य दो जनरल सागर में रहकर बुन्देलखण्ड के राजाओं से खिराज वसूल करने लगे।   तुकोजीराव होलकर प्रथम का जीवन   इसके बाद सब सेना ने मिलकर  भरतपुर के राजा के खिलाफ कूच किया। इसका कारण यह था कि भरतपुर का राजा अवध के नवाब शुजाउद्दौला से ...

यशवन्तराव होलकर का जीवन परिचय

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सन् 1797 की 15 अगस्त को यह महान राजनीतिज्ञ और वीर  तुकोजीराव होलकर की मृत्यु हो गई। तुकोजीराव के चार पुत्र थे। इनमें से दो औरस (Legitimate) और दो अनऔरस थे। अर्थात्‌ दो असली रानी से थे और दो रखैल से। औरस पुत्रों का नाम काशीराव ओर मल्हाराव था। अनौरस पुत्रों का नाम यशवन्तराव और बिठोजी था। तुकोजीराव की इच्छानुसार पेशवा ने काशीराव का उत्तराधिकारित्व स्वीकार कर लिया। इसके अतिरिक्त मृत्यु के पहले तुकोजीराव ने बड़ी बुद्धिमानी के साथ काशीराव ओर मल्हारराव के बीच का मतभेद भी मिटा दिया था। पर इसका कोई फल नहीं हुआ। काशीराव में शासन करने की क्षमता नहीं थी। बुद्धि से भी थे बड़े कमज़ोर थे। इसके विपरीत मल्हारराव में वे सब गुण थे जो एक योग्य शासक और सैनिक नेता में होने चाहियें। इस वक्त तक सिन्धिया और होल्कर का मतभेद ज्यों का त्यों बना हुआ था। होल्कर घराने के कई लोग जैसे यशवन्तराव, बिठोजी, हरीबा आदि मल्हार॒राव को गद्दी पर बिठाना चाहते थे। सिन्धिया ने काशीराव का पक्ष इस शर्त पर ग्रहण किया कि उन्हें सिन्धिया पर का वह कर्ज छोड़ना होगा जो वे ( होल्कर )  अहल्याबाई के समय से उनसे (सिन्धिया से) मांगत...

मल्हारराव द्वितीय का परिचय हिन्दी में

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महाराज यशवन्तराव होलकर की मृत्यु के बाद उनकी पत्नी तुलसीबाई जिन्होंने महाराजा की विक्षिप्त अवस्था में राज्य का शासन किया था-रिजेन्ट बनाई गई। उस समय महाराजा के उत्तराधिकारी मल्हारराव द्वितीय की उम्र केवल चार वर्ष की थी। सब लोगों ने उनके उत्तराधिकारित्व को स्वीकार किया। इन बाल-महाराजा के समय कुछ सैनिक अधिकारियों की बगावत के कारण राज्य में बड़ी अशान्ति और गड़बड़ी फैली हुईं थी। आधीनस्थ इलाकेदार इस समय स्वाधीन होने लग गए थे। भील लोग जंगलों से निकल निकल कर उत्पात मचाने लग गए थे। तनख्वाह के लिये सेना अलग चिल्ला रही थी। तुलसीबाई ओर मल्हारराव द्वितीय के खिलाफ साजिशें होने लगीं। यह अशान्ति और गड़बड़ इतनी फैली हुई थी कि सन्‌ 1815 में तुलसीबाई को गंगराड़ के किले में आश्रय लेना पड़ा। इसके बाद दीवान गनपतराव तुलसीबाई के हर एक काम पर नज़र रखने लगे। बागी फौज के नायक राज्य की शान्ति स्थापना में बराबर बाधा डालते रहे। इन सब बातों से तंगआकर तुलसीबाई को गंगराड़ का किला छोड़ कर आलोट के किले में आश्रय लेना पड़ा।   मल्हारराव द्वितीय का परिचय   इसी समय अर्थात सन्‌ 1817 में पेशवा ने अंग्रेजों से युद्ध घ...

हरिराव होलकर का जीवन परिचय हिन्दी में

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इंदौर  राज्य के महाराजा हरिराव होलकर का जन्म सन् 1795 में हुआ था। इनके पिताका नाम विठोजी राव होलकर था। इन्होंने सन् 1834 से सन् 1843 तक इंदौर राज्य के राज्य सिंहासन पर राज्य किया। इनके शासनकाल में इंदौर राज्य कोई उन्नति न कर सका। अपने इस लेख में हम इन्हीं महाराजा हरिराव होलकर के बारे में कुछ बातें जानेंगे।     इंदौर के महाराजा हरिराव होलकर का परिचय     महाराजा मल्हारराव द्वितीय को कोई पुत्र नहीं था। अतएव उनकी रानी साहिबा गौतमाबाई ने अपने पति की मृत्यु के कुछ समय पूर्व ही मार्तण्डराव होलकर को गोद ले लिया था। सन्‌ 1833 की 27 अक्टूबर को वे गद्दी-नशीन हुए। अंग्रेज सरकार ने भी इनकी गद्दी नशीनी मंजूर कर ली। पर इसके कुछ ही समय बाद महाराजा यशवन्तराव के भतीजे हरिराव उनके साथियों द्वारा महेश्वर के किले से मुक्त कर दिये गये। इन्हें स्वर्गीय महाराजा मल्हारराव ने कैद किया था। इनका राजगद्दी पर विशेष अधिकार था। इनके साथी इन्हें मंडलेश्वर में पोलिटिकल ऑफिसर के पास ले गये और वहाँ वे होल्कर राज्य की गद्दी के असली उत्तराधिकारी सिद्ध हुए।     राज्य की प्रजा और सिपाहि...

तुकोजीराव द्वितीय का जीवन - तुकोजीराव होलकर द्वितीय

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महराजा तुकोजीराव द्वितीय का राज्याभिषेक-उत्सव सन्‌ 1844 की 27 जून को हुआ। इस समय 21 तोपों की सलामी हुईं। महाराजा को गद्दीनशीनी की सनद् लेने के लिये कहा गया। महाराजा को यह बात मजबूर होकर स्वीकार करनी पड़ी। कहने की आवश्यकता नहीं कि यह बात सन्धि के खिलाफ़ थी। जिस हालत में महाराज तुकोजीराव द्वितीय होल्कर राजगद्दी के मालिक हो चुके थे, उन्हें सनद देने की कोई आवश्यकता नहीं थी। होल्कर राज्य उनके पूर्वजों की तलवार से जीता गया था न कि अंग्रेजी सरकार से वह दान में मिला था। महाराज की नाबालिग अवस्था में मा साहबा ने कौंसिल ऑफ रिजेन्सी की सहायता से राज्य- व्यवस्था का संचालन किया। राजा भाऊपन्त, रामराव नारायण पलशीकर और खासगी दीवान गोपालराव बाबा कौंसिल के सदस्य थे।   महाराजा तुकोजीराव द्वितीय का परिचय   इस समय इन्दौर के रैसिडेन्ट एक सहृदय और उदार महानुभाव थे, जिनका कि नाम हेमिल्टन था। इनकी मित्रता-पूर्ण राय से राज्य के कारोबार में बड़ी सहायता मिली थी। इनका बाल महाराज पर अगाध प्रेम था। ये महाराज को अपने पुत्र की तरह मानते थे। महाराज का हृदय भी इनसे गदगद रहता था। वे अपने जीवन भर तक इन्हें याद करत...

शिवाजीराव होलकर का जीवन परिचय

श्रीमान्‌  तुकोजीराव होलकर द्वितीय के बाद उनके पुत्र महाराजा शिवाजीराव होलकर सन् 1886 की 3 जुलाई को इंदौर राज-सिंहासन पर बिराजे। इस समय आपकी अवस्था 33 वर्ष की थी। श्रीमान बड़े विद्याप्रेमी थे और अंग्रेजी भाषा पर अपका बड़ा अप्रतिहत अधिकार था। सिंहासनारूढ़ होने के थोड़े समय बाद श्रीमान्‌ ने प्रख्यात् मुसद्दी दीवान बहादुर आर० रघुनाथराव सी० एस० आई०, सी० आई० ई० को मद्रास से बुला कर प्रधान मंत्री के उच्च पद पर नियुक्त किया। सन् 1887 में महाराजा शिवाजीराव होलकर अपने योग्य प्रधान मंत्री को शासन भार सौंप कर इंग्लैंड की यात्रा के लिये पधारे। वहां आप श्रीमती सम्राज्ञी के ज्युबिली महोत्सव में शामिल हुए। आपने इंग्लेंड में अच्छा प्रभाव उत्पन्न किया। कई सम्माननीय व्यक्तियों के साथ आपकी मैत्री हो गई। इसी समय श्रीमती सम्राज्ञी विक्टोरिया ने आपको जी० सी० एस० आई० की उपाधि से विभूषित किया।     महाराजा शिवाजीराव होलकर का परिचय   इंग्लेंड का सफर कर श्रीमान ने स्विट्जरलैंड, फ्रांस आदि कई यूरोपीय देशों की यात्रा की। आपने यूरोप के सामाजिक जीवन का खूब अध्ययन किया। इसके बाद आप भारत पधारे और ...

महाराणा सांगा का इतिहास - राणा सांगा का जीवन परिचय

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महाराणा सांगा का इतिहास जानने से पहले तत्कालीन परिस्थिति जान ले जरूरी है:– अजमेर के चौहानों, कन्नौज के गहरवालों और गुजरात के सोलंकियों का पतन होते ही मेवाड़ में गुहिलोत और मारवाड़ में राठोड़ हिन्दुस्तान के राजनैतिक गगन पर चमकने लगे। इनके चमकने से सारी राजपूत जाति में पुनः नवजीवन का संचार होने लगा। इधर दिल्ली में अफगानों की शक्ति दिन प्रति दिन घटने लगी। राजपूतों की उन्नति और अफगानों की अवनति से देश के अन्दर ऐसे चिन्ह दृष्टिगोचर होने लगे कि अब वह समय दूर नहीं है, जब हिन्दू लोग पुनः अपना नष्ट साम्राज्य प्राप्त कर लें।   महाराणा सांगा का इतिहास और जीवन परिचय   ऐसे अवसर पर पैतृक धन को पुन: प्राप्त करने के लिये  हिन्दुस्तान के रंग मंच पर महाराणा सांगा प्रकट हुए। तत्काल ही वे सारी हिन्दू जाति के नेता बन गये। उनका देश प्रेम और कर्तव्य पालन, उनके उच्च विचार और उदारता, उनकी वीरता और महान मन- स्विता और हिन्दुस्तान के सब से अधिक शक्तिशाली राज्य के स्वामी होने के परिणाम स्वरूप उनकी स्थिति ने उन्हें इस उच्च स्थान को ग्रहण करने के योग्य सिद्ध किया। सुप्रसिद्ध इतिहास लेखक हरबिलास शारदा ...