विलियम वेडरबर्न का जीवन परिचय हिन्दी में

भारत हितैषी सर विलियम वेडरबर्न, गोपाल कृष्ण गोखले के शब्दों में अत्यन्त आदरणीय व्यक्ति और आधुनिक ऋषि थे। उनकी दृष्टि में आपका व्यक्तित्व इतना महान, उत्साहप्रद और स्फूर्ति-दायक था कि उसका वर्णन लेखनी या वाणी से नहीं किया जा सकता। प्रेम, सम्मान और श्रृद्धा का वह विषय है। निस्तब्ध, शान्त या मौन रह कर उसका चिन्तन किया जाना चाहिए। इसमें अतिशयोक्ति बिलकुल भी नहीं है। आधी शताब्दी तक निरन्तर भारत की निःस्वार्थ सेवा करने वाले कांग्रेस के संस्थापक इस महापुरुष के यथार्थ स्वरूप को अभिव्यक्ति करने के लिए महादेव गोविन्द रानाडे ने भी ठीक ही कहा था कि “जितने अंग्रेज़ों से उनका परिचय हुआ, उनमें से कोई भी सर विलियम वेडरबर्न के साथ खड़ा नहीं किया जा सकता।”

 

सर विलियम वेडरबर्न का जीवन परिचय हिन्दी में

 

विलियम वेडरबर्न का जन्म ग्लोसैस्टर शायर ( इंग्लैंड ) में 25 मार्च 1836 को हुआ था। अपने अनेक सम्बन्धियों के समान आपने भी एडिनबरा यूनिवर्सिटी में शिक्षा प्राप्त कर इण्डियन सिविल सर्विस की परीक्षा दी, और उसमें सफल हो 25 नवम्बर 1860 को बम्बई प्रान्त की सिविल-सर्विस में प्रवेश किया।

 

1860 से 1885 तक सर विलियम वेडरबर्न ने विविध पदों पर काम किया। बरसों तक आप जिला मजिस्ट्रेट, कुछ समय तक हाईकोर्ट के जज, तथा बम्बई गवर्नर की कौंसिल के सदस्य रहे और बाद में बम्बई सरकार के पोलिटिकल सेक्रेटरी हो गये। उसके बाद आपने अन्य भी कितने ही ऊंचे पदों पर काम किया, लेकिन पच्चीस वर्षों के इस सेवा काल में एक बात जो स्पष्ट रूप से प्रजा के सामने रही, वह यह है कि आप जहां गये वहां ही आपने अपनी सहृदयता, कर्तव्य-बुद्धि, लगन और सेवा-भाव से लोकप्रियता प्राप्त की। सब से अधिक ध्यान आपका जिस प्रश्न की ओर गया, वह था भारतीय किसानों की समस्या। आपने भारतीय किसानों की आर्थिक समस्या का अत्यन्त सूक्ष्मता से निरीक्षण और अध्ययन किया। उन दिनों होने वाले दुर्भिज्ञो से तो आपका हृदय विदीर्ण हों गया। आपने अनुभव किया कि ब्रिटिश सरकार की शासन-नीति के कारण ही ग्रामीण भारतीयों की अवस्था दिन प्रति-दिन खराब होती जा रही है। आप सदा उच्च अधिकारियों का ध्यान भारत के इस महान किन्तु दरिंद्रतम अंग की ओर खींचते रहे।

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1882 में विलियम वेडरबर्न ने पूना के पुरंदर तालुके के किसानो की आर्थिक स्थिति के सुधार के लिए एक योजना तैयार की, इस योजना का स्थूल रूप यह था कि सब कर्जदार किसानों का कर्ज़ महाजनों से समझौता कर उन्हें सरकार चुका दे और एक कृषि बैंक खोलकर बहुत कम सूद पर कृषकों को रुपया दिया जाय, जो छोटी छोटी किश्तों में उनसे वसूल किया जाय। उस योजना को बम्बई गवर्नर के पास भेजने से पूर्व किसानों और महाजनों को भी आपने उससे सहमत कर लिया। बम्बई गवर्नर सर जेम्स फ़र्गसन और तत्कालीन वायसराय ने उस योजना को स्वीकृत कर भारत-मंत्री की अनुमति के लिए उसके पास भेजा। कई वर्ष उसके बारे में पत्र-व्यवहार करने और आपत्तियां उठाने में बिता देने के बाद भी 1887 में बतौर परीक्षण के अमल में लाने तक से इन्कार कर दिया गया।

 

1885 में सर विलियम वेडरबर्न सिविल सर्विस से अलग हो गये, लेकिन भारत की सेवा से आप अन्त तक विमुख नहीं हुए। स्वतन्त्र होकर और भी अधिक उत्साह और लगन के साथ आप भारत की सेवा में लग गये। जिन समस्याओं का अध्ययन आपने नौकरी के दिनों में किया था,उनके लिए आन्दोलन करने का काम आपने इंग्लैंड में शुरू किया। 1889की कांग्रेस के अध्यक्ष पद से दिये हुए भाषण में आपने कहां था कि “एक चौथाई सदी तक मैंने भारत की सेवा की है और भारत का नमक खाया है। में आशा करता हूं कि अपना शेष जीवन भी भारत की सेवा में अर्पिंत कर दूंगा।”

 

सर विलियम वेडरबर्न
सर विलियम वेडरबर्न

 

इसमें सन्देह नहीं कि जीवन के अन्तिम दिन तक आपने सेवा के अपने इस व्रत को निभाया। लेखनी और वाणी द्वारा आप भारतीयों के लिए जोरों के साथ आन्दोलन करते रहे। भारतीय किसानों की दुरवस्था आपके हृदय में घर कर गई थी और उनकी स्थिति की जांच करने पर आप बराबर ज़ोर देते रहते थे। 1893 में आप पार्लिमेंट के सदस्य चुने गये। दादाभाई नौरोजी भी उस समय पार्लिमेंट के सदस्य थे। आप दोनों ने मिलकर भारतीय पक्ष को ज़ोरो के साथ पार्लिमेंट के सामने रखना शुरू किया।

 

1893 से 1900 तक सर विलियम वेडरबर्न पार्लिमेंट के सदस्य रहे। वहां आप बराबर ब्रिटिश शासन को भारतीयों की शोचनीय अवस्था का मुख्य कारण बताते रहे। आप कहा करते कि शासन प्रबन्ध में भारतीयों की कोई आवाज़ नहीं है। हम उनके कष्ठों को जान नहीं सकते। जूता कहां काटता है, यह पहनने वाला ही बता सकता है, पहनाने वाला नहीं। भारतीय किसान की आर्थिक अवस्था और दुर्भिज्ञो की जांच निष्पक्ष रूप से करने पर ज़ोर देते हुए आप कहा करते कि हम खूब बहस के बाद अपने एक-एक पैसे के व्यय करने की स्वीकृति देते हैं, लेकिन भारत के बजट को जिसका सम्बन्ध तीस करोड़ भारतीयों से है, अन्धाधुन्ध पास कर देते हैं। भारत सम्बन्धी कोई भी प्रश्न उपस्थित होने पर आपका जानकारी से भरा हुआ जोरदार भाषण अवश्य होता। इण्डियन फेमिन यूनियन के अध्यक्ष, फ़ाइनेंस कमीशन के सदस्य और हाउस आफ कामन्स की पोलिटिकल कमेटी के चेयरमैन रह कर भी आपने भारत की सेवा की।

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कांग्रेस के तो विलियम वेडरबर्न संस्थापकों में से ही एक थे। 1889 में कांग्रेस का सभापति चुन कर आपको आपकी सेवाओं के लिए सम्मानित किया गया। उस कांग्रेस की यह भी एक विशेषता ही थी कि उसमें प्रतिनिधि भी 1889 ही आये थे। आपकी सबसे बड़ी सेवा ब्रिटिश कांग्रेस कमेटी का संचालन करना था। कांग्रेस के कर्णधारों की उन दिनों यह धारणा थी कि ब्रिटिश जनता और ब्रिटिश पार्लिमेन्ट के सामने ज़ोरों से आन्दोलन किया जाना चाहिए। इसीलिए ब्रिटिश कांग्रेस कमेटी की स्थापना की गई थी। बरसों आप उसके प्रधान रहे। उसके लिए दस हजार से पचास हजार रुपये तक प्रति वर्ष खर्च किया जाता था। भारत से मिलने वाली अपनी पेंशन आप भारत के लिए ही खर्च देते थे। 1897 से 1917 तक लगातार छब्बीस अधिवेशनों में आप की सेवाओं के लिए आपके प्रति कांग्रेस की ओर से कृतज्ञता प्रगट की जाती रही है।

 

कहने को राजनैतिक अधिकारों, किन्तु वास्तव में सरकारी नौकरियों तथा पदों के बटवारे के लिए हिन्दू-मुस्लिम एकता की चर्चा का सूत्रपात 1907 के लगभग हुआ था। जब यह चर्चा जोरों पर थी, तब हिन्दू ओर मुसलमान नेताओं का ध्यान एकाएक आपकी और गया। 72 वर्ष की वुद्धावस्था में आपको इंग्लैंड से भारत आने के लिए निमन्त्रित किया गया। आपके सभापतित्व में दोनों पक्ष के नेताओं की एक कांफ्रेंस हुई। उसका आयोजन करने तथा उसको सफल बनाने का अधिकांश श्रेय आपको ही था। अनेक समस्‍यायें उसमें सुलझा ली गई थीं। सर आगा खां को भी आपने सहमत कर लिया था। उसी वर्ष इलाहाबाद में कांग्रेस के आप दुबारा सभापति चुने गये थे। आपकी ही प्रेरणा से सर आगा खां नागपुर में मुस्लिम लीग का अधिवेशन एक दिन पहले समाप्त करके स्पेशल ट्रेन से मुसलमान-प्रतिनिधियों के साथ कांग्रेस में सम्मिलित होने के लिए पहली जनवरी को इलाहाबाद पहुंचे थे। वहां समझौता बोर्ड बनाने का निश्चय करके एक कमेटी बना दी गई थी। उसके बाद आपने समस्त भारत का भ्रमण किया। आप जहां गये वहां आपका अपूर्व स्वागत हुआ। पूना की सार्वजनिक सभा, बम्बई की रिपन क्लब और कलकत्ता के नागरिकों की ओर से आपको मानपत्र दिये गये। 1904 में भी आप सर हेनरी काटन के साथ भारत आये थे।

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1917 तक विलियम वेडरबर्न इंग्लैंड में भारत के लिए आन्दोलन करते रहे। ब्रिटिश पत्रों में लेख लिखने के अलावा आपने भारतीय समस्याओं पर कई छोटी-छोटी पुस्तिकाएं भी लिखीं। क्रिमिनल प्रोसीजर, आंंर्बिट्रेशन कोर्ट, एग्रिकल्चर बैंक और ग्राम्य-पंचायत आदि विषयों पर आपके पैम्फलेट बहुत अच्छे हैं। एक पुस्तक का नाम है “स्कैल्टन एड दी जुबिली फीस्ट।” कांग्रेस के संस्थापक मि० ह्यूम का जीवन चरित भी आपने लिखा है। माण्ट फोर्ड सुधारों के लिए 80 वर्ष की वृद्धावस्था में भी आपने खूब आंदोलन किया। वृद्ध शरीर और जीर्ण स्वास्थ्य उस मेहनत का साथ नहीं दे सके। भारत के लिए आमरण सेवारत का अनुष्ठान करने वाले इस अलौकिक महापुरुष विलियम वेडरबर्न का देहावसान 1918 की 25 मार्च को हो गया।

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