सर हेनरी कॉटन का जीवन परिचय हिन्दी में
सर हेनरी कॉटन उन थोड़े से भारत हितैषी सह्रदय अंग्रेजों में ऊंचा स्थान रखते थे, जो सिविल सर्विस में रहकर भी भारत की वास्तविक उन्नति हृदय से चाहते थे और समय समय पर सरकार से तीव्र मतभेद प्रकट करते हुए उसकी नाराजगी और क्रोध की परवा नहीं करते थे।
सर हेनरी कॉटन का जीवन परिचय हिन्दी में
सर हेनरी कॉटन का जन्म 13 सितम्बर सन् 1845 को तंजौर के एक गांव में हुआ था। सर हेनरी कॉटन के परिवार का संबन्ध भारत से बहुत पुराना था। सर हेनरी कॉटन के दादा कप्तान जोजेफ़ कॉटन ईस्ट इण्डिया कम्पनी में नौकर थे और बाद में उसके डारेक्टर हो गये। उनके पुत्र जान कॉटन भी तंजौर में कलक्टर रहे और बाद में डारेक्टर बना दिये गये। उनके पुत्र और हेनरी कॉटन के पिता जोजेफ़ जान कॉटन ने मद्रास की सिविल सर्विस में सन् 1831 में प्रवेश किया और वहीं सर हेनरी कॉटन का जन्म हुआ।
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आक्सफोर्ड और लंदन के किंग्स कालेज में सर हेनरी कॉटन ने उच्च शिक्षा प्राप्त की। 1867 में सिविल सर्विस की परीक्षा देकर भारत आये और 22 वर्ष की आयु में मिदनापुर जिले के असिस्टैंट मजिस्ट्रेट नियुक्त हुए। ग्यारह वर्ष बाद आप चटगांव के कलक्टर बना दिये गये। वहां से आप बोर्ड आफ़ रेवेन्यू के सेक्रेटरी, पुलिस कमिश्नर, कलकत्ता कारपोरेशन के चेयरमैन, बंगाल-सरकार के चीफ़ सेक्रेटरी आदि विभिन्न पदों पर रहे। कुछ समय तक आप लेजिस्लेटिव कौंसिल के सदस्य भी रहे। 1892 में सरकार ने आपको सी० एस० आई० का खिताब दिया। सन् 1896 में आप सरकार के होम सेक्रेटरी और फिर आसाम के चीफ़ कमिश्नर चना दिये गये। सरकार ने आपको के० सी० एस० आई० की उपाधि भी दी थी।

यद्यपि सर हेनरी कॉटन उस सिविल सर्विस में आये थे जिसमें नम्रता और सेवा का अत्यन्त अभाव रहता है, तथापि आप इसके अपवाद थे। भारत से कुछ पुराना संबन्ध होने के कारण आप हृदय से भारतीयों को प्रेम करते थे। आप न केवल भारत की स्थिति का और विशेषकर उसमें हुई नव भावनाओं और आकांक्षाओं का सूक्षम निरीक्षण करते रहे, किन्तु उनको उत्साहित और प्रेरित भी करते रहे। आपका यह विश्वास था कि सरकार की भारतीयों पर विश्वास न करने की नीति अनुचित है। भारतीयों को शासन में पूरे अधिकार देने के आप पक्षपाती थे। आप यह मानते थे कि वे अंग्रेजों से किसी तरह कम नहीं हैं। आप समय-समय पर अपने ये विचार उच्चाधिकारियों की अप्रसन्नता की परवा न कर उन्हें जताते रहते थे। पत्रों में भी आप यदा-कदा लिखते रहते थे।
1879 में आपके “भारतवर्ष की आवश्यकता और इंग्लैर्ड का कर्तव्य लेख से इंग्लैंड में बड़ा आन्दोलन हुआ। 1885 में सर हेनरी कॉटन की प्रसिद्ध पुस्तक न्यू इंडिया’ प्रकाशित हुई। लाई रिपन की सुधार-नीति के आप कट्टर समर्थक थे। आप केवल ब्रिटेन को ही उसका कर्तव्य नहीं बताते रहें, बल्कि भारतीयों को भी राजनैतिक विषयों में दिलचस्पी लेने के लिए प्रेरित करते रहते थे। सरकारी अफसरों की इस नीति के कि विद्यार्थियों को राजनीति में भाग नहीं लेना चाहिए, आप विरूद्ध थे। नवीन यूनिवर्सिटीएक्ट का आपने खुल्लमखुल्ला विरोध किया। लार्ड कर्जन के साथ बहुत से विषयों पर मतभेद प्रकट किया। भारतीयों के प्रति किये जाने वाले अन्याय का भांडाफोड़ करते हुए आप यह भी भूल जाते थे कि आप सरकारी नौकर हैं। इसका एक उदाहरण दे देना काफी होंगा। आसाम के दरिद्र मजदूरों की करुण कहानी सुनाते हुए आपने बड़े लाट की कौंसिल में कहा था—
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“वह दुखियों की राम कहानी है। हैं लार्ड महोदय, मैंने इस शोचनीय विषय पर बहुत कुछ कहा है। क्या मुझे अपने कथन के समर्थन में अभी कुछ और कहने की भी जरूरत है। क्या यह स्वतः सिद्ध नहीं है। क्या उनकी दुःखपूर्ण स्थिति के प्रति मुझ में क्रोध पैदा न होगा?मैं सच कहता हूँ कि इन अभागों की राम कहानी का और इनके साथ जो अन्याय और अनुचित बर्ताव हो रहा है उसका वर्णन करते-करते मेरी नसों का खून खोलने लगा है। ” इस तरह की स्पष्टवादिता आपके समस्त सर्विस-काल में रही इस सबका परिणाम निश्चित था, सरकार का असन्तोष। कहते हैं कि आप बंगाल के छोटे लाट बनाये जाने वाले थे, लेकिन आपको वह पद नहीं दिया गया। उचाधिकारियों से हमेशा की अनबन के कारण आपने 1902 में सरकारी नौकरी से इस्तीफ़ा दे दिया और इंग्लैंड चले गये।
सर हेनरी कॉटन स्वतंत्र होकर भारत के संबन्ध में और भी साहस के साथ प्रचार करने लगे। आपकी इन सेवाओं को भारत भूल न सकता था। 1904 में बम्बई में होने वाले कांग्रेस के बीसवें अधिवेशन के सर हेनरी कॉटन सभापति बनाये गये। आपका सभापति-पद से दिया हुआ भाषण एक विशेषता रखता है। सबसे पहले आपने ही संयुक्तराष्ट्र अमेरिका की तरह भारत के लिए स्वराज्य की योजना पेश की थी।
सन् 1905 में सर हेनरी कॉटन पार्लिमेन्ट के उम्मीदवार खड़े हुए। कांग्रेस ने भी एक प्रस्ताव द्वारा आपका समर्थन किया। लन्दन में दादाभाई नौरोजी दो संस्थायें कायम कर आये थे। उनमें पूर्ण सहयोग देकर आप बरसों तक इंग्लैंड में भारत के लिए आन्दोलन करते रहे। पार्लियामेंट के सदस्य होकर भी आपने भारत को नहीं भुलाया और आप भारत के साथ अधिक उदार नीति बरतने की आवश्यकता पर सदा ही जोर देते रहे।आप अंग्रेज थे और भारत में शासक बनकर आये थे। पर रहे यहां सेवक बनकर और यहां से लोटे उसके हितैषी होकर। 22 अक्टूबर सन् 1915 में सर हेनरी कॉटन के देहान्त से भारत का एक सच्चा, सहृदय ओर इमानदार हितैषी इस संसार से उठ गया। भारत हितैषी अंग्रेजों में आपका नाम सदा ही सबसे पहले कृतज्ञता के साथ लिया जाता रहेगा।
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