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श्रवणबेलगोला कर्नाटक मे स्थित प्रमुख जैन तीर्थ स्थल

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बैंगलोर से 140 कि.मी. की दूरी पर, हसन से 50 किमी और मैसूर से 83 किलोमीटर दूर, श्रवणबेलगोला दक्षिण भारत में सबसे लोकप्रिय जैन तीर्थस्थल केंद्र में से एक है। इस जगह का नाम शहर के मध्य में तालाब के नाम पर रखा गया है (बेला-कोला का मतलब सफेद तालाब है)। यह बैंगलोर से लोकप्रिय 2 दिन की यात्रा और कर्नाटक में एक प्रमुख विरासत / ऐतिहासिक स्थल है।श्रावणबेलगोला बहुबली मूर्ति के लिए प्रसिद्ध है जो दुनिया में सबसे ऊंची मोनोलिथिक पत्थर की मूर्ति माना जाता है, जिसमें ग्रेनाइट के एक ब्लॉक से बने 58 फीट की ऊंचाई होती है। गोमतेश्वर मंदिर 3347 फीट की ऊंचाई पर एक पहाड़ी के शीर्ष पर बनाया गया है, जिसे विंध्यागिरी पहाड़ी (जिसे डोडदाबेटा या इंद्रगिरी के नाम से भी जाना जाता है) कहा जाता है। लगभग 620 कदम पहाड़ी के नीचे से इस मंदिर तक पहुंच प्रदान करते हैं। बहुबली की नग्न मूर्ति को पूर्णता के साथ ध्यान से नक्काशीदार बनाया गया है। भगवान गोमेतेश्वर (भगवान बहुबली) भगवान अदिनाथ नाम के पहले जैन तीर्थंकर के पुत्र थे। भगवान आदिनाथ के 99 अन्य पुत्र थे और जब उन्होंने अपना राज्य छोड़ दिया, तो दोनों भाइयों, बहुबली और भारथ...

अहिच्छत्र जैन मंदिर - जैन तीर्थ अहिच्छत्र का इतिहास

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अहिच्छत्र उत्तर प्रदेश के  बरेली जिले की आंवला तहसील में स्थित है। आंवला स्टेशन से अहिच्छत्र क्षेत्र सडक मार्ग द्वारा 18 किमी है। अहिच्छत्र क्या है? अहिच्छत्र स्थान एक प्रसिद्ध जैन तीर्थ है। यह क्षेत्र जैन मान्यता के अनुसार एक कल्याणक और अतिशय स्थान है। जिसका जैन धर्म मे विशेष महत्व है। अहिच्छत्र जैन मंदिर पर बडी संख्या में जैन श्रृद्धालुओं का जमावडा लगा है। यहां साल में एक विशाल मेला भी लगता है। अहिच्छत्र को कल्यायक क्षेत्र क्यो कहा जाता है और इसका क्या महात्म्य है अहिच्छत्र आजकल रामनगर गांव का एक भाग है। इसको प्राचीनकाल में संख्यावती नगरी कहा जाता था। एक बार भगवान पार्श्वनाथ मुनि दशा में विहार करते हुए संख्यावती नगरी के बाहर उद्यान में पधारे और वहा प्रतिमा योग धारण करके ध्यानलीन हो गये। संयोगवश संवर नामक एक देव वायु विमान द्वारा आकाश मार्ग से जा रहा था। ज्यों ही विमान ध्यानलीन पार्श्वनाथ के ऊपर से गुजरा कि वहीं रूक गया। उस तपस्वी ऋद्धिधारी मुनि को कोई सचेतन या अचेतन वस्तु लांघकर नहीं जा सकती थी। संवर देव ने इसका कारण जानने के लिए नीचे की ओर देखा। पार्श्वनाथ को देखते ही जन्म जन्म...

शौरीपुर बटेश्वर श्री दिगंबर जैन मंदिर - शौरीपुर का इतिहास

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शौरीपुर नेमिनाथ जैन मंदिर जैन धर्म का एक पवित्र सिद्ध पीठ तीर्थ है। और जैन धर्म के 22वें तीर्थंकर भगवान नेमिनाथ की जन्म स्थली है। शौरीपुर बटेश्वरनाथ से 4किमी की दूरी पर जंगलों में स्थित है। बटेश्वरनाथ हिन्दू धर्म का प्रसिद्ध तीर्थ होने के साथ ही अतिशय क्षेत्र भी है। बटेश्वरनाथ में भगवान शिव के 108 मंदिर है। लेकिन अपने इस लेख में हम जैन तीर्थ शौरीपुर के बारे में जानेंगे। शौरीपुर भगवान नेमिनाथ का दिगंबर जैन मंदिर है। जैन समुदाय में इस स्थान का बहुत बड़ा महत्व है। बडी संख्या में यहां जैन श्रृद्धालु वर्ष भर आते रहते है।   शौरीपुर जैन तीर्थ का महत्व राजा समुद्रविजय की रानी शिवा के गर्भ से श्रावण सुदी 6 को इस शौरीपुर (प्राचीन नाम शौर्यपुर ) की इस पवित्र धरा पर भगवान नेमिनाथ जिनेन्द्र 22वें तीर्थंकर का जन्म हुआ था। उनके जन्म के समय इंद्र ने रत्नों की वर्षा की थी। भगवान नेमिनाथ बचपन से ही संसार से विरक्त प्रकृति के थे। जूनागढ़ सौराष्ट्र के राजा उग्रसेन की पुत्री से उनका विवाह निश्चित हुआ था। विवाह के लिए जाते समय अनेक मूक पशुओं की करूणा क्रदंन से दुखी होकर नेमिनाथ जी ने कंकण आदि बंधन तोड़ ...

त्रिलोक तीर्थ धाम बड़ागांव - बड़ा गांव जैन मंदिर खेडका का इतिहास

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त्रिलोक तीर्थ धाम बड़ागांव या बड़ा गांव जैन मंदिर अतिशय क्षेत्र के रूप में प्रसिद्ध है। यह स्थान दिल्ली  सहारनपुर सड़क मार्ग उत्तर प्रदेश के बागपत जिले के खेडका कस्बे के पास रावण उर्फ बड़ा गांव नामक स्थान पर स्थित है। खेडका से बड़ा गांव जाने के लिए 4 किमी की पक्की सड़क है। यहा से रिक्शा, आटो, तांगा आदि आसानी से बड़ागांव के लिए मिल जाते है। बड़ागांव से होकर त्रिलोक तीर्थ धाम के लिए रास्ता जाता है। त्रिलोक तीर्थ धाम बड़ागांव के बिल्कुल पास है। यह स्थान जैन धर्म का प्रमुख तीर्थ माना जाता है। यहां 16 मंजिला 317 फुट ऊंचा विशाल मंदिर है। जिसके ऊपर भगवान आदिनाथ जी की पद्यासन 31 फिट ऊंची प्रतिमा दार्शनिक है। तथा 41 फिट ऊंचा मान स्तंभ भी चित्ताकर्षक है। त्रिलोक तीर्थ धाम लगभग 50 हजार वर्ग गज फैला हुआ एक मनोरम ऐतिहासिक धार्मिक स्थान है।   त्रिलोक तीर्थ धाम बड़ागांव का इतिहास – बड़ा गांव जैन मंदिर का इतिहास इस मंदिर की प्रसिद्धि अतिशय क्षेत्र के रूप में है। कुछ वर्षो पहले यहां एक टीला था। जिस पर झाड़ झंखाड़ उगे हुए थे। गांव देहात के लोग यहां मनौती मनाने आते रहते थे। अपने जानवरों की बीमार...

पारसनाथ का किला बढ़ापुर का ऐतिहासिक जैन तीर्थ स्थल माना जाता है

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उत्तर प्रदेश के बिजनौर जिले में नगीना रेलवे स्टेशन से उत्तर पूर्व की ओर बढ़ापुर नामक एक कस्बा है। वहां से चार मिल पूर्व की कुछ प्राचीन अवशेष दिखाई पड़ते है। इन्हें पारसनाथ का किला कहते है। इस स्थान का नामकरण तेईसवें तीर्थंकर भगवान पार्श्वनाथ के नाम पर हुआ लगता है। पारसनाथ किले का इतिहास पारसनाथ के इस किले के संबंध में अनेक जनश्रुतियां प्रचलित है। एक जनश्रुति के अनुसार पारस नामक किसी राजा ने यहाँ किला बनवाया था। कहते है कि उसने यहाँ कई जैन मंदिरों का भी निर्माण कराया था। हांलाकि इस समय यहां कोई जैन मंदिर नहीं है। अपितु प्राचीन मंदिरों और किले के भग्नावशेष चारों ओर कई वर्ग मील के क्षेत्र में बिखरे पड़े है। इन अवशेषों का अभी तक विधिवत अध्ययन नहीं हुआ है। कुछ उत्खनन अवश्य हुआ है। समय समय पर यहां जैन मूर्तियों या जैन मंदिरों से संबंधित अन्य सामग्री उपलब्ध होती रहती है। उपलब्ध सामग्री के अध्ययन से ज्ञात हुआ है कि प्राचीन काल में यह स्थान जैन धर्म का प्रमुख केंद्र था। यहां कई तीर्थंकरों के पृथक पृथक मंदिर बने हुए थे। पारसनाथ का मंदिर इन सब में प्रमुख था। इसलिए इस स्थान का नाम पारसनाथ पड़ गया।...

कम्पिल का इतिहास - कंपिल का मंदिर - कम्पिल फेयर इन उत्तर प्रदेश

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कम्पिला या कम्पिल उत्तर प्रदेश के  फरूखाबाद जिले की कायमगंज तहसील में एक छोटा सा गांव है। यह उत्तर रेलवे की अछनेरा – कानपुर शाखा के कायमगंज स्टेशन से 8 किमी दूर है। स्टेशन से गांव तक पक्की सड़क है। बस, तांगे, आटो आदि आसानी से मिल जाते है। कंपिल एक जैन तीर्थ स्थल है। कंपिल 13वें तीर्थंकर भगवान विमलनाथ का जन्म स्थान, तप स्थान, तथा केवलज्ञान प्राप्ति का कल्याणक क्षेत्र है। कंपिल का जैन मंदिर बहुत प्राचीन है। तथा कम्पिल जैन टेम्पल के साथ साथ कम्पिल मेला भी बहुत फेमस है। यहां बड़ी संख्या में श्रृद्धालु आते है। कंपिल कल्याणक क्षेत्र क्यों है – कम्पिला का महात्म्य कम्पिला में तेहरवें तीर्थंकर भगवान विमलनाथ का जन्म हुआ था। उस समय इक्ष्वाकुवंशी महाराज कृतवर्मा यहां के शासक थे। ये भगवान ऋषभदेव के वंशज थे। उनकी महारानी के गर्भ में ज्येष्ठ कृष्ण दसमी के दिन सहस्त्रार स्वर्ग के इंद्र का जीव आयु पूर्ण होने पर आया। देवो ने आकर भगवान का गर्भ कल्याणक उत्सव मनाया। नौ माह पूर्ण होने पर भगवान का जन्म हुआ। उस समय चारों निकाय के देवो और इंद्र ने भगवान को सुमेरु पर्वत पर ले जाकर उनका जन्माभिषेक किया और ...

चन्द्रवाड़ अतिशय क्षेत्र प्राचीन दिगंबर जैन मंदिर - चन्दवार का प्रसिद्ध युद्ध, इतिहास

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चन्द्रवाड़ प्राचीन जैन मंदिर फिरोजाबाद से चार मील दूर दक्षिण में यमुना नदी के बांये किनारे पर आगरा जिले में अवस्थित है। यह एक ऐतिहासिक नगर रहा है। आज भी इसके चारों ओर मिलों तक खंडहर दिखाई पडते है। यह एक जैन अतिशय क्षेत्र है। तथा प्राचीन समय में जैन धर्म का मुख्य केंद्र भी रहा है। चन्द्रवाड़ का इतिहास – हिस्ट्री ऑफ चंदावर वि.स. 1042 में यहां का शासक चंद्रपाल नामक दिगंबर जैन पल्लीवाल राजा था। कहते है कि उस राजा के नाम पर ही इस स्थान का नाम चन्द्रवाड़ या चन्दवार या चंदावर पड़ गया। इससे पहले इस स्थान का नाम असाई खेड़ा था। इस नरेश ने अपने जीवन में कई प्रतिष्ठिता कराई। वि.स. 1053 में इसने एक फुट आवगाहना की भगवान चन्द्रप्रभ की स्फटिक मणि की पदमासन प्रतिमा की प्रतिष्ठता करायी। इस राजा के मंत्री का नाम रामसिंह हारूल था, जो लम्बकचुक था। इसने भी वि.स. 1053 — 1056 में कई प्रतिष्ठाएं करायी थी। इसके द्वारा प्रतिष्ठित कतिपय प्रतिमाएं चन्द्रवाड़ के जैन मंदिर में अब भी विद्यमान है। ऐसे भी उल्लेख प्राप्त होते है। कि चंदावर में 51 प्रतिष्ठाएं हुई थी। उज्जैन का इतिहास और उज्जैन के दर्शनीय स्थल इतिहास ग्रंथों...

आगरा जैन मंदिर - आगरा के टॉप 3 जैन मंदिर की जानकारी इन हिन्दी

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आगरा एक प्रसिद्ध ऐतिहासिक शहर है। मुख्य रूप से यह दुनिया के सातवें अजूबे  ताजमहल के लिए जाना जाता है।  आगरा धर्म का भी आतिशय क्षेत्र रहा है। मुगलकाल से पूर्व और मुगलकाल में भी यहां जैनों का प्रभाव रहा है। अकबर के दरबारी रत्नों मे एक जैन समाज के ही थे। आगरा में अनेक जैन मंदिर है। इस समय आगरा जैन मंदिर और धर्मशालाओं की कुल संख्या 36 है। पंडित भगवतीदास ने अर्गलपुर जैन वन्दना में जिन 48 जैन मंदिरों व चैत्यालयों का उल्लेख किया है। उसमें से कुछ रहे नहीं कुछ नये बन गये है। किंतु इन आगरा के जैन मंदिरों में से यहां आगरा के तीन प्रसिद्ध जैन मंदिरों का उल्लेख हम अपने इस लेख में करेगें। जो मूर्तियों की प्राचीनता और अतिशय के कारण अत्यधिक प्रसिद्ध है। इनमें से एक है ताजगंज के मंदिर की चिन्तामणि पार्श्वनाथ की प्रतिमा। दूसरी शीतलनाथ भगवान की भुवन मोहन मूर्ति है। और तीसरा मोती कटरा का पंचायती बड़ा मंदिर है। आगरा जैन मंदिर – आगरा के टॉप 3 जैन मंदिर आगरा जैन मंदिर श्री चिन्तामणि पार्श्वनाथ जैन मंदिर ताजगंज आगरा :—– पं. भगवतीदास ने सुल्तानपुर की जिस चिन्तामणि पार्श्वनाथ की प्रतिमा का उल्लेख कि...

दिल्ली के जैन मंदिर - श्री दिगंबर जैन लाल मंदिर, नया मंदिर, बड़ा मंदिर दिल्ली

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दिल्ली भारत की राजधानी है। भारत का राजनीतिक केंद्र होने के साथ साथ समाजिक, आर्थिक व धार्मिक रूप से इसका बहुत बड़ा महत्व रहा। प्राचीन समय से यहां अनेक धर्म, संप्रदाय, प्रदेश व जाति के लोग रहते है। जिसके परिणामस्वरूप यहा सभी धर्मों के धार्मिक स्थान होना लाजिमी है। अपने इस लेख में हम दिल्ली के जैन मंदिर के बारेमें विस्तार से जानेंगे। वैसे तो दिल्ली में जैन धर्म मंदिर बडी संख्या में आपको भिन्न भिन्न स्थनों पर मिल जायेंगे। लेकिन ज्यादातर वर्तमान में निर्मित मंदिर है। दिल्ली के जैन मंदिर या  दिल्ली के जैन टेम्पल शीषर्क नामक इस लेख में हम सिर्फ उन मंदिरों का जिक्र करेगें जो अपनी प्राचीनता, मूर्ति की प्राचीनता व महत्व तथा अतिशय के लिए प्रसिद्ध है और जैन धर्म धार्मिक स्थलों में महत्वपूर्ण स्थान रखते है। दिल्ली के जैन मंदिर – दिल्ली के प्रसिद्ध जैन मंदिर दिल्ली के जैन मंदिर श्री दिगंबर जैन लाल मंदिर यह मंदिर पुरानी दिल्ली में लाल किले के लाहौरी गेट के सामने है। यह मंदिर दिल्ली के जैन मंदिर में सबसे प्राचीन है। जहां यह मंदिर बना हुआ है। वहां मुगल बादशाह शाहजहां के समय में उर्दू बाजार नामक ए...