आनंद मोहन बोस का जीवन परिचय हिन्दी में
आनंद मोहन बोस (वसु) जिन्को कांग्रेस बुजुर्गों की पंक्ति में पूर्वी बंगाल का चमकता हुआ सितारा कहा जाता है, कांग्रेस के ही एक महान पुरुष नहीं थे, बल्कि ब्रह्म-समाज के भी एक चोटी के नेता थे और बंगाल को न केवल राजनैतिक बल्कि सामाजिक, नैतिक एवं शिक्षा के लिए प्रेरणा देने में भी अग्रणी थे पूर्वी बंगाल के मैमनसिंह जिले में 1846 में आनंद मोहन बोस का जन्म हुआ। बाल्यकाल का कोई विशेष ब्यौरा नहीं मिलता, पर यह तय है कि आप छोटी आयु से ही प्रतिभा-सम्पन्न थे।
आनंद मोहन बोस का जीवन परिचय हिन्दी में
प्रारम्भिक शिक्षा आपकी कलकत्ता में हुई और 16 वर्ष की अवस्था में 1862 में कलकत्ता-यूनिवर्सिटी की मैट्रिक परीक्षा में आप प्रथम रहे। एफ़० ए० और बी० ए० की परीक्षाओं में पास होने वाले विद्यार्थियों में आपका नम्बर सब से ऊपर रहा। एम० ए० की परीक्षा गणित में दी और उसमें भी सर्व प्रथम रहे। इससे उच्चाधिकारियो में खास कर यूनिवर्सिटी के तत्कालीन वाइस चान्सलर सर हेनरी समरनमैन के दिल में आपकी इज्ज़त बढ़ गई और साथ ही आपको 10000 रु०की रायचन्द्र प्रेमचन्द छात्रवृत्ति भी मिल गई। कुछ समय तक आनंद मोहन बोस प्रेसिडेन्सी कालेज में गणित के प्रोफ्रेसर रहे, फिर 1870 में इंग्लैंड जाकर गणित की उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिए कैम्ब्रिज के क्राइस्ट कालेज में भर्ती हुए। अपनी योग्यता के कारण वहां कैम्ब्रिज यूनियन के मंत्री हुए और फिर उसके अध्यक्ष हो गये, जोकि बहुत बढ़े सम्मान का पद है। तीन साल पढ़कर मैथेमेटिकल ट्रिपोस में सफल हुए और रेंगलरा में ऊंचा दर्जा हासिल किया। पश्चात् 1874 में बैरिस्टरी पास करके हिन्दुस्तान लौट आये।
वकालत में शीघ्र ही आपको सफलता मिली, हालांकि आपने हाईकोर्ट के बजाय ज़्यादातर वकालत मुफ़स्सिल में ही की। अपनी आय का अधिकांश भाग आपने आसाम के चाय-व्यवसाय में लगाया। पर, आपका मन तो धार्मिक, शिक्षणात्मक एवं राजनैतिक दिशाओं में लगा रहता था। इसलिए वकालत के पेशे में आपकी आत्मा को सन्तोष न मिला और जल्दी ही उससे आपने अवकाश ग्रहण कर लिया।

शिक्षा की दिशा में आनंद मोहन बोस ने विशेष काम किया। शिक्षा-समस्याओं में आपकी गहरी दिलचस्पी थी, जिसके कारण 1877 में आप कलकत्ता यूनिवर्सिटी के फैलो और उसके दो साल बाद उसकी सिंडीकेट के सदस्य नियुक्त हुए। यूनिवर्सिटी को अधिक से अधिक शिक्षा देने वाली संस्था बनाने की दृष्टि से उसमें सुधार के अनेक प्रस्ताव उपस्थित किये। 1880 में “’सिटी-स्कूल’ के नाम से कलकत्ता में एक हाई स्कूल खोला, जो क्रमशः आधुनिक ढंग का बढ़िया कालेज बन गया। स्त्री-शिक्षा की और भी आपने समुचित ध्यान दिया। बंग महिलाविद्यालय के नाम से लडकियों की पढ़ाई का एक स्कूल खोला, जो शीघ्रता से उन्नति करते हुए स्त्रियों की उच्च शिक्षा की सुदृढ़ सरकारी संस्था बेथून कालेज में सम्मिलित हो गया। आपकी योग्यता और क्रियात्मक कार्य के कारण शिक्षा शास्त्री के रूप में आपकी ख्याति इतनी बढ़ी कि 1882 में नियुक्त शिक्षा कमीशन की अध्यक्षता ग्रहण करने के लिए तत्कालीन वाइसराय लार्ड रिपन ने आपसे अनुरोध किया, लेकिन आपने इसलिए उस सम्मान को अस्वीकार कर दिया कि हिन्दुस्तानी अध्यक्ष होने के कारण कमीशन की सिफारिशों का महत्व कम हो जायेगा। आप उसके सदस्य हुए और उसके काम में आपने विशेष योगदान दिया। शिक्षा-सम्बन्धी सेवाओं के फल स्वरूप 1895 में कलकत्ता यूनिवर्सिटी ने आपको बंगाल कौंसिल के लिए अपना प्रतिनिधि चुना।
1876 में सुरेन्द्रनाथ बनर्जी आदि के साथ आपने कलकत्ता में इंडियन एसोसियेशन की स्थापना की ओर उसके प्रधानमंत्री बनकर सुरेन्द्रनाथ के उत्साही सहकारी रहे। 1886 में बंगाल-कौंसिल के सदस्य नामज़द हुए और 1895 में यूनिवर्सिटी की ओर से चुने गये। वहां निर्भयता पूर्वक आप जनता के पक्ष को उपस्थित करते थे। 1885 में जब कांग्रेस की स्थापना हुईं तो आपने उसकी मंगल कामना की। स्वास्थ्य की खराबी के कारण हर एक कांग्रेस में तो शरीक न हो सके, पर आपकी सहानुभूति सदा कांग्रेस के साथ रही और जब कभी कलकत्ता में कांग्रेस का अधिवेशन हुआ, तब आप उसमें जाकर सम्मिलित होते रहे ओर उसकी कारवाइयों में अमुख भाग लेते रहे।
1896 के अधिवेशन में आपने शिक्षा-विभाग की नौकरियों की नवीन योजना से हिन्दुस्तानियो के साथ होने वाले अन्याय का तीव्र विरोध किया। इस सम्बन्ध में आपने जो भाषण दिया, वह आपकी वक्तव्यकला का उत्कृष्ट नमूना है। 1897 के अन्त में आपका स्वास्थ्य ज्यादा खराब हुआ और डाक्टरी सलाह पर आबोहवा की तबदीली के लिए जर्मनी चले गये। वहां स्वास्थ्य कुछ सुधरा तो इंग्लैंड गये और वहां अनेक सभाओं में भारत के पक्ष में भाषण दिये। एक सभा में तो आपने इतने जोश, तीव्रता और गरमी में भाषण दिया कि उसके अन्त में आपको स्वयं ऐसा प्रतीत हुआ जैसे कि कोई बहुत बड़ा परिश्रम किया हो। पर, वह आपकी जीवनलीला की समाप्ति का श्रीगणेश था। उसके बाद आप ऐसे बीमार हुए कि प्रायः रोग-शैग्या पर ही पड़े रहे।
इंग्लैंड से भारत लौटने पर आपकी देशभक्ति, निःस्वार्थ सेवा एवं निष्कलंक चरित्र के पुरस्कार स्वरूप राष्ट्र ने आनंद मोहन बोस को 1898 में मद्रास में हुए कांग्रेस के चौदहवें अधिवेशन को सभापति चुना। आपका स्वास्थ्य तो निश्चय ही बिगड़ रहा था, फिर भी इस भारी जिम्मेवारी को आपने बड़ी प्रसन्नता के साथ स्वीकार किया और पूरी योग्यता के साथ निर्वाह किया। सभापति पद से आपने जो भाषण दिया, वह कांग्रेस के भाषणों में सर्वोत्तम माना जाता है और अन्त में धन्यवाद के प्रस्ताव का जवाब देते हुए जो मौखिक भाषण दिया, उसने तो आपको श्रोताओं की नज़रों में और भी ऊंचा उठा दिया। उसके बाद आपका स्वास्थ्य एक दम गिर गया। उसके बाद सिर्फ एक बार बिस्तर से का एक सार्वजनिक समारोह में जा सके और वह तब जब कि बंग-भंग के सरकारी कृत्य के विरोध में सारे बंगाल की एक सूत्रता के द्योतक फ़िडरल हाल की कलकत्ता में स्थापना हुई। 16 अक्तूबर 1906 को आपने उसका उद्घाटन किया और सुरेन्द्रनाथ बैनर्जी ने आपका अंतिम भाषण पढ़कर सुनाया। वह भाषण मानो आपका अंतिम संदेश था, जो इतना शानदार था कि उसका स्थान भारतीय राजनैतिक साहित्य में बे-जोड़ है।
धर्म आपके जीवन में पूरी तरह समाविष्ट था। आप छोटी उम्र में ही ब्रह्म-समाज में शामिल हो गये थे और केशव चन्द्र सेन के नेतृत्व में इस दिशा में बहुत काम किया। पर जब केशवचन्द्र ने अपनी पांच बरस की लड़की का कूचबिहार के राजा के लड़के से विवाह किया तो जागरुक बह्म-समाज में दो दल हो गये और आपने केशवचन्द्र सेन से अलग होकर साधारण ब्रह्म-समाज की स्थापना के रूप में सुधारक दल का नेतृत्व किया। सच तो यह है कि आपका अन्तरतम आध्यात्मिक भावना में रंगा हुआ था। यहां तक कि राजनैतिक भाषण भी धार्मिक और आध्यात्मिक रंग में ही रंगे होते थे। यही कारण है कि जो कुछ कहते थे, उसको उसी तीव्रता से महसूस भी करते थे और कौन कह सकता है कि आपका स्वास्थ्य बिगड़ने का भी यही मुख्य कारण न था। सन् 1906 में आनंद मोहन बोस का स्वर्गवास होने पर उसी साल की काग्रेंस के स्वागताध्यक्ष-पद से डा० रासबिहारी घोष ने जो कहा था उसी को दोहराते हुए यह कहा जा सकता है कि, नि:सन्देह आनंद मोहन बोस में देश, भक्ति धर्म की ऊंचाई पर पहुंची हुई थी।
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें