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बांसगांव का मेला कब लगता है - बांसगांव का इतिहास

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बांसगांव भारत के उत्तर प्रदेश राज्य के  गोरखपुर जिले का एक कस्बा और नगर पंचायत है। यह नगर यहां बसे श्रीनेत वंशीय राजपूतों के लिए जाना जाता है। मूल रूप से यह कहा जाता है, इस स्थान पर श्रीनेत वंशीय राजपूतों का कब्जा था, जो अभी भी अभी भी अपनी कुलदेवी मां दुर्गा के प्राचीन मंदिर में बलिदान (रक्त) चढ़ाने के लिए अश्विन के महीने में इकट्ठा होकर अपनी विजय का जश्न मनाते हैं। कहते है कि श्रीनेत वंशीय उनवल स्टेट के राजा थे। सरकारी अभिलेखों के मुताबिक आमी नदी के किनारे जिला मुख्यालय से लगभग 25 किमी की दूरी पर बसे संग्रामपुर कस्बे को सन् 1160 में ‘स्टेट’ का दर्जा मिला था और आज भी इसे संग्रामपुर के नाम से कम उनवल स्टेट के नाम से ही अधिक जाना जाता है। लगभग 40 हजार की आबादी वाला और लगभग 15 वर्ग किमी क्षेत्रफल में बसा यह कस्बा ग्रामीण व शहर की मिश्रित संस्कृति को समेटे हुए है। बांसगांव का मेला कब लगता है बांसगांव का मेला बांसगांव गोरखपुर का एक प्रमुख स्थान है। बांसगांव में शारदीय नवरात्र के अवसर पर मुख्य रूप से दुर्गाष्टमी और रामनवमी के दिन मेला लगता है। बांसगांव में एक सुन्दर, कलात्मक पुराना मां ...

लेहड़ा देवी मंदिर कहां है - लेहड़ा देवी का मेला कब लगता है

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उत्तर प्रदेश राज्य में एक प्रसिद्ध हिन्दू मंदिर जिसे लेहड़ा देवी मंदिर के नाम से जाना जाता है और इसकी प्रसिद्धि दूर दूर तक फैली हुई है। इस लेहड़ा देवी मंदिर पर लेहड़ा देवी का मेला भी लगता है। इस प्रवित्र वह मनोकामना पूर्ण स्थान के बारे में जानने से पहले हमें यह जानना जरूरी है कि लेहडा देवी मंदिर कहां है। लेहड़ा देवी का यह प्रसिद्ध धाम उत्तर प्रदेश राज्य के महाराजगंज जिले के फरेंदा नगर से 8 किलोमीटर की दूरी पर अरदौना गांव के जंगल में स्थित है। गोरखपुर से लेहडा देवी मंदिर की दूरी लगभग 54 किलोमीटर है। महाराजगंज जिला मुख्यालय से लेहड़ा माता मंदिर की दूरी 38 किलोमीटर, बस्ती से 70 किलोमीटर और कुशीनगर से 101 किलोमीटर है। यह स्थान नेपाल की सीमा से भी नजदीक पडता है। इसलिए उपयुक्त संख्या में नेपाली भक्त भी मनौती मांगने यहां आते रहते हैं। लेहड़ा देवी मंदिर का महत्व लेहड़ा देवी मंदिर का महत्व धार्मिक और ऐतिहासिक रूप से महत्वपूर्ण है। कहा जाता है कि महाभारत काल में पांडवों ने इस क्षेत्र कुछ समय अज्ञातवास किया था। प्रचलित दंतकथा के अनुसार प्राचीन काल में यह स्थान आर्द्र वन के घने जंगलों के घिरा हु...

भैरव जी मेला महराजगंज आजमगढ़ उत्तर प्रदेश

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आजमगढ़  जिला मुख्यालय से 22 किमी0 उत्तर-पश्चिम की ओर महराजगंज के पास एक स्थान है। जहां भैरव जी का प्रसिद्ध मंदिर स्थित है। जहा महाशिवरात्रि ज्येष्ठ दशहरा तथा प्रत्येक माह की पूर्णिमा पर मेला लगता है। जिसको भैरव जी मेला कहां जाता है। यहां एक पुराना बडा तालाब है जिसके तट पर मेले के दिन भारी भीड एकत्र हो जाती है। शिवरात्रि पर लगभग 20-25 हजार किंतु गंगा दशहरा के अवसर पर एक लाख से ऊपर जनसमूह उमड़ पड़ता है। भैरव जी मेला का महत्व कहते है कि इस तालाब में स्नान करने से पुण्य प्राप्त तो होता ही है, चर्मरोग से भी छुटकारा मिल जाता है। यहां एक नाला भी बहता है। इस नाले मे एक कुण्ड है जो सदानीरा है और हमेशा पानी बहता रहता है। इसकी पवित्रता का कारण यह भी बताया जाता है कि यहां पार्वती जी ने यज्ञकुण्ड मे कूदकर अपने प्राणों की आहुति दे दी थी। पक्का घाट का मेला मिर्जापुर उत्तर प्रदेश कथा है कि पार्वती जी के पिता ने बहुत बडा यज्ञ कराया था जिसमे शिवजी को आमंत्रित नहीं किया था। जब पार्वती जी ने शिवजी से यज्ञ मे चलने के लिए निवेदन किया तो शिवजी ने नकार दिया। बहुत अनुनय-विनय करने के बाद भी जब शिवजी नही गये...

कामाख्या देवी मेला गहमर गाजीपुर उत्तर प्रदेश

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गाजीपुर  जिला वाराणसी के प्रभाव-क्षेत्र में आता है। बलिया, आजमगढ़ उसके समीपवर्ती जनपद है।अतः गाजीपुर की सांस्कृतिक परंपरा भी बड़ी समृद्ध है। गंगा तट पर स्थित होने के कारण यहां अनेक पौराणिक अनुष्ठान भी होते रहे हैं। विभिन्‍न अवसरों पर मेलो का आयोजन होता रहा है। ऐसा ही एक स्थान गाजीपुर जिले में गहमर बहुत बडा गांव है वहा कामाख्या धाम है। जहां मां कामाख्या देवी का प्रसिद्ध मंदिर स्थित है। वहा नवरात्र के अवसर पर बहुत कामाख्या देवी मेला लगता है। जिसमे एक लाख से अधिक की भीड हो जाती है। पास-पंडोस के जनपदो के दर्शनार्थी, भक्तगण, मेला-दर्शक यहां आकर देवी का दर्शन तो करते ही है, मेले का भी आनद लेते हैं। कामाख्या देवी मेला का महत्व श्री अजय शेखर के अनुसार “मां कामाख्या की यह मूर्ति पहले फतेहपुर सीकरी मे स्थापित थी तथा वहां उनका पूजन-आराधना होता था। रवना के ऐतिहासिक युद्ध मे राणा सांगा की जब पराजय हुई तो उनकी सेना में भगदड मच गयी। बाबर की फौज ने युद्ध मे राणा सांगा की फौज तथा उनका साथ देने वाले राजाओ, सामतो तथा सरदारो का पीछा किया। फतेहपुर सीकरी के राजा धाम सिंह जू देव जो राणा सांगा का युद्ध मे...

गोरखनाथ का मेला गोरखपुर उत्तर प्रदेश

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उत्तर प्रदेश का  गोरखपुर बाबा गुरु गोरखनाथ के नाम से जाना जाता है। नाथ सम्प्रदाय के संस्थापक तथा प्रथम साधु गुरु गोरखनाथ ने यही रहकर नाथ सम्प्रदाय का प्रचार-प्रसार किया था। वहा नगर के समीप आज भी विशाल मंदिर, पार्श्व मे तालाब बना हुआ है जहा विभिन्‍न अवसरों पर वैसे भी मेला का सा दृश्य उपस्थित हो जाता है। तब भी मकर संक्राति (खिचडी) के अवसर पर यहा बहुत बड़ा गोरखनाथ का मेला लगता है जिसमे लाखो श्रद्धालु यहा आकर जल, अक्षत, खिचडी, फल, फूल, मिष्ठान तिलकूट चढाते है। गोरखपुर पर्यटन स्थल – गोरखपुर के टॉप 10 दर्शनीय स्थल यहा का बाबा गोरखनाथ के मेला लगभग एक माह चलता है। बाबा गोरखनाथ के मेले में देश-विदेश के नाथ सम्प्रदाय के मतानुयायी यहा आते और भजन-कीर्तन मे सम्मिलित होते है। यहा इतना चढावा आता है कि साधु-सतों के भोजन एवं अन्य खर्चे उसी से निकल आते है। सैकड़ों मन खिचडी चढती है। इसलिए इसे गोरखनाथ खिचड़ी मेला भी कहते है। यहा वैसे तो वर्ष भर भजन-कीर्तन चलता रहता है, किंतु खिचडी माह जनवरी मे वृहद आयोजन होता है। यह विश्व-प्रसिद्ध मेला है। गोरखनाथ का मेला गोरखनाथ का मेला इस मेले मे काष्ठ कला की वस्तु...

बाबा गोविंद साहब का मेला आजमगढ़ उत्तर प्रदेश

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आजमगढ़  नगर से लगभग 50 किमी. पश्चिम फैजाबाद मार्ग पर बाबा गोविंद साहब धाम है। जहां बाबा गोविंद साहब का मेला लगता है। यह मेला खिचडी (मकर संक्राति) के अवसर पर 15 दिनो का लगता है। इसे गन्ने वाला मेला भी कहा जाता है, क्योकि यहां गन्ना बहुत पैदा होता है और मेले मे लाखो रूपये का गन्ना बिक जाता है। यहाँ लाल रंग का गन्ना बिकने को आता है और पाच से दस रुपये तक एक गन्‍ना बिकता है। यहां गन्ना चढाने की परंपरा है। उसी का प्रसाद ग्रहण किया जाता है। बाबा गोविंद साहब के मेले का महत्व बाबा गोविन्द साहब हिन्दू थे, जिन्हें बाबा गोविंद शाह भी कहते है। इसे उन्हीं के नाम पर अब शक्तिपीठ की मान्यता प्राप्त हो चुकी है। यहां खिचडी भी चढाई जाती है। खिचडी बनाकर खायी भी जाती है। यहां दो लाख तक दर्शनार्थी पहुच जाते हैं और इतनी खिचडी चढ जाती है कि उसे बांटना पडता है। गरीब, भिखारी खिचड़ी खाकर अधा जाते है। ऐसी मान्यता है कि यहां आकर दर्शन करने से हर प्रकार की मनोकामनाएं पूरी हो जाती हैं। यह स्थान फैजाबाद और आजमगढ़ की सीमा पर स्थित, है, अतः इस मेले से दोनों जनपदों को दुकानों से लाखों रुपये की आय हो जाती है। बाबा गोव...

तरकुलहा का मेला - तरकुलहा देवी मंदिर गोरखपुर

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गोरखपुर  जिला मुख्यालय से 15 किमी0 दूर देवरिया मार्ग पर एक स्थान है तरकुलहा। यहां प्रसिद्ध तरकुलहा माता का तरकुलहा देवी मंदिर स्थित है। जहां तरकुलहा का मेला लगता है। इस स्थान की यहां के लोगों में बहुत मान्यता है। तरकुलहा का मेला और उसका महत्व तरकुलहा का मेला कहते हैं कि यहां तरकुल के एक विशाल वृक्ष के नीचे माँ का प्राकटय हुआ बताया जाता है। बताते है कि यहां शहीद बन्धु नाम के एक स्वतंत्रता सेनानी थे जो माँ के परम भक्त थे। वे माँ को प्रतिदिन एक अंग्रेज की बलि चढाते थे। ऐसा कहा जाता है। अंग्रेज इन्हे पकडते और जब फांसी के तख्ते पर चढाते तो फांसी का फंदा अपने आप टूट जाता था। अंत मे जब उनकी मौत हो गयी तो तरकुल का पेड अपने आप टूट गया और तब देवी ने प्रसन्‍न होकर उन्हे अपनी अक्षय भक्ति प्रदान की। इसके बाद भक्तों द्वारा यहां एक मंदिर की स्थापना की जो आज तरकुलहा देवी मंदिर के नाम से प्रसिद्ध है। इसी मंदिर पर तरकुलहा का मेला लगता है। कजरी तीज कब मनाते हैं – कजरी के गीत – कजरी का मेला यहां चैत्र मास में नवरात्र के अवसर पर बडा मेला लगता है। जो तरकुलहा का मेला कहलाता है। यहा बकरे की बलि चढायी जाती...

सोहनाग परशुराम धाम मंदिर और सोहनाग का मेला

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देवरिया  महावीर स्वामी और गौतमबुद्ध की जन्म अथवा कर्मभूमि है। यह आदिवासी बाहुल्य क्षेत्र भी है, अत कला और संस्कृति का यह जनपद केन्द्र रहा है। यहां कई मेलों का आयोजन समय समय पर होता रहता है। उसी में एक प्रसिद्ध मेला है सोहनाग का मेला। यह मेला देवरिया जनपद मे सलेमपुर थानान्तर्गत सोहनाग नामक स्थान पर लगता है। यहां भगवान परशुराम धाम है, जहां भगवान परशुराम का पौराणिक प्राचीन मंदिर है। देवरिया से सोहनाग की दूरी लगभग 33 किलोमीटर है, बलिया से 75 किलोमीटर, में से 67 किलोमीटर और बिहार राज्य के सिवान से सोहनाग की दूरी लगभग 56 किलोमीटर है। सोहनाग सलेमपुर से 3 किलोमीटर दूर है, जहा सडक मार्ग से बस, जीप, कार आदि से जाया जा सकता है। सोहनाग परशुराम धाम का महत्व सोहनाग के भगवान परशुराम मंदिर का पौराणिक महत्व का है। कहते है कि परशुराम जी ने यही आकर तपस्या की थी और तपस्या भंग करने वाले दुष्टजनों का संहार करने का व्रत भी यही लिया था। उनके नाम पर उस स्थान पर एक मंदिर बना हुआ है, जिसमे उनकी मूर्ति स्थापित है। भदेश्वर नाथ मंदिर का महत्व और भदेश्वर नाथ का मेला प्रचलित कथा के अनुसार के अनुसार भगवान परशुराम ...

दुग्धेश्वर नाथ मंदिर रूद्रपुर - दुग्धेश्वर नाथ का मेला

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उत्तर प्रदेश के  देवरिया जिले में रूद्रपुर नामक एक नगर पंचायत है। रूद्रपुर बाबा दुग्धेश्वर नाथ मंदिर के लिए जाना जाता है।दुग्धेश्वर नाथ भगवान शिवजी का एक नाम है, क्योकि उन्हे दुग्ध स्नान कराया जाता है। शिवरात्रि के अवसर पर यहां कई हजार श्रद्धालु एकत्र होकर बेलपत्र, दूध, फूल, माला चढ़ाकर भजन-पूजन, दर्शन करते है। इस अवसर पर यहां तीन दिवसीय मेला लगता है। इसके अलावा सावन मास में पूरे महिने यहां मेला सा लगा रहता है। बड़ी संख्या में कांवड़िए भक्ति गंगा जल लाकर भगवान दुग्धेश्वर नाथ पर चढ़ाते हैं। बाबा दुग्धेश्वर नाथ के मंदिर और दुग्धेश्वर नाथ के मेले आदि के बारे में जानने से पहले हम इस नगर रूद्रपुर देवरिया का इतिहास जान लेते हैं। रूद्रपुर देवरिया का इतिहास यह सतासी राज्य की राजधानी के रूप मे एक प्रमुख प्रशासनिक केन्द्र था जो आज नगर के रूप मे विद्यमान है। देवरिया जनपद के दक्षिण-पश्चिमाचल मे स्थित रुद्रपुर का इतिहास बहुत पुराना और गौरवपूर्ण है। ऐतिहासिक शोधों के अनुसार रुद्रपुर का उद्भव ईसा के 47वीं शताब्दी के पूर्व माना जाता है। लगभग 500 वर्ष पूर्व महाराज मज्जौली ने अपनी पुत्री दिग्यज कुँ...

कुलकुला देवी मंदिर कहां है - कुलकुला धाम मेला

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कुलकुला देवी मंदिर  कुशीनगर जनपद मे कसया नामक तहसील के एक कुडवा दीलीपनगर गांव है। यहा से चार किलोमीटर पूरब की ओर कुलकुला देवी का प्रसिद्ध धाम है, यहां चैत्र रामनवमी के अवसर पर कुलकुला देवी का मेला लगता है। कसया से देवी धाम की दूरी 14 किलोमीटर है, कुशीनगर जिला मुख्यालय से कुलकुला देवी मंदिर की दूरी 18 किलोमीटर है। फाजिलनगर से 13 किलोमीटर और देवरिया से कुलकुला देवी मंदिर की दूरी 33 किलोमीटर है। यहां सुन्दर देवी प्रतिमा स्थापित है। इस देवी स्थान की स्थानीय लोगो में बहुत मान्यता है। कहा जाता है कि यहां पर जो भी मनौतियां मांगी जाती है, देवी मां की कृपा से पूर्ण होती है। बड़ी संख्या में लोग यहां मनौतियां मनाते हैं और पूजा अर्चना करते हैं। कुलकुला देवी मंदिर का महत्व कुलकुला देवी धाम का महत्व मार्कंडेय पुराण में वर्णित है। मार्कंडेय पुराण के वर्णन के अनुसार सतयुग में राजा सुरत सूर्य और समाधि वैश्य ने मेघा ऋषि से देवी दुर्गा सत्पसती का श्रवण कर तप किया था। जिससे प्रसन्न होकर देवी ने मनवांछित वर दिया। जिसके फलस्वरूप माता के आशिर्वाद से राजा सुरत सूर्य के वंश में राजा मनु की उत्पत्ति हुई। औ...

बांसी का मेला कब लगता है - बांसी मेले का इतिहास

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बांसी एक नदी का नाम है जिस के तट पर क्वार माह की पूर्णिमा को मेला लगता है। इस मेले मे भी दूर-दूर से श्रद्धालु आकर स्नान, भजन, पूजन, कीर्तन में सम्मिलित होते है।  देवरिया जनपद का यह भी बडा प्रसिद्ध मेला है। इसमे ग्राम्य जीवन की झाकी देखने योग्य होती है। गांव की महिलाएं झुंड के झुंड टोलियां बनाकर यहां मंगल-गीत गाती हुई आती है। बांसी का मेला का महत्व इस नदी के महत्व को ‘सौ काशी और एक बांसी’ की लोकोक्ति से समझा जा सकता है। त्रेता युगीन पौराणिक महत्व की यह नदी संबंधित क्षेत्र के लोगों के लिए जीवनदायिनी है। ऐसी मान्यता है कि मिथिला जाते समय भगवान श्रीराम ने विश्वामित्र ऋषि और अपने भाई लक्ष्मण के साथ बांसी नदी के तट पर विश्राम किया था। माघ माह में स्नान के अवसर पर मोक्ष प्राप्ति के लिए इस नदी में लाखों लोग डुबकी लगाते हैं। मान्यता के अनुसार माता सीता संग विवाह के बाद भगवान राम बारात के साथ जनकपुर से वापस अयोध्या लौट रहे थे, तब इस नदी के किनारे पर उन्होंने अपनी बारात के साथ विश्राम किया था। सभी के साथ आचमन और स्नान भी किया था। बांसी का मेला बांसी का मेला और भव्यता क्वार माह की पूर्णिमा को...

बरहज का मेला कब लगता है और मेले का महत्व

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बरहज  देवरिया का एक प्रमुख स्थान है जो पवित्र सरयू जी के तट पर स्थित है। यहां कार्तिक पूर्णिमा के दिन बहुत बड़ा मेला लगता है। जो बरहज का मेला कहलाता है। जिसमे लगभग एक लाख तक दर्शनार्थी एकत्र हो जाते है। कहते है कि अनन्त महाप्रभु ने बरहज में ही तपस्या की थी। बरहज का मेला कार्तिक पूर्णिमा के अतिरिक्त अनन्त चतुर्दशीतथा प्रत्येक अवामस्या को भी यहां मेला लगता है। अनन्त चतुर्दशी पर बरहज का मेला तीन दिन तक चलता है और तीनो दिन भजन-पूजन का वातावरण रहता है। लोग सरयू जी मे स्नान कर मंदिर मे भगवान को जल चढ़ाते हैं, व्रत रहते है। बरहज का मेला और उसका महत्व सरयू तट पर स्थित बरहज आरंभ से ही एक धार्मिक एव आध्यात्मिक केन्द्र रहा है। बरहज एक पूर्व मध्यकालीन नगर है जहां के नीलकंठ मन्दिर मे शिव का लिंग नन्‍दी तथा नवगृह पूजक की मूर्तियां एव समीप के गेट पर बने मन्दिर मे एक विष्णु भगवान की प्रतिमा स्थापित है। इस नगर को अनन्त महाप्रभु की साधना स्थली माना जाता है। जिन्हे ओंकार सिद्धी प्राप्त थी। ऐसी भी मान्यता है कि बर्हज के चार अक्षर (ब+र+ह+ज) क्रमश बद्रीनाथ, रामेश्वरम, हरिद्वार और जगन्नाथपुरी का कुछ कुछ...

रसड़ा का मेला और नाथ बाबा मंदिर रसड़ा बलिया

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बलिया  जिले का रसड़ा एक प्रमुख स्थान है। यहा नाथ संप्रदाय का प्रभाव है, जिसके कारण यहां नाथ बाबा का मंदिर बना हुआ है जहां क्वार दशमी के दिन मेला लगता है। रामलीला का यह मेला बडा प्रसिद्ध है जिसमें 25-30 हजार का जन-समूह उमड पडता है। गांव-देहात के लोग भी आते है। मनोरजन के साधनों में गीत, नाट्य, मदारी का खेल, जादू, कठपुतली का नाच उपलब्ध रहता है।     रसड़ा का धार्मिक महत्व     रसड़ा को नाथ नगरी कहा जाता है। रसड़ा की पहचान ही नाथ बाबा के मंदिर से होती है। नाथ बाबा का यह प्रसिद्ध मंदिर व नाथ मठ लगभग 12 एकड़ के क्षेत्रफल में फैला हुआ है। नाथ बाबा का पूरा नाम श्री अमरनाथ बाबा था बाद में यह नाथ बाबा के नाम से प्रसिद्ध हुए। नाथ बाबा का मन बचपन से ही ईश्वर की भक्ति में लगा रहता था। यहां तक कि उनका अन्य किसी कामों में मन नहीं लगता था। एक दिन नाथ बाबा संसार की भीड़ भाड़ से विमुक्त होकर गन्ने के खेत में छुप गए। जिसका किसी को पता नहीं था, ऐसे ही कई दिन बीत गए। कहते हैं कि जब उस गन्ने के खेत की कटाई शुरू हुई तो उस खेत के गन्ने खत्म ही नहीं हो रहे थे। ऐसा लगता था की कुबेर का धन ह...

सिकंदरपुर का मेला - कल्पा जल्पा देवी मंदिर सिकंदरपुर

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सिकंदरपुर उत्तर प्रदेश राज्य के  बलिया जिले में एक नगर पंचायत व तहसील है। इस नगर को सिकंदर लोदी ने बसाया था जिसके नाम पर इसका नाम सिकंदरपुर पडा है। बलिया से सिकंदरपुर की दूरी लगभग 35 किलोमीटर है। यह नगर यहां स्थित प्रसिद्ध कल्पा जल्पा देवी मंदिर के लिए भी जाना जाता है। सिकंदरपुर में स्थित कल्पा जल्पा देवी मंदिर पर सिकंदरपुर का मेला लगता है। जो आसपास के क्षेत्र में काफी प्रसिद्ध है।   सिकंदरपुर मेले का महत्व और कल्पा जल्पा की कहानी सिकन्दपुर का मेला जिसे कल्पा-जल्पा का मेला भी कहा जाता है। कल्पा-जल्पा दो कन्याएं थी जिनकी बलि सिकन्दर लोदी द्वारा चढ़ायी गयी थी। इसके सन्दर्भ में यह बताया जाता है कि सिकन्दर लोदी जब किले का निर्माण करा रहा था तो जितनी दीवार बनती, रात में वह दीवार गिर जाती थी। जिससे सिकंदर लोदी बहुत क्रोधित हुआ उसने वहां सैनिक लगाकर सुरक्षा व्यवस्था के पुख्ता इंतजाम किए। लेकिन सैनिकों की सुरक्षा के बावजूद भी जो दीवार दिन में बनाईं गई रात को वह फिर गिर गई। बादशाह ने सैनिकों को बुलाकर उसका कारण पूछा, सैनिक उसका कुछ संतुष्ट जवाब नहीं दे पाए। सुरक्षा व्यवस्था और कड़ी कर...

असेगा का मेला - शोकहरण महादेव मंदिर असेगा बलिया

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असेगा एक स्थान का नाम है जो  बलिया जिले के सुखपुरा थानान्तर्गत पड़ता है। असेगा में शिवरात्रि के अवसर पर सात दिन का मेला लगता है, किन्तु शिवरात्रि के दिन लाखो की भीड उमड पडती है। असेगा में भगवान शिव का बडा और पुराना मंदिर है। असेगा में स्थापित महादेव को ‘शोकहरण महादेव” कहकर पुकारा जाता है। यहां रूद्राभिषेक होता है। श्रद्धालु बेलपत्र, अक्षत, जल चढाकर पूजा करते है। शोकहरण नाथ मंदिर का महत्व असेगा का मेला विंध्याचल नवरात्र मेला मिर्जापुर उत्तर प्रदेश असेगा में स्थित शिवलिंग के बारे में कहा जाता है कि इस क्षेत्र में सुरथ नाम के एक राजा हुआ करतें थे। वह अपने पुत्र के कर्मो से हमेशा शोकाकुल रहते थे। जिसके समाधान हेतु राजा सुरथ मेघा ऋषि के पास गए। मेघा ऋषि ने राजा को भगवान शिव की तपस्या करने का उपाय सुझाया। राजा सुरथ ने वर्षों तक भगवान शिव की तपस्या की। राजा सुरथ की तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने लिंग के रूप में राजा सुरथ को दर्शन दिए। राजा सुरथ प्रकट शिवलिंग को वहां स्थानांतरित कर असेगा मे ले आया और यहां स्थापित कर नित्य उसकी पूजा अर्चना करने लगा। धीरे धीरे राजा के सभी दुख व कष्ट दू...

ददरी का मेला कहां लगता है और ददरी मेले का इतिहास

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सरयू का तट पर स्थित  बलिया जनपद अपनी अखंडता, निर्भीकता, बौद्धिकता, सांस्कृतिक एकता तथा साहित्य साधना के लिए प्रसिद्ध है। इसका ऐतिहासिक तथा पौराणिक महत्व है। बलिया शहर से 5 किलोमीटर की दूरी पर ददरी का प्रसिद्ध मेला लगता है। ददरी के मेले के बारे में कहा जाता है कि ददरी मेला भारत का दूसरा सबसे बड़ा पशु मेला है। बलिया ददरी का मेला खाटी भोजपुरी के लिए बलिया, गाजीपुर, देवरिया प्रसिद्ध है। इसे भृगुक्षेत्र कहते है। गंगा और सरयू के पावन हाथों में स्थित इस क्षेत्र का सांस्कृतिक और पौराणिक महत्व है। यह ऋषियो-महर्षियों की तपस्थली रही है। इन ऋषियों में भृगु का नाम मुख्य है। वैसे महर्षि विश्वामित्र, परशुराम और जमदग्नि ने भी यहां अपने आश्रम बसाये थे। शुक्ल यजुर्वेद के अनुसार भृगु वैदिक ऋषि है। “गीता ‘ में श्रीकृष्ण ने कहा था कि में ऋषियों में भृगु हूं। इससे सिद्ध होता है कि भृगु तपे-तपाये ऋषि थे। क्रिप्टो करंसी में इंवेस्ट करें और अधिक लाभ पाएं ददरी का मेला का महत्व इन्होंने भृगु सरिता की रचना की थी। एक प्रकरण के अनुसार भृगु ने शिवजी को लिंग का रूप धारण करने का शाप दिया था। ब्रह्म द्वारा अपने को...

भदेश्वर नाथ मंदिर का महत्व और भदेश्वर नाथ का मेला

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बस्ती , गोरखपुर, देवरिया तीनो एक स्वभाव के शहर है। यहां की सांस्कृतिक परपराए महत्वपूर्ण और अक्षुण्ण रही हैं। सरयू नदी का प्रभाव-क्षेत्र होने के कारण यहां भी सभ्यताओं का उदय-अस्त हुआ है। यहा के मेले और त्यौहार प्राय धार्मिक भावभूमि पर आधारित हैं। पूरा पूर्वाचल आरभ से ही काशी के प्रभाव-क्षेत्र में होने के कारण शिव-साधना का और विन्ध्यांचल के कारण शक्ति-साधना का केन्द्र रहा है। बस्ती नगर से चार किमी की दूरी पर भदेश्वर नाथ का शिव-मंदिर है जहां शिवशत्रि पर बड़ा मेला लगता है। जिसको भदेश्वर नाथ का मेला कहते हैं। यह स्थान सरयू जी के तट पर स्थित है जहा एक पुराना मंदिर है। कहते है यहा शिवजी स्वयं प्रकट हुए थे। बस्ती जिले यह एक मात्र मंदिर है जहां भक्तों की सबसे अधिक भीड़ रहती है। भदेश्वर नाथ मंदिर का महत्व भदेश्वर नाथ मंदिर बाबा भदेश्वर नाथ का वर्णन पुराणों में देखने को मिलता है। बाबा भदेश्वर नाथ मंदिर में स्थापित शिवलिंग के बारे में कहा जाता है कि त्रेता युग में रावण ने भदेश्वर नाथ शिवलिंग की स्थापना की थी। कोटि रूद्र संहिता शिव पुराण के श्लोक में भदेश्वर नाथ का वर्णन भी मिलता है। इसके अलावा इस ...

सुरियावां का मेला - भोरी महजूदा का कजरहवा मेला

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सुरियावां उत्तर प्रदेश राज्य के  भदोही जिले में एक नगर है। यहां भोरी महजूदा में हल षष्ठी व्रत के अवसर पर सावन में कजरी के बाद वाले गुरुवार को यह मेला लगता है। आज से लगभग 80 वर्ष पूर्व घिनहू शर्मा नामक व्यक्ति अपने घर हमहा-हडिया से अपनी ससुराल भोरी आया। गांव की कुमारियों ने उसे कजरी गाकर सुनाने को कहा।उसने असमर्थता व्यक्त की, लेकिन युवतियों ने विनोदवश उसकी चारपाई पलट दी और स्वयं उस पर बैठ गयी। चारपाई का एक पावा उसकी गर्दन पर पड जाने के कारण उसका प्राणात हो गया। बाद मे जब युवतियों को इसकी जानकारी हुईं तो वे आवाक रह गयी। बाद में वही उसकी समाधि बनवा दी गयी। तभी से कजरी के अवसर पर इस क्षेत्र की सभी स्त्रियाँ अपने मायके “भोरी” आकर इस समाधि के पास कजरी गाती है। कहते है जो स्त्रियां नहीं आती उनका अनिष्ट हो जाता है। यहां हरेवा और चमेली नामक युवतियों की भी पूजा की जाती है, क्योकि घिनहू की समाधि पर उन्हीं ने पहली कजरी गायी थी। सुरियावां का मेला यहां युवतियों मे कजरी-दंगल होता है जिससे मारपीट, लहू-लुहान तक हो जाता है। बीच-बचाव करके उन्हें अलग किया जाता है। एक गीत की पक्तिया है- भोरिया के माई,...

देवलास का मेला - देवलास धाम में उत्तर प्रदेश

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उत्तर प्रदेश के  मऊ जनपद में लगने वाला देवलास का मेला बहुत मशहूर है। ऐसी मान्यता है कि देवलास नामक स्थान पर देवल मुनि ने तपस्या की थी। यह भी जनश्रुति है कि महर्षि विश्वामित्र के साथ भगवान राम जब अयोध्या से जा रहे थे तो यही महर्षि देवल के आश्रम पर विश्राम किया था। इस तरह इस मेले का पौराणिक महत्व हो जाता है। बीस दिन तक लगने वाला देवलास का मेला मोहम्मदाबाद -गोहना से घोसी मार्ग पर लगभग आठ किलोमीटर दूर है। यह मेला कार्तिक शुक्ल पक्ष सुदी छठ से प्रारंभ हो जाता है। जिला मुख्यालय में से देवलास की दूरी लगभग 27 किलोमीटर है, तथा आजमगढ़ से भी यह स्थान लगभग इतनी ही दूरी पर पड़ता है। देवलास का महत्व देवलास मंदिर देवलास धाम पर की देव स्थान है भगवान की अलग-अलग मूर्तियां स्थापित हैं। यहां का सबसे प्रसिद्ध सूर्य मंदिर है जिसके पास ही एक पवित्र सरोवर है, सरोवर के जल को गंगा जल की तरह पवित्र माना जाता है। ऐसा कहा जाता है कि छठ पर्व के दिन सूर्य मंदिर सहित अन्य देवालयों में स्वर्ग लोक से देवता उतरते हैं। तथा यहां सरोवर में स्नान करने से सभी पाप नष्ट हो जाते हैं। इसी मान्यता के अनुसार छठ पर्व के अवसर प...

सेमराध नाथ का मेला - सेमराध धाम मंदिर भदोही

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उत्तर प्रदेश के  भदोही जिले में जगीगंज-शेरशाह सूरी मार्ग से गंगा-घाट पर सेमराध नाथ का मंदिर स्थित है। यह मंदिर भगवान शिव को समर्पित है। मंदिर में प्राचीन शिवलिंग स्थापित है। इसी सेमराध नाथ मंदिर पर शिवरात्रि पर भव्य मेला लगता है। जिसे सेमराध नाथ का मेला कहां जाता है, जिसमें भक्तों की काफी भीड़ होती है। सेमराध नाथ मंदिर का महत्व सेमराध नाथ मंदिर में स्थापित शिवलिंग का पौराणिक महत्व है। कहा जाता है कि पुण्डरिक नामक एक राक्षस यहां के जंगलों में रहता था। वह मनुष्य और भक्तों का प्रताड़ित करता था। राक्षस के अत्याचारों से दुखी भक्तों ने भगवान श्रीकृष्ण के प्रार्थना की। भक्तों की प्रार्थना पर भगवान श्री कृष्ण ने पुण्डरिक नामक राक्षस का वध करने के लिए सुदर्शन चक्र छोड़ा जिससे पुण्डरिक का वध तो हो गया लेकिन काशी जलने लगी। सुदर्शन चक्र को प्रकोप को रोकने के भगवान शिव ने त्रिशूल छोड़ा, सुदर्शन और त्रिशूल के टकराव से तेज प्रकाश उत्पन्न हुआ और धरती के अंदर समा गया। कहते हैं कि इसी प्रकाश से इस शिवलिंग की उत्पत्ति हुई। सेमराध नाथ का मेला एक अन्य मान्यता के अनुसार कहते है किसी समय यहां से एक व्या...