दिनशा वाचा का जीवन परिचय - दिनशा ईदलजी वाचा
फारस से निकाली जाकर भारत में आ बसने वाली पारसी जाति ने उन्नीसवीं सदी के अन्त में एक साथ तीन महा पुरुषों को जन्म देकर उस ऋण को अदा किया है, जो भारत में बसने के नाते उस पर चढ़ा हुआ था। भारत के वृद्ध पितामह दादाभाई नौरोजी, बम्बई के बेताज बादशाह फिरोजशाह मेहता और अर्थशास्त्र के महा पंडित दिनशा वाचा का नाम इस सम्बन्ध से सदा याद किया जाता रहेगा।
दिनशा वाचा का जीवन परिचय हिन्दी में
दिनशा वाचा का पूरा नाम दिनशा ईदलजी वाचा था। दिनशा वाचा का जन्म 2 अगस्त 1844 को बम्बई मे हुआ था। एलफिंस्टन इंस्टिट्यूट में प्रारम्भिक शिक्षा प्राप्त करके आप 1858 में उसी कालेज में भर्ती हो गये। विद्यार्थी जीवन में आपकी योग्यता और उत्तम स्वभाव के कारण आप अन्य विद्यार्थियो की अपेक्षा सभी अध्यापकों के बहुत अधिक प्रिय थे। अपने व्यापारिक कार्य में सहायता लेने के लिए आपको पिता ने कालेज से जल्दी ही उठा लिया। पिता के साथ कार्य करते हुए आपने अर्थशास्त्र का जो व्यावहारिक ज्ञान प्रात्त किया, वह आपके बहुत काम आया। उस समय अर्थशास्त्र में आपकी ऐसी रुचि पैदा हुई कि उसमें पंडित्य प्रात्त करके सरकार की आर्थिक नीति की साधिकार कड़ी टीका करने वाले आप पहले व्यक्ति थे।
बॉम्बे बैंक में आपने काम शुरू किया और उस छोटी अवस्था में आपको बैंक की एक प्रधान शाखा का काम संभालने के लिए तैय्यार किया गया। फिर आपने हिसाब परीक्षक मैसर्स बॉडी एण्ड विल्सन फर्म में बतौर सहायक के काम शुरू किया। वहां आपकी प्रतिभा और योग्यता चमक उठी। आपने कोई छोटी-मोटी 10-12 दिवालिया रियासतों और कितने ही बैंकों तथा अन्य संस्थाओं का हिसाब-किताब ठीक किया। अमेरिकन युद्ध के कारण जब 1861-65 में सारे संसार में घोर आर्थिक संकट पैदा हुआ था, तबका वह समय था। उस विकट समय में आपने अपनी योग्यता का उत्कृष्ट परिचय दिया। राबर्टसन ब्राइट के लेखों से आपके हृदय में देशभक्ति की भावना जागृत हुई। उनके लेखों में मुद्रा, विनिमय, अर्थनीति और राजस्व सम्बन्धी विषयों का बहुत गहरा अध्ययन और तीव्र आलोचना रहती थी। उन्हीं के अध्ययन से आपमें भी उन विषयों का पूर्ण पंडित्य प्राप्त करने की इच्छा पैदा हुईं। देशभक्ति और अर्थशास्त्र के पाण्डित्य के मिश्रण से आपके सार्वजनिक जीवन का निर्माण हुआ था।

1874 में बम्बई के रूई के व्यापार-व्यवसाय के साथ आपका सम्बन्ध हो गया। मृत्यु पर्यन्त इस व्यापार व्यवसाय के साथ आपका सम्बन्ध बराबर बना रहा और मृत्यु से दो-तीन वर्ष पहले तक आप उसमें पूरी दिलचस्पी लेते रहे। उसी समय आपने देश के राजनीतिक मामलों में भी विशेष रूप से भाग लेना शुरू कर दिया।
दिनशा ईदलजी वाचा बायोग्राफी इन हिन्दी
बम्बई के म्यूनिसिपल मामलों में दिलचस्पी लेते हुए आपने सार्वजनिक जीवन में प्रवेश किया। श्री मलाबारी के ‘इंडियन स्पैक्टेटर’ नामक पत्र में म्यूनिसिपल मामलों पर आपके धारावाही लेखों ने न केवल आपकी या पत्र की ख्याति को बढ़ाया, बल्कि म्यूनिसिपल प्रबन्ध में बहुत सुधार भी करा दिये। 1896 में म्यूनिसिपल कमेटी के सदस्य बनने के बाद आप अपने प्रस्तावों को कार्य में परिणत करने का उद्योग करने लगे।
केवल बम्बई म्यूनिसिपैलिटीज़ ही नहीं, देश के भी समस्त आर्थिक प्रश्नो–मुद्रा, विनिमय, दुर्भिक्ष, शासन-प्रबन्ध, सेना, व्यापार आदि में भी आप दिलचस्पी लेने लगे। यह कहना कठिन है कि किस विषय से आपको विशेष प्रेम था, क्योंकि प्रायः सभी विषयों में आपका एक समान अबाध प्रवेश था।
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस सरीखी किसी संस्था की आवश्यकता आप 1885 में उसकी स्थापना होने से पहले ही अनुभव करने लग गये थे। इसलिए उसकी स्थापना होने पर आपने उसमें पूरा सहयोग दिया और उसमें सम्मिलित होते ही अर्थनीति-सम्बन्धी अपने पाणिडित्य की पूरी धाक जमा दी। आप प्रायः सभी अधिवेशनों में उपस्थित होते थे और कभी होम-चार्जेज़, कभी विनिमय दर, कभी आबकारी नीति, कभी मुद्रा, कभी स्वदेशी कारखाने, कभी चुगी कभी राजस्व और कभी सैनिक परिस्थिति के विभिन्न पहलुओं पर सरकार की नीति का पर्दाफाश करने वाले निर्भीक भाषण देते थे। आंकड़ों, प्रमाणों तथा अकाटय युक्तियों से पूर्ण प्रत्येक भाषण मार्के का होता था। भाषा भी तीव्र रहती थी। उस समय के नरमदली नेताओं में आप बहुत उग्र माने जाते थे। इसीलिए ग्यारहवीं कांग्रेस में आप “बम्बई का आगबबूला’ के नाम से प्रसिद्ध हुए। कांग्रेस में आपकी योग्यता और विद्वता की धाक थी। वैल्बी कमीशन के सामने जब आपका नाम गवाही के लिए प्रस्तुत किया गया, तो कांग्रेस ने इस पर अत्यन्त प्रसन्नता प्रकट की। आपका प्रत्येक भाषण तत्कालीन आर्थिक प्रश्नों पर पूरी रोशनी डालता है।
1896 से 1913 तक दिनशा वाचा कांग्रेस के संयुक्त प्रधान मंत्री रहे। 1901 में कांग्रेस का सभापति बनाकर दिनशा वाचा की सेवाओं के लिए आपको सम्मानित किया गया। उस पद से दिया गया दिनशा वाचा का भाषण सरकार की आर्थिक नीति का पोल खोलता था। उस समय दुर्भिक्षों की समस्या बहुत जटिल और उग्र थी। उसका आपने बहुत सुन्दर विवेचन किया था। सर इन्थोनी मैकडानेल्ड की अध्यक्षता में इस समस्या की छानबीन के लिए’ एक कमीशन नियुक्त किया था। उसकी रिपोर्ट में आपके भाषण की आलोचना की गई थी। उसके बाद भी कांग्रेस के काम में आप सक्रिय भाग लेते रहे थे। 1915 की बम्बई में हुई कांग्रेस के आप स्वागताध्यक्ष थे। फिर वृद्धावस्था और नरमदली होने के कारण कांग्रेस में अधिक भाग नहीं ले सके। लेकिन एक चौथाई सदी तक कांग्रेस के प्रमुख कार्यकर्ता रहकर आपने राष्ट्र की बहुत बड़ी सेवा की। कांग्रेस के कार्यकर्ताओं में मतभेद होने पर आप अपने व्यक्तित्व से सदा ही उसको तुरन्त दबा देते थे। आर्थिक और राजनीतिक प्रश्नों की ओर साधारण जनता का ध्यान आकर्षित कर उसमें उनके लिए आपने ही दिलचस्पी पैदा की है। ह्यूम सा० के 1906 में कांग्रेस से अलग हो जाने के बाद उसका संचालन आपने बड़ी योग्यता तथा तत्परता के साथ कई वर्षों तक किया।
कांग्रेस के अलावा भी दिनशा वाचा का सार्वजनिक जीवन बहुत महत्वपूर्ण रहा है। सर फिरोजशाह मेहता के देहावसान के बाद बम्बई के सर्वसम्मत नेता का पद आपको ही सौंपा गया था। 1901 में आप बम्बई कारपोरेशन के सभापति ( मेयर ) चुने गये थे। श्री गोखले की मृत्यु से इम्पीरियल कौंसिल में महान अर्थशात्री और वक्ता का जो अभाव हुआ था, उसको आपने ही पूरा किया था। आपका जीवन इतने विविध क्षेत्रों में जिस प्रकार बंटा रहा है, उसकी कल्पना भी आश्चर्य में डालने वाली है। विविध व्यापारिक कम्पनियों, मिलों, बाम्बे कारपोरेशन, इम्पीरियल ट्रस्ट बोर्ड, मिल ओनर्स एसोसियेशन, विक्टोरिया टैकनिकल इंस्टीयूट, बाम्बे प्रेसिडेसी एसोसियेशन, बाम्बे लेजिस्लेटिव कौंसिल और एंग्लो इण्डियन टेम्परेंस एसोसियेशन आदि संस्थाओं से आपका निरन्तर संबन्ध रहा है। विभिन्न पत्रों में धारावाही विवेचनात्मक लेख भी आप लिखते रहे हैं।आपकी शक्ति और लगन सचमुच आश्चर्य में डालने वाली है।
माण्ट-फोर्ड सुधारों के अनुसार शासन व्यवस्था कायम होने पर दिनशा वाचा कौंसिल आफ स्टेट के सभासद चुने गये। इस वृद्धावस्था में भी आपके भाषण पाणिडत्य से भरें हुए रहते थे और उनसे मालूम होता था कि आपका अध्ययन कितना गहरा, कितना पूर्ण और कितना “अप टू डेट” है। आप सदा ही अध्ययन में लगे रहते थे ओर जब स्वयं पढ़ने में असमर्थ होते थे, तब दूसरों से पढ़वाकर सुना करते थे।
दिनशा वाचा का स्वभाव मधुर और मिलनसार था। आप सभाओं में शेर की तरह दहाड़ते थे, लेकिन व्यवहार में बच्चे की तरह रहते थे। 1915 में दिनशा ईदलजी वाचा को सरकार ने सर! की उपाधि दी। 18 फरवरी 1936 के सवेरे 8:30 बजे फोर्ट ( बम्बई ) में अपने निवास-स्थान पर 92 वर्ष की आयु मे इस महारथी का देहावसान हो गया। राष्ट्रपति राजेन्द्र बाबू कांग्रेस की स्वर्ण-जयन्ती के अवसर पर दिसम्बर 1935 में बम्बई मे थे। तब राजेन्द्र बाबू ने आपके यहां जाकर आपके चरणों में नतमस्तक हो समस्त राष्ट्र की श्रद्धाजलि आपके चरणों में अर्पित की थी। दिनशा वाचा की मृत्यु से वह महान व्यक्ति उठ गया, जो पचास वर्ष बाद आज भी हयूम ओर वेडरबन के समय के सार्वजनिक जीवन की याद दिलाता था और जो कांग्रेस के जन्म की एक जीती-जागती निशानी था।
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