फिरोजशाह मेहता बायोग्राफी इन हिन्दी

सर फिरोजशाह मेहता उन व्यक्तियों में से हैं जिनका हाथ कांग्रेस की स्थापना में था ओर जिनका कांग्रेस की नीति ओर कार्यक्रम के निर्माण में बहुत प्रमुख भाग रहा है। आप बहुत मेधावी, ऊंचे दर्जे के वक्ता और खूब कमाने व खुले हाथों खर्च करने वाले शाही आदमी थे।

 

फिरोजशाह मेहता का जीवन परिचय हिन्दी में

 

4 अगस्त 1845 को बम्बई के एक पारसी परिवार में फिरोजशाह मेहता जन्म हुआ था। आपके पिता एक बड़े भारी व्यापारी थे। बुद्धि आपकी बचपन से ही बड़ी कुशाग्र थी। 1861 में मैट्रिक किया, 1864 में बी० ए० हुए, और छः मास बाद ही एम० ए० भी हो गये। फिर बेरिस्टरी के लिए इंग्लैंड गये और तीन साल बाद बैरिस्टर होकर बम्बई लौटे। थोड़े ही दिनो में आपकी बेरिस्टरी चमक उठी। फौजदारी के मामलों में आप उच्च श्रेणी के बैरिस्टर गिने जाने लगे और आमदनी इतनी बढ़ गई, जितनी कि मुम्बई तो क्या, कहते हैं कि, हिन्दूस्तान भर में और किसी वकील बैरिस्टर की नहीं थी।

 

इंग्लैंड  में जब पढ़ते थे तब दादाभाई नौरोजी का आप पर प्रभाव पड़ा, जिससे राजनैतिक कार्यों में रुचि हुईं। वही उमेशचन्द्र बनर्जी और मनमोहन घोष से मित्रता हुई, जिनके उद्योग से लंदन लिटेररी सोसायटी स्थापित हुई थी, जो बाद में ईस्ट इंडियन एसोसियेशन में परिणत हो गई। आपने भी उसमें दिलचस्पी ली और उसमें भारत शिक्षा पर एक निबन्ध पढ़ा, जिसकी बहुत प्रशंसा हुई।

 

फिरोजशाह मेहता
फिरोजशाह मेहता

 

सार्वजनिक कार्यो में रुचि तो इंग्लैंड में ही पैदा हो गई थी, किन्तु सार्वजनिक जीवन का श्रीगणेश 1869 से हुआ, जब कि दादाभाई नौरोजी को भेंट किये जाने के लिए 2000 संग्रह किये गये थे। उनके संग्रह करने में आपने विशेष भाग लिया था। 1872 में आप बम्बई-कारपोरेशन के सदस्य हुए और 35 बरस तक बराबर होते रहे। तीन बार उसके अध्यक्ष भी हुए।

 

तैलंग और बदरुद्दीन तैयबजी के साथ मिलकर आपने बाम्बे प्रेसीडेन्सी एसोसियेशन की स्थापना की। 1886 में बम्बई-कौंसिल के सदस्य बनाये गये। 1892 में जनता द्वारा चुने जाकर उसमें गये और बाद में भी कई बार चुने गये। कौंसिल में प्रकट किये जाने वाले आपके विचार निर्भीक, प्रौढ़ और काम की बातो से पूर्ण होते थे। लैण्ड रेवे न्यू कोड एमेंडमेट बिल का वहां आपने कसकर विरोध किया था और जब उसका कोई परिणिम न हुआ तो गैर सरकारी सदस्यों के साथ कौंसिल से वाक-आउट कर दिया था। 1894 में बड़ी ( भारतीय ) कौंसिल के सदस्य चुने गये और तीन वर्ष तक वहां रहे।

 

बाम्बे यूनिवर्सिटी की सिनेट और सिण्डिकेट के भी आप सदस्य थे। यूनिवर्सिटी बिल का आपने तीव्र विरोध किया था। कई कमीशनों के सामने गवाही दी और कई शिष्टमण्डलो व कमिटियों के सदस्य हुए।

 

कांग्रेस के साथ आपका सम्पर्क उसके प्रारम्भ से ही रहा है। उसके संस्थापकों में से एक आप भी हैं। 1885 में बम्बई में कांग्रेस का जो सर्वप्रथम आधिवेशन हुआ, उसके आप स्वागताध्यक्ष थे। बम्बई में 1889 में होने वाले पांचवें और 1904 में होने वाले बीसवें अधिवेशनों के भी आप ही स्वागताध्यक्ष थे। आर्थिक कठिनाई उत्पन्न होने पर आप कांग्रेस की आर्थिक सहायता बराबर करते रहते थे। कांग्रेस का कट्टर समर्थक बॉम्बे क्रानिकल पत्र आपका ही निकाला हुआ है, जिसका आज भी राष्ट्रीय जागृति में कुछ कम भाग नहीं है। 1890 में कलकत्ता में जो कांग्रेस का छठा अधिवेशन हुआ, उसका राष्ट्र ने आपको सभापति बनाकर आपकी सेवाओं का सम्मान किया।

 

लाहौर में 1909 में होने वाले चौबीसवें अधिवेशन के भी सभापति आप ही चुने गये थे, परन्तु ठीक छः दिन पहले आपने अचानक इनकार कर दिया और तब पंडित मदनमोहन मालवीय को वह सम्मान दिया गया। कहते हैं, सूरत की कांग्रेस ( 1907 ) में आपने नरमदल की ओर से कांग्रेस के कार्य में कुछ दिलचस्पी ली थी, उसके बाद से फिर आप दृष्टि से बिलकुल ओझल ही हो गये। कुछ लोग सूरत कांग्रेस के भंग होने का दोष आपके ही सिर मढ़़ते हैं और यह सचमुच खेद की बात है कि वहां नरम गरम दलों के बीच जो खाई खुदी हुई थी वह आपके जीवन-काल में नहीं भरी जा सकी। लखनऊ में 1916 की कांग्रेस में दोनों दलों में मेल हुआ, पर आप उससे पहले 5 नवम्बर को ही स्वर्ग सिधार गये थे।

 

निस्सन्देह आप उच्च कोटि के व्यक्ति थे ओर जनता व सरकार दोनों ही में आपने प्रतिष्ठा प्राप्त की थी। जहां एक ओर आप कांग्रेस के सभापति-पद तक पहुंचे थे, वहां दूसरी ओर सरकार ने भी आपको सर, सी० आई० ई० और के० सी० आई० ई० की उपाधियों से विभूषित किया था।

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