रमेश चन्द्र दत्त का जीवन परिचय हिन्दी में
सार्वजनिक सेवा की सीढ़ी पर पेर रखकर सरकार द्वारा सम्मान पाने वाले तो बहुत व्यक्ति हुए हैं, लेकिन उन दिनों भारतीयों के लिए दुर्लभ कमिश्नर का ऊंचा पद पाकर सार्वजनिक सेवा के लिए उसे ठुकराने वाले श्री रमेश चन्द्र दत्त जैस व्यक्ति बिरले ही मिलेंगे।
रमेश चन्द्र दत्त का जीवन परिचय हिन्दी में
रमेश चन्द्र दत्त का जन्म कलकत्ता में 13 अगस्त 1848 को एक बहुत ही कुलीन परिवार में हुआ था। रमेशचन्द्र दत्त के पिता ईशान चन्द्र बंगाल में पहले भारतीय डिप्टी कलेक्टर थे। माता-पिता के देहान्त हो जाने के कारण रमेश चन्द्र दत्त अपने चाचा शशि चन्द्र दत्त की संरक्षकता में रहने लगे। ऐन्ट्रेंस पास होने से पहले ही आपका विवाह हो गया। एफ० ए० पास कर चुकने के बाद आपकी इच्छा लंदन जाकर सिविल सर्विस की परीक्षा देने की थी, लेकिन चाचा इससे सहमत न थे। इसलिए आप भाग कर बम्बई पहुंचे और उस जहाज़ पर सवार हुए, जिस पर सुरेन्द्रनाथ बनर्जी सिविल सर्विस की परीक्षा देने के लिए इंग्लैंड जा रहे थे। सिविल सर्विस की परीक्षा बड़ी शान के साथ पास कर रमेश चन्द्र दत्त 1871 में भारत वापिस आ गये।
1871 से 1892 तक 21 साल तक आप बंगाल के विभिन्न जिलों में विभिन्न पदों पर काम करते रहें। इन पदों पर रहकर आपने जनता की यथाशक्ति अधिक से अधिक सेवा करने का प्रयत्न किया। अकाल, बाढ़, हैजा आदि के अवसर पर आपने जिस सुन्दरता से लोगों की सेवा की, जिस तत्परता और सह्रदयता से अपने शासन काल में आपने जमींदारो और किसानों को सहायता पहुंचाई, उससे आप बंगाल की गरीब प्रजा में बहुत लोकप्रिय हो गये। आपकी सम्मतियों और निर्णय का आदर सरकारी अधिकारी भी किया करते थे। कठिन से कठिन परिस्थितियों को आपने जिस तरह हल किया, उससे आपका सिक्का पूरी तरह जम गया था। इसलिए, जब आप इग्लैंड में एक साल की छुट्टी बिताकर 1894 में भारत पहुंचे, तो आप बर्दवान डिविजन के कमिश्नर बना दिये गये। उस समय तक यह पद किसी भारतीय को प्राप्त
न हुआ था। फिर आप उड़ीसा के कमिश्नर बनाये गये।

1897 में जब आपने उस ऊंचे पद से इस्तीफ़ा दे दिया, तब आप के मित्रो को बहुत आश्चर्य हुआ लेकिन आप के ह्रदय में राष्ट्रसेवा ओर साहित्य-सेवा की जो उत्कृष्ट अभिलाषा उत्पन्न हो चुकी थी, उसे वे न जानते थे। आपका शेष जीवन इन्हीं दोनों कार्यो में व्यतीत हुआ। बीच में 1904 से 1907 तक कुछ साल आप बड़ौदा में रिवेन्यू मिनिस्टर के पद पर भी रहे, जहां आपने कर, शिक्षा, व्यापार, शासन आदि के सम्बन्ध में बीसियों प्रकार के सुधार किये और बड़ौदा को भारत का सबसे उन्नत राज्य बनाने का प्रयत्न किया। यहां आप ग़रीबों के दोस्त के नाम से प्रसिद्ध हो गये थे। 1908 में आप ‘रायल कमिशन आफ़ डिसैण्ट्रलाइजेशन’ के सदस्य नियत किये गये। 1909 में आप बड़ौदा के प्रधान मंत्री नियुक्त हुए, लेकिन उसी साल ह्रदय-रोग से 20 नवम्बर 1909 को रमेश चन्द्र दत्त का 61 वर्ष की आयु में देहान्त हो गया।
श्री रमेश चन्द्र दत्त का सार्वजनिक जीवन उन दिनों के इतिहास में अपना एक विशेष स्थान रखता है। आपको भारत वर्ष की आंशिक समस्याओं में विशेष रुचि थी।किसानों के कष्ट आपसे देखे न जाते थे। 26 साल की लम्बी सरकारी नौकरी में आपने किसानों की स्थिति का अत्यन्त गम्भीरता के साथ अध्ययन किया और समय समय पर सरकार की माल गुजारी प्रथा में सुधार कसने का आन्दोलन आप करते रहे। बंगाल टिनेसी एक्ट तथा अन्य अनेक सुधारों का समस्त श्रेय आपको ही मिलना चाहिए। डिसैण्ट्रलाइजेशन कमीशन ने बहुत सी सुन्दर और उपयोगी सिफ़ारिशें आपके जोर देने पर ही की थीं। आपने जब देखा कि अब सरकारी पदों पर रहकर किसानो की अधिक सेवा नहीं की जा सकती, तब आप कांग्रेस में सम्मिलित हो गये ओर आई० सी० एस० के अफ़सर रहते हुए लम्बे अरसे तक सार्वजनिक प्रश्नों पर आपने जो भ्रमित अनुभव और ज्ञान प्राप्त किया था, उसका लाभ भी कांग्रेस को पहुंचाया। आपका कहना था कि भूमि पर भारी मालगुजारी और ब्रिटिश कारखानों की खुली प्रतिस्पर्धा के कारण ग्रामीण धन्धों का विनाश ही दुमित्ष का कारण है। मालगुजारी, दुर्भिज्ञ तथा अन्य आर्थिक प्रश्नों पर आप प्रमाण समझे जाते थे। सरकारी नौकरी छोड़ने के बाद आप इग्लैंड चले गये थे, वहां आप यूनिवर्सिटी कालेज लंदन मे भारतीय इतिहास के प्रोफ़ेसर बनाये गये थे।
1900 से 1904 तक आपने लंदन में भारतीय पक्ष को, विशेषकर किसानों के पक्ष को जोरों के साथ रखा। माल गुजारी तथा ब्रिटिश कालीन भारत के आर्थिक इतिहास पर आपने अत्यन्त प्रामाणिक ग्रन्थ लिखे, जो आजतक अपने विषय के अद्वितीय ग्रन्थ माने जाते हैं। इन पुस्तकों के द्वारा आपने सहसा सम्पूर्ण राष्ट्र का ध्यान बढ़ते हुए आर्थिक हाल की ओर खींच दिया। 1899 में राष्ट्र ने आपकी इन अनुपम सेवाओं का सम्मान कर रमेश चन्द्र दत्त को कांग्रेस का सभापति बनाया। आपने अपने भाषण में पहली बार किसानों पर होने वाले भीषण अत्याचारों की ओर कांग्रेस का ध्यान खींचा।
किसानों की आर्थिक स्थिति के सम्बन्ध में लार्ड कर्जन के साथ काफी समय तक आपकी बहस रही। आपने सरकारी नीति की इतनी कड़ी आलोचना की कि सरकार को विवश होकर किसानों के महत्त्वपूर्ण प्रश्न पर ध्यान देना पड़ा। भारत के किसान सदा ही आपकी सेवाओं के लिए आपके ऋणी रहेंगे। भारत के शासन विधान से आप अत्यन्त असन्तुष्ट थे। आपने इंग्लैंड में दादाभाई नौरोजी व सुरेन्द्रनाथ बनर्जी के साथ मिलकर शासन में सुधार कराने का तीव्र आन्दोलन किया। न्याय और शासन विभागों को प्रथक-प्रथक करने की कांग्रेस की मांग के आप समर्थक थे। कांग्रेस के साथ सहानुभूति रखने के खतरे को आप जानते थे, किन्तु अपने विचारों को कभी आपने खतरे के कारण दबाया नहीं। लार्ड मिंटो के साथ भी आपने इस सम्बन्ध में बहुत सा पत्र-व्यवहार किया था।
प्रारम्भ से ही रमेश चन्द्र दत्त की रुचि साहित्य सेवा की और थी। आपने इतिहास, राजनीति और अर्थशास्त्र के अतिरिक्त अन्य भी बीसियों सुन्दर विद्वत्तापूर्ण ग्रन्थ लिखे हैं। कम्पनी के समय का आपका लिखा हुआ भारत का इतिहास अपने विषय की पहली पुस्तक है। आपने कई उपन्यास भी लिखे हैं। ऋग्वेद का बंगाली अनुवाद, महाभारत और रामायण का अंग्रेजी पद्मानुवाद तथा भारतीय सभ्यता का इतिहास आपके अत्यन्त प्रसिद्ध ग्रन्थ हैं। ये सभी ग्रन्थ आपके व्यवसाय, परिश्रम, विद्वता और अथाह ज्ञान के सूचक हैं। सरकारी पदों पर काम करते हुए इतनी साहित्य सेवा शायद ही किसी सिविलियन ने की हो अपनी साहित्यक सेवा और विशेषकर भारत के आर्थिक प्रश्नों पर लिखे हुए अपने प्रामाणिक ग्रन्थों के कारण आप वस्तुतः अमर हो गये हैं।
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें