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अजयगढ़ का किला किसने बनवाया था व उसका इतिहास अजयगढ़ की घाटी का प्राकृतिक सौंदर्य

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अजयगढ़ का किला महोबा के दक्षिण पूर्व में कालिंजर के दक्षिण पश्चिम में और खुजराहों के उत्तर पूर्व में मध्यप्रदेश के  पन्ना जिले में स्थित है जो बुंदेलखंड क्षेत्र के अंतर्गत आता है। यह किला चंदेल राज्य के अतंर्गत रहा है। तथा प्राचीन काल में यह क्षेत्र चेंदि जनपद का एक भाग था। इस क्षेत्र का विस्तार पश्चिम में बेतवा नदी तक पूर्व मे विंध्याचल पर्वत श्रेणी तक और उत्तर में यमुना नदी तक तथा दक्षिण में नर्मदा नदी तक फैला था। अजयगढ़ का किला गिरि दुर्ग श्रेणी में आता है। इसका निर्माण विंध्याचल पर्वत श्रेणी में हुआ है। तथा यह भी शैव वासना का एक महत्वपूर्ण केंद्र था। किले के ऊपर जाने के दो मार्ग है। एक रास्ता पूर्व दिशा की ओर से जाता है। इस मार्ग से पैदल ही किले के ऊपर चढ़ा जा सकता है। तथा दूसरा रास्ता उत्तर दिशा से है। इस रास्ते से भी पैदल ही किले पर चढ़ा जा सकता है। इस किले पर चढ़ना अत्यंत कठीन है। क्योंकि यह किला समुद्र तल से 1744 फीट और धरातल से 860 फिट ऊंचाई पर पहाड़ी के ऊपर बना हुआ है। किले तक पहुंचने के लिए लगभग 500 सीढियां बनी हुई है। यही ऊंचाई इस किले को अभेद बनाती है। ऊपर से देखने पर यहां ...

कालिंजर का किला - कालिंजर का युद्ध - कालिंजर का इतिहास इन हिन्दी

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कालिंजर का किला या कालिंजर दुर्ग कहा स्थित है?:— यह दुर्ग  बांदा जिला उत्तर प्रदेश मुख्यालय से 55 किलोमीटर दूर बांदा-सतना रोड़ पर कालिंजर पहाड़ी पर स्थित है। यह भारत का प्राचीन किला है। इस किले की प्रसिद्धि हर युग मे रही है। सतयुग में यह रत्नकूट, त्रेता युग में महागिरि, द्वापरयुग में पिंगलगिरि, तथा कलयुग में यह क्षेत्र कालिंजर के नाम से प्रसिद्ध हुआ है। प्राचीन काल में यह एक नगर तथा तीर्थ स्थल के रूप में विख्यात था। उस समय यहां अनेक मंदिर और सरोवर थे।     कालिंजर किले का इतिहास इन हिन्दी – कालिंजर फोर्ट रहस्य – कालिंजर का परिचय   कालिंजर दुर्ग का निर्माण कब हुआ था? तथा कालिंजर किले का निर्माण किसने कराया था?:— सुप्रसिद्ध इतिहास लेखक फरिस्था के अनुसार कालिंजर किले का निर्माण सातवीं शताब्दी में केदार बर्मन ने कराया था।     कालिंजर का युद्ध कब हुआ था? कालिंजर युद्ध का इतिहास:— इस किले की सेनाओं ने कन्नौज नरेश जयपाल की सेनाओं के साथ सन् 978 ई. में गजनी के सुल्तान पर आक्रमण किया था और उसे परास्त किया था। जिसका बदला लेने के लिए महमूद गजनवी की सेना ने सन् 1023 ई. म...

मड़फा दुर्ग के रहस्य - जहां तानसेन और बीरबल ने निवास किया था

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मड़फा दुर्ग भी एक चन्देल कालीन किला है यह दुर्ग चित्रकूट के समीप चित्रकूट से 30 किलोमीटर की दूरी पर है। भरतकूप मार्ग पर बरिया मानपुर के समीप दुर्ग एक पहाड़ी पर है। चन्देल शासन काल में इस दुर्ग का महत्वपूर्ण स्थान था। तथा दुर्ग के भग्नावशेष यहाँ आज भी उपलब्ध होते है। सुरक्षा की दृष्टि से इस दुर्ग का विशेष महत्व था। तथा यहाँ का प्राकृतिक सौन्दर्य भी सराहनीय है। यह दुर्ग कालिंजर से 26 कि0०0मी0० दूर उत्तर पूर्व में है। यहाँ तक पहुँचने के लिए कच्चा रास्ता है तथा इसके थोडी दूर बघेलाबारी गाँव है। इस दुर्ग में चढ़ने के लिए तीन रास्ते है। पहला मार्ग उत्तर पूर्व से मानपुर गाँव से है। तथा दूसरा मार्ग दक्षिण पूर्व से सवारियाँ गाँव से है। तथा तीसरा मार्ग कुरहन गाँव से है। तथा ये मार्ग दक्षिण पश्चिम में है।     मड़फा दुर्ग का इतिहास     अब इस दुर्ग में प्रवेश करने के लिए एक ही द्वार बचा है। इस द्वार को हाथी दरवाजा के नाम से पुकारा जाता है यह द्वार लाल रंग के बलुवा पत्थर से निर्मित है। चन्देलों के दुर्ग और मन्दिर समस्त स्थलो पर इन्ही पत्थरों से निर्मित हुए थे यहाँ से कुछ दूरी पर खभरि...

मंगलगढ़ का किला किसने बनवाया था - मंगलगढ़ का इतिहास हिन्दी में

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मंगलगढ़ का किला चरखारी के एक पहाड़ी पर बना हुआ है। तथा इसके के आसपास अनेक ऐतिहासिक इमारते है। यह  हमीरपुर से 106 किलोमीटर दूर और महोबा से लगभग 20 किलोमीटर दूर है। यह स्थान मध्यप्रदेश राज्य के अंतर्गत आता है। मंगलगढ़ दुर्ग के नीचे पहाड़ी की तलहटी में बसी बस्ती चरखारी के नाम से विख्यात है इसका पुराना नाम महराज नगर था।   मंगलगढ़ के इतिहास के अनुसार चरखारी नगर का विकास सन्‌ 1761 में राजा खुमान सिंह के शासन में हुआ था। राजा खुमान सिंह ने सन्‌ 1782 तक शासन किया। इनके पुत्र का नाम विज विक्रमवीर था। खुमान सिंह के बाद उनके पुत्र विक्रम वीर राजा बने। राजा विज विक्रमवीर की मृत्यु 1829 हुई। इसके पश्चात रतन सिंह राजा हुए। चन्देल शासनकाल में यहाँ पर अनेक तालाब निर्मित हुये थे। तथा उनके किनारे अनेक मन्दिर निर्मित हुये थे। ये सभी मंदिर चंदेलकालीन थे।   मंगलगढ़ का किला   मंगलगढ़ का किला व उसके समीप में निम्नलिखित स्थान दर्शनीय है   राजा का प्राचीन महल इस महल का मुख्य द्वार वास्तुशिल्प की दृष्टि से अत्यन्त महत्वपूर्ण है। तथा इसके अतिरिक्त दुर्ग के ऊपर भी अनेक दर्शनीय स्थान है।  ...

मनियागढ़ का किला - मनियागढ़ का किला किसने बनवाया था तथा कहाँ है

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मनियागढ़ का किला मध्यप्रदेश के  छतरपुर जनपद मे स्थित है। सामरिक दृष्टि से इस दुर्ग का विशेष महत्व है। सुप्रसिद्ध ग्रन्थ आल्हाखण्ड में मनियागढ़ किले का विस्तृत वर्णन मिलता है। मनियागढ़ दुर्ग चन्देल कालीन है। और केन नदी के तट पर एक पहाडी पर बना हुआ है। इसी दुर्ग पर चन्देलों की कुल देवी मनिया देवी का मन्दिर बना हुआ है। तथा सामरिक दृष्टि से यह दुर्ग महत्वपूर्ण स्थल है।     मनियागढ़ के किले से एक महत्वपूर्ण घटना जुडी हुईं है। कहते है कि कीर्ति सिंह की पुत्री चन्देल राजकुमारी दुर्गावती का प्रेम सम्बन्ध राजा दलपतिशाह से हो गया था। तथा रानी दुर्गावती ने किसी तरह दुर्ग से गायब होकर दलपतिशाह गौंड राजा से विवाह किया था। दुर्ग में निम्नलिखित स्थान दर्शनीय है ।     मनियागढ़ का किला की प्राचीर मनियागढ़ का किला की प्राचीर एक उसी युग मे अत्यंत सुदृढ़ थी। किन्तु समुचित सुरक्षा व्यवस्था न होने के कारण और बाहरी शत्रुओं के आक्रमण के कारण अब इस किले की प्राचीर नष्ट हो गयी है।       मनियागढ़ का किला   दुर्ग के प्रवेश द्वार दुर्ग में प्रवेश करने के लिये प्राचीर से लगे हु...

गढ़कुंडार का किला का इतिहास - गढ़कुंडार का किला किसने बनवाया

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गढ़कुण्डार का किला मध्यप्रदेश के  टीकमगढ़ जिले में गढ़कुंडार नामक एक छोटे से गांव मे स्थित है। गढ़कुंडार का किला बीच जंगल में काले पत्थरों से निर्मित है। तथा किला एक पहाडी पर है यह किला बहुत सुदृढ़ है और एक चौकोर पहाड़ी पर स्थित है। किले के ऊपर से मैदानी भाग का दृश्य बहुत सुन्दर दिखलाई देता है। अक्सर इस किले में यात्रीगण और अधिकारी गण आते रहते है। इस दुर्ग में चढ़ने के लिये पहाडी मार्ग है उसके पश्चात यहाँ एक गोपनीय मार्ग है जिसका उपयोग तदयुगीन सैनिक शत्रुओं को धोखा देने के लिये किया करते थे। दुर्ग के नीचे अनेक गाँव है जहाँ के व्यक्ति खेती किसानी करते है। गढ़कुण्ढार के नीचे काले रंग की चट्टाने और पत्थर है और सूखे हुए पेड है इस दुर्ग में पैदल ही पहुँचा जा सकता है।   गढ़कुंडार का किला का इतिहास   नवीं शताब्दी में गढ़कुंडार का किला चन्देलों के अधीन था। पृथ्वीराज चौहान के आक्रमण के पश्चात यह दुर्ग उसके आधीन हो गया। बाद में दिल्‍ली के सुल्तानों के आधीन हो गया। लगभग 12वीं शताब्दी में यहाँ खूब सिंह खांंगार का अधिकार था। उस समय बुन्देलखण्ड जुझती देश के नाम से विख्यात था। बाद में यह दुर्...

छतरपुर का किला हिस्ट्री इन हिन्दी - छतरपुर का इतिहास की जानकारी हिन्दी में

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छतरपुर का किला मध्य प्रदेश के छतरपुर जिले में अठारहवीं शताब्दी का किला है। यह किला पहाड़ी की चोटी पर स्थित, यह बुंदेली वास्तुकला शैली में निर्मित है। यह एक निवास के रूप में इस्तेमाल किया गया था और साथ ही, एक रक्षात्मक किले के रूप में भी इस्तेमाल किया गया था। ब्रिटिश राज के तहत, किले का उपयोग स्थानीय प्रशासनिक मुख्यालय के रूप में किया जाता था।   दौलताबाद का किला – दौलताबाद का इतिहास छतरपुर का इतिहास – छतरपुर का किला हिस्ट्री इन हिन्दी   छतरपुर रियासत बहुत प्राचीन रियासत नहीं है, पहले यह स्थान पन्ना राज्य के अन्तर्गत था। 18 वीं शताब्दी के अन्त में छतरपुर रियासत को अलग राज्य का दर्जा दे दिया गया।छतरपुर के प्रथम शासक सोने सिंह पवार थे। पहले इस वंश के व्यक्ति पन्‍ना महाराज हिन्दूपत के यहाँ नौकरी किया करते थे। विक्रमी संवत् 1834 में हिन्दूपत का स्वर्गवास हो गया। इनके पुत्र सरनेश सिंह राजनगर में निवास करते रहे। पन्‍ना राज्य की व्यवस्था कुँवर सोने शाह किया करते थे। उन्हे अलग होने का अवसर प्राप्त हुआ और उन्होने अपना स्वतन्त्र राज्य स्थापित कर लिया। मालखेड़ा का इतिहास – मालखेड़ा का किला...

दतिया का इतिहास - दतिया महल या दतिया का किला किसने बनवाया था

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दतिया जनपद मध्य प्रदेश का एक सुप्रसिद्ध ऐतिहासिक जिला है इसकी सीमाए उत्तर प्रदेश के  झांसी जनपद से मिलती है। यहां एक किला तथा उसके कुछ भग्नावशेष देखने को मिलते है। जिसे दतिया का किला या दतिया महल के नाम से स्थानीय लोगों द्वारा पुकारा जाता है।       दतिया का इतिहास जनश्रुति के अनुसार कहा जाता है कि यहाँ पहले बक्रदन्त नामक दैत्य का राज्य था। उसी के नाम पर इस स्थान का नाम दतिया पडा। पहले दतिया गुप्त सम्राज्य के अन्तर्गत था। उसके पश्चात यहाँ गुर्जर प्रतिहारों का राज्य रहा है। गुर्जर प्रतिहारों के बाद यहाँ चन्देलों का राज्य रहा, उसके पश्चात यहाँ बुन्देलों का राज्य रहा इस सुप्रसिद्ध स्थल पर एक किला तथा अनेक आवासीय महल उपलब्ध होते है।     वीर सिंह जी देव की मित्रता मुगल समाज्य जहाँगीर से थी। इस मित्रता को वे कभी नहीं भूले। सन्‌ 1625 में जब जहाँगीर काबुल की यात्रा कर रहे थे। उस समय माहवत खाँ ने उनका अपहरण कर लिया। उन्हे छुडाने के लिये अपने छोटे पुत्र भगवान राव को जहाँगीर की मदद के लिये भेजा। वहाँ से लौटकर उन्होने दतिया नगर में महल बनवाया और भगवानराव को वहाँ का राज...

बड़ौनी का किला किसने बनवाया - बड़ौनी का इतिहास व दर्शनीय स्थल

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बड़ौनी का किला,यह स्थान छोटी बड़ौनी के नाम जाना जाता है जो  दतिया से लगभग 10 किलोमीटर की दूरी पर है। यंहा पर बहुत ही प्रसिद्ध हवेली है जंहा बुन्देलखण्ड के प्रतापी राजा वीर सिंह जू देव का राज्याभिषेक हुया था यहां बौद्ध और जैन धर्म से संबंधित गुप्तकालीन मंदिर बने हुए हैं। साथ ही यह स्थान बुन्देली शैली में बने किले और हवेलियों के लिए भी काफी लोकप्रिय है। और यहीं पर गुप्त काल का एक मन्दिर भी है।   बड़ौनी का इतिहास बड़ौनी कभी ओरछा राज्य का एक अंग था, बाद में यहाँ के जागीर वीरसिंह जी देव को मिल गयी बीर सिंह जी देव ओरछा नरेश मधुकरशाह के चौथे पुत्र थे। पिता की मृत्यु के पश्चात इन्द्रजीत सिंह प्रतापराव और बीर सिंह जी देव एक मत हो गये और उन्होने यह निश्चित किया कि वे मुसलमानों के अधीन नही रहेगे। इसलिए मुगलो से लडने के लिये उन्होने निजी सेना का गठन किया और खजोहा तथा बढ़ौनी किले को सुसज्जित करके वे मुगलों से युद्ध करने लगे।     बड़ौनी का किला   बीर सिंह जी देव को सन्‌ 1592 में परिवारिक बटवारे में बडौनी की जागीर मिली थी, यहाँ पर उस समय जो लोग कार्य कर रहे थे। उनसे बीर सिंह जी की...

ग्वालियर का किला हिस्ट्री इन हिन्दी - ग्वालियर का इतिहास व दर्शनीय स्थल

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ग्वालियर का किला उत्तर प्रदेश के ग्वालियर में स्थित है। इस किले का अस्तित्व गुप्त साम्राज्य में भी था। दुर्ग परिक्षेत्र में उपलब्ध जैन तीर्थाकंरों की प्रतिमाये इस बात को सिद्ध करती है, कि ग्वालियर का धार्मिक महत्व अति प्राचीन है। पहले यह क्षेत्र गुप्तों के अधिकार में था बाद में यह क्षेत्र हर्ष वर्धन और कछवाहों के अधिकार में आ गया। कछवाहा नरेशो ने विक्रमी संवत् 332 में ग्वालियर किले का निर्माण कराया था।   ग्वालियर का किला हिस्ट्री – ग्वालियर का इतिहास   कछवाहा वंश के शासक अपने वंश का सम्बन्ध भगवान श्रीराम के पुत्र कुश से मानते है। इस वंश का महत्वपूर्ण शासक सूरजसेन था जो कुष्ठरोग से गृषित था। उसका रोग ग्वालियर में ठीक हुआ और एक सिद्ध के आदेश से उसने अपना नाम बदलकर सूरजपाल रख दिया। इस वंश का 84वाँ नरेश तेज कर्ण था। उस समय इनका राज्य  कन्नौज के राजा भोज के आधीन हो गया था। इस वंश में बऊदामा, किर्तिराज, भुवनराज और प्रदूमपाल नामक नरेश हुए। महिपाल के पश्चात मनोरथ नामक शासक हुआ। उसने सन् 1161 में ग्वालियर में महादेव मंदिर का निर्माण कराया। उसके पश्चात उसका पुत्र विजयपाल शासन में ...

चंदेरी का किला किसने बनवाया - चंदेरी का इतिहास इन हिन्दी व दर्शनीय स्थल

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भारत के मध्य प्रदेश राज्य के अशोकनगर जिले के चंदेरी में स्थित चंदेरी का किला शिवपुरी से 127 किमी और  ललितपुर से 37 किमी और ईसागढ़ से लगभग 45 किमी और मुंगोली से 38 किमी की दूरी पर स्थित है। यह बेतवा नदी के दक्षिण-पश्चिम में एक पहाड़ी पर स्थित है। बड़ी संख्या में यहां पर्यटकों का आना जाना लगा रहता है।       चंदेरी का किला का इतिहास – चंदेरी फोर्ट हिस्ट्री इन हिन्दी     चंदेरी का किला भी बुन्देलखण्ड क्षेत्र का सुप्रसिद्ध किला है, तथा इसका भी प्राचीनतम इतिहास है। यहाँ अनेक स्थल ऐसे उपलब्ध होते है। जिनसे भारतीय इतिहास गरिमा मण्डित होता है। कहते है कि जब मुगल सम्राट बाबर ने चंदेरी का किला जीता उस समय उसने अपने लिये गाजी की पदवी धारण की, गाजी का तात्यपर्य धर्म युद्ध करने वाले व्यक्ति से होता है। जिसे मृत्यु के उपरान्त स्वर्ग की प्राप्ति होती है।       बाबर ने यह दुर्ग 1588 में जीता था बाबर तैमूर लंग का वंशज था। और उसके वंश के लोग समर कन्द में निवास किया करते थे। वह काबुल होता हुआ भारतवर्ष आया तथा उसने पानीपत के युद्ध में सन्‌ 1526-27 में राणासांगा क...

सिंगौरगढ़ का किला किसने बनवाया - सिंगौरगढ़ का इतिहास इन हिन्दी

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मध्य भारत में मध्य प्रदेश राज्य के दमोह जिले में सिंगौरगढ़ का किला स्थित हैं, यह किला गढ़ा साम्राज्य का एक पहाड़ी किला है, जो एक वन क्षेत्र की पहाड़ियों में फैला हुआ है। यह जबलपुर शहर से लगभग 45 किमी दूर दमोह शहर के रास्ते में है। यह एक शानदार और ऐतिहासिक किला मध्य भारत के गौंड शासकों का निवास स्थान था, जो प्रत्येक वर्ष कुछ समय वहां बिताते थे। वर्तमान में सिंगौरगढ़ का किला जर्जर हालत में है। जिसका कारण किले का रखरखाव नहीं होना है। किले तक पहुंचने के लिए पैदल पगडंडी मार्ग है क्योंकि सिंगौरगढ़ किले तक पहुंचने के लिए कोई उचित सड़क नहीं है।       सिंगौरगढ़ किले का इतिहास – सिंगौरगढ़ का इतिहास   सिंगौरगढ़  गौंड वंशी नरेशों का शक्तिशाली केन्द्र था।जब दिल्ली में तुर्कों और मुगलों का शासन सुदृढ़ हो रहा था, उस समय बुन्देलखण्ड के दक्षिण पूर्वी भाग में गौंड वंशी नरेशों का राज्य था। इस वंश के अनेक नरेश हुये। गढ़ा मंगला किले में गौंड वंशीय नरेशों की एक वंशावली उपलब्ध हुई। यह वंशावली यहाँ के मोती महल के अभिलेख में है। इस वंश का सबसे शक्तिशाली नरेश संग्रामशाह था। जो अत्यन्त क्रूर औ...

पन्ना का इतिहास - पन्ना का किला - पन्ना के दर्शनीय स्थलों की जानकारी हिन्दी में

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पन्ना का किला भी भारतीय मध्यकालीन किलों की श्रेणी में आता है। महाराजा छत्रसाल ने विक्रमी संवत् 1738 में पन्‍ना को अपने राज्य की राजधानी बनाया और यहीं पर एक किले का निर्माण किया। पन्‍ना का प्राचीन नाम “परना” है। पन्‍ना नगर के पश्चिम में किल-किला नदी दक्षिण से उत्तर की ओर प्रवाहित होती है। इस नदी के बाये तट पर श्री पदमा देवी का एक छोटा सा मठ है। इस मठ के उत्तर की ओर एक पुरानी बस्ती है, उसे पुराने पन्‍ना के नाम से जाना जाता है। पूर्व की ओर किलकिला नदी का जल प्रपात है, जिसे किलकिला वाटरफॉल के नाम से जाना जाता है। यहाँ पर निवास करने वाले भगवती पुजारी के पास प्राचीन दस्तावेज हैं जिसमें इस नगर का नाम परना लिखा है। पन्ना का इतिहास कहते है कि यह स्थान सतयुग से प्रसिद्ध था। इसी स्थान से राजा दक्ष ने यज्ञ किया था। यहाँ चह वेदी बनी हुई है जिसमें गिरकर सती से अपने प्राणो की आहुत दी थी। अब यह कुण्ड के रूप में परिणित हो गया है, इसका पानी सदैव गरम रहता है यह स्थल मण्डूप ऋषि की तपस्थली थी। इस स्थान की ओर कहते है पन्‍ना में गुरू प्राणनाथ ने प्रणामी धर्म का शुभारम्भ किया था प्रणमी धर्म के ग्रन्थ कुलजम ने...

राजनगर का किला किसने बनवाया - राजनगर मध्यप्रदेश का इतिहास इन हिन्दी

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राजनगर मध्य प्रदेश के छतरपुर जिले में  खुजराहों के विश्व धरोहर स्थल से केवल 3 किमी उत्तर में एक छोटा सा गाँव है। छतरपुर रियासत के तहत अठारहवीं से उन्नीसवीं शताब्दी के दौरान गांव एक प्रमुख राजनीतिक केंद्र था। यह पन्ना के पास और महोबा खुजराहो मार्ग से जुड़ा हुआ है। हमहराज पुल मलहरा और बारीगढ़ से इस किले तक पहुंचा जा सकता है। राजनगर का किला – राजनगर किले का इतिहास पहले राजनगर का किला चंदेलों के अधिकार में था।चंदेलों के पतन के बाद यह किला गौंडों के पास चला गया। तत्पश्चात राजनगर के किले पर तुर्कों और मुगलों का अधिकार रहा। जब पन्‍ना राज्य की स्थापना छत्रसाल के माध्यम से की गयी उस समय यह दुर्ग छत्रसालल के अधिकार में आ गया। पहले राजनगर फोर्ट, राजगढ़ के नाम से प्रसिद्ध था। इस स्थल में धमौनी के मुगल फौजदार से छत्रसाल का युद्ध हुआ। इस दुर्ग में मुगल सेनापति बहलोल मारा गया और उसकी सहायता करने वाले जागीरदार जगत सिंह को मौत के घाट उतार दिया, और उसका एक सरदार भी घायल अवस्था में भाग गया। राजनगर का किला यह घटना औरंगजेब के शासन काल की सन्‌ 1681 की है। इस युद्ध के पश्चात औरंगजेब ने छत्रसाल से मित्रता ...

बटियागढ़ का किला किसने बनवाया - बटियागढ़ का इतिहास इन हिन्दी

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बटियागढ़ का किला तुर्कों के युग में महत्वपूर्ण स्थान रखता था। यह किला छतरपुर से  दमोह और जबलपुर जाने वाले मार्ग पर स्थित है। वर्तमान समय में बटियागढ़ दुर्ग जीर्ण-शीर्ण अवस्था में है, किन्तु उसके भग्नावशेष यहाँ आज भी मौजूद है। जो पिकनिक और इतिहास में रूची रखने वाले पर्यटकों को खूब आकर्षित करता है। बटियागढ़ का किला – बटियागढ़ किले का इतिहास किसी जमाने में यह किला कल्चुरियों के आधीन था। कल्चुरियों के पश्चात यह फोर्ट गौंड सम्राज्य का एक अंग बन गया। समय-समय पर इस दुर्ग को जीतने के लिये तुर्कों ने अनेक प्रयत्न किये। बटियागढ के किले में, किले के एक महल में विक्रमी संवत् 1381 का एक अभिलेख उपलब्ध हुआ। यह अभिलेख यहाँ के एक महल में था। इस अभिलेख में गयासुद्दीन का नाम लिखा है। ऐसा लगता है कि गयासुद्दीन तुगलक की ओर से कोई सूबेदार यहाँ निवास करता होगा। उसी ने इस महल का निर्माण कराया होगा। दौलताबाद का किला – दौलताबाद का इतिहास इससे यह प्रतीत होता है कि बटियागढ़ हिन्दू शासक के हाथ से निकलकर तुर्कों के हाथ में आ गया होगा। इसी स्थान मे एक और अभिलेख विक्रमी संवत् 1385 का उपलब्ध होता है। इस अभिलेख में मु...

बिजावर का किला किसने बनवाया - बिजावर का इतिहास इन हिन्दी

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बिजावर भारत के मध्यप्रदेश राज्य के  छतरपुर जिले में स्थित एक गांव है। यह गांव एक ऐतिहासिक गांव है। बिजावर का इतिहास गौंडों और बुंदेलों की शौर्यपूर्ण गाथा साक्षी रहा है। बिजावर में एक किला देखने को मिलता है। जिसे बिजावर का किला या जटाशंकर का किला भी कहते है। किले के समीप स्थित प्राचीन जटाशंकर मंदिर के कारण जटाशंकर का किला नाम पड़ गया है। खूबसूरत बिजावर का तालाब और उसके किनारे बना यह ऐतिहासिक किला पर्यटकों को खूब आकर्षित करता है।       बिजावर का किला – बिजावर का इतिहास   बिजावर का किला का निर्माण यहाँ के शासकों ने कराया था। इस नगर और दुर्ग का संस्थापक विजय सिंह नामक गौंड सरदार ने कराया था। यह गढ़ा मण्डला के राजा का नौकर था। इस समय इस इलाके में गौंड लोगो का ही राज्य था। बाद में यह क्षेत्र छत्रसाल के अधिकार में आ गया था।     विक्रमी संवत्  1826 में गुमान सिंह ने यह क्षेत्र अपने चाचा बीर सिंह जी देव को दे दिया था। इस समय गुमान सिंह बाँदा और अजय गढ़ के राजा थे। विक्रमी संवत् 1850 में बाँदा के प्रथम नवाब अलीबहादुर से चरखारी में बुन्देलो से एक यद्ध हुआ। इ...

धमौनी का किला किसने बनवाया - धमौनी का युद्ध कब हुआ और उसका इतिहास

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विशाल धमौनी का किला मध्य प्रदेश के  सागर जिले में स्थित है। यह 52 गढ़ों में से 29वां था। इस क्षेत्र की भूमि बहुत उपजाऊ है। किले के पूर्व में एक भयानक खाड़ी है। किले की दीवारें बहुत आकर्षक और अच्छी स्थिति में हैं। पूरे किले के घेरे के अंदर कुछ न कुछ अनोखा देखने को मिलता है। इस जगह की सुंदरता का आनंद लेने के लिए लंबी दूरी तक पैदल चलने के लिए सहनशक्ति का होना जरूरी है। किले का क्षेत्रफल बहुत बड़ा है। किला गाँव से लगभग 1.5 KM दूर और पूर्व में स्थित है। एक कीचड़ भरी सड़क किले को गांव से जोड़ती है। ऐसा लगता है कि बरसात के मौसम में किले तक पहुंचना नामुमकिन सा हो जाता है। रास्ता कब्रिस्तान से होकर गुजरता है जहां हजारों की संख्या में कब्रें नजर आती हैं। कब्रें एक बड़े खूबसूरती से उकेरे गए पत्थर से ढकी हुई हैं। अगर ये लोग युद्ध के मैदान में मारे गए तो इस विशाल कब्रिस्तान और कब्रों को देखकर युद्ध की भयावहता का अंदाजा लगाया जा सकता है। इस क्षेत्र में उपलब्ध प्राकृतिक संसाधन किले और कब्रिस्तानों के निर्माण में बहुत सहायक थे। पत्थरों पर की गई कारीगरी हर तरफ देखने को मिलती है। किले का मुख्य द्वा...

पथरीगढ़ का किला किसने बनवाया - पाथर कछार का किला का इतिहास इन हिन्दी

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पथरीगढ़ का किला चन्देलकालीन दुर्ग है यह दुर्ग फतहगंज से कुछ दूरी पर  सतना जनपद में स्थित है इस दुर्ग के सन्दर्भ में जगनिक द्वारा रचित अल्हाखण्ड में षिद वर्णन उपलब्ध होता है। पथरीगढ़ का किला एक छोटी सी पहाडी पर है और परकोटे से घिरा हुआ है तथा इसमें प्रवेश करने के लिये कई प्रवेश द्वार है, तथा दुर्ग के अंदर अनेक आवासीय महल है और जलाशय है। दुर्ग के अन्दर और बाहर हिन्दू और इस्लामी धर्म से सम्बन्धित अनेक धर्मिक स्थल है। जल आपूर्ति के लिये यहाँ अनेक जलाशय हैं तथा दो प्राकृतिक झीले भी है। इनमें से एक झील के तट पर यहाँ के नरेशो के नृत्य स्मारक बने हुये है।     पथरीगढ़ का किला या पाथर कछार का किला हिस्ट्री इन हिन्दी   पथरीगढ़ का किला राजा परमार्दिदेव के जीवनकाल तक चन्देलो के अधिकार में रहा, उसके पश्चात यह दुर्ग तुर्को के अधिकार में आ गया, तुर्कों के बाद यह दुर्ग मुगलो के अधिकार में आया, छत्रसाल के शासनकाल में यह दुर्ग बुन्देलों के आधीन था। किंतु कभी कभी इस किले में बुंदेलों और बघेलों के बीच सत्ता के लिए संघर्ष होते रहते थे। पाथर कछार कालिंजर से दस मील दूर है। तथा इसे बरौदा पाथर ...

श्री दरवाजा कालपी - श्री दरवाजे का इतिहास

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भारत के उत्तर प्रदेश राज्य के  जालौन जिले में कालपी एक ऐतिहासिक नगर है, कालपी स्थित बड़े बाजार की पूर्वी सीमा पर यह श्री दरवाजा स्थित है। यह दरवाजा अपना एक ऐतिहासिक महत्व रखता है। राजा श्रीचन्द्र की शहादत में बना यह श्री दरवाजा दर्शनार्थियों को बरबस अपनी ओर खींच लेता है। श्री दरवाजा का इतिहास श्री दरवाजा का इतिहास स्पष्ट तो दिखाई नहीं पड़ता है। प्रसिद्ध पत्रकार अखिलेश विद्यार्थी के अनुसार सन 1196 ई० में कालपी के राजा श्रीचन्द्र के कुछ आदमी अपने राजा के साथ विश्वासघात करके यवन सेनापतियों से मिल गये और परिणाम स्वरूप युद्ध के मैदान में राजा श्रीचन्द्र की हार हुई और वह युद्ध में शहीद हुए। विजयी यवन सरदार ने राजा श्रीचन्द्र के सिर को जमीन में गड़वा कर उसके ऊपर एक विशाल द्वार का निर्माण कराया जो श्री दरवाजे के नाम से जाना जाता है। एक अन्य परम्परा अनुसार यह कहा जाता है कि कालपी के अन्तिम हिन्दू राजा श्री चन्द्र मुसलमानों द्वारा पराजित हुए एवं उनकी मृत्यु कालपी में हुई और उनका सिर इस दरवाजे के नीचे गाड़ दिया गया। पातालेश्वर मंदिर कालपी धाम जालौन उत्तर प्रदेश हिजरी 791 में कालपी के राजा लह...

तालबहेट का किला किसने बनवाया - तालबहेट फोर्ट हिस्ट्री इन हिन्दी

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तालबहेट का किला  ललितपुर जनपद मे है। यह स्थान झाँसी – सागर मार्ग पर स्थित है तथा झांसी से 34 मील दूर है तथा इस स्थल में एक रेलवे स्टेशन भी है इसका नामकरण ताल अथवा सरोवर के नाम हुआ है। यहाँ पर झील की आकृति का एक सरोवर है इस सरोवर से गाँव के लोग सिचाई किया करते है। इस क्षेत्र के लोग गौंडवानी भाषा बोलते है। तालबहेट का किला – तालबहेट का किला हिस्ट्री इन हिन्दी प्राचीन किवदंती के अनुसार यह स्थल जिडियाखेरा के नाम से प्रसिद्ध था, और सरोवर के किनारे यहाँ एक प्राचीन नगर बसा हुआ था। इस नगर में चन्देलो का शासन था। जिनके भग्नावशेष अभी भी उपलब्ध होते है। सन्‌ 1618 में यह स्थान भारतशाह के अधिकार में आ गया, जो चन्देरी के नरेश थे। उन्होने यहाँ एक सुन्दर किले का निर्माण कराया जिसके भग्नावशेष यहाँ उपलब्ध होते है। इसी नरेश ने यहाँ एक सुन्दर तालाब का निर्माण कराया और तालबहेट किले के चारो ओर एक ऊँचे परकोटे का निर्माण कराया। बरूआ सागर का किला – बरूआसागर झील का निर्माण किसने और कब करवाया इनके पुत्र देवीसिंह बुन्देला ने सिंह बाग का निर्माण कराया और किले में नरसिंह मन्दिर भी बनवाया। वर्तमान समय मे इस मन्द...