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रानी दुर्गावती का जीवन परिचय

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अनन्य देशभक्ता, वीर  रानी दुर्गावती  ने अपने देश की स्वतंत्रता की रक्षा के लिए अंतिम सांस तक युद्ध किया। रण के मैदान में जब उन्होने देखा कि उनका शौर्य कुछ काम न दे सकेगा तो उन्होने अपनी ही कटार से आत्महत्या कर ली। उनके शौर्य और उनके साहस को देखकर मुगल सम्राट अकबर का सेनापति आसफ खां भी विस्मित हो उठा था। उसने दांतो तले उंगली दबाते हुए विस्मय भरे स्वर में कहा था।–  “कोई नारी भी इतनी शूरवीरा हो सकती है, मैने तो सोचा तक नही था” जबलपुर से कुछ किलोमीटर दूर एक गांव है  “बरेना” । बरेना में श्वेत पत्थरो की एक समाधि बनी हुई है। वह समाधि देश की स्वतंत्रता पर बलिदान होने वाली वीर रानी दुर्गावती की है। जो भी मनुष्य उस ओर से निकलता है, वह समाधि के सामने मस्तक झुकाए बिना आगे नही बढता। वह मस्तक झुकाकर समाधि के पास एक श्वेत पत्थर भी रख देता है। समाधि के पास अनगिनत श्वेत पत्थर रखे हुए है। जो श्रद्धालु मनुष्यों की श्रद्धा के प्रतिक है। रानी दुर्गावती कौन थी जबलपुर से कुछ दूर एक प्राचीन दुर्ग है —  “गढ़ामंडला”। गढ़ामंडला के दुर्ग का निर्माण दलपतशाह ने अपने शासन काल में कराया था। रा...

झांसी की रानी का जीवन परिचय - रानी लक्ष्मीबाई की गाथा

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लक्ष्मीबाई का जन्म वाराणसी जिले के भदैनी नामक नगर में 19 नवम्बर 1828 को हुआ था। उनका बचपन का नाम मणिकर्णिका था परन्तु प्यार से उन्हें मनु कहा जाता था। उनकी माँ का नाम भागीरथीबाई तथा पिता का नाम मोरोपन्त तांबे था। मोरोपन्त एक मराठी थे और मराठा बाजीराव की सेवा में थे। जब मनु का जन्म हुआ था, तो उस समय ज्योतिषियो ने कहा था– कि यह लडकी बडी भाग्यशाली है। आगे चलकर यह जरूर राजरानी होगी। तब कौन कह सकता था कि ज्योतिषियो की यह बात सच साबित होगी। और आगे जाकर यही लडकी झांसी की रानी बनी। झांसी की रानी का बचपन मनु 3-4 वर्ष की ही थी कि उसकी माता का देहांत हो गया। पत्नी की मृत्यु के बाद मोरोपंत बडे दुखी हुए। अत: उन्हें चिंता सताने लगी की वह तो राजकीय काम काज में व्यस्त रहते है। बच्ची की देखभाल कौन करेगा। काफी सोच विचार के बाद मोरोपंत मनु को अपने साथ लेकर पेशवा बाजीराव के पास बिठूर आ गए। मनु बहुत सुंदर थी। पेशवा बाजीराव उसे बहुत प्यार करते थे। मनु की सुंदरता को देखकर वह वे उसे छबीली कहा करते थे। बाजीराव के दो पुत्र थे नानासाहब और रावसाहब। मनु इन दोनो के साथ खूब खेलती थी। दोनो ने मनु को अपनी बहन बना लिय...

बेगम हजरत महल का जीवन परिचय

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बेगम हजरत महल लखनऊ के नवाब वाजिद अली शाह की शरीक-ए-हयात (पत्नी) थी। उनके शौहर वाजिद अली शाह विलासिता और ऐयाशी की जीती जागती मूर्ती थे। हजरत महल की अपनी एक अलग दुनिया थी। और वह उसी दुनिया में खोई रहती थी। बेगम हजरत महल कौन थी? उनका जन्म कब और कहा हुआ था? इस संबंध में किसी प्रकार का कोई पुख्ता प्रमाण प्राप्त नही है। उनके जीवन के संबंध में केवल इतना ही पता चलता है कि उनकी कब्र नेपाल की राजधानी काठमांडू में सडक के किनारे बनी हुई है। इससे ज्ञात होता है की बेगम हजरत महल जीवन के अंतिम दिनो में काठमांडू चली गई थी। और वही उनका निधन हुआ था। बेगम हजरत महल का अंग्रेजो के खिलाफ युद्ध का काल्पिनिक चित्र हजरत महल एक वीरह्रदय स्त्री थी। वे महलो में अवश्य रहती थी, उनका जीवन दास दासियो के बीच अवश्य व्यतीत होता था, पर जब समय आया तो वे बाहर निकलने से नही झिझकी। उन्होने बाहर निकलकर हाथो में तलवार ग्रहण की और घोडे तथा हाथी पर सवार होकर अंग्रेजो के साथ युद्ध भी किया। उन्होने युद्ध में जो ववीरता दिखाई थी, उसकी प्रशंसा अंग्रेज इतिहासकारो ने भी की है। झांसी की रानी का जीवन परिचय – रानी लक्ष्मीबाई की गाथा एक अंग...

रानी भवानी की जीवनी - रानी भवानी का जीवन परिचय

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रानी भवानी अहिंसा मानवता और शांति की प्रतिमूर्ति थी। वे स्वर्ग के वैभवका परित्याग करने के लिए हमेशा तैयार रहती थी। परंतु अहिसा और मानवता को छोडना उन्हे गवारा नही था। रानी भवानी का जन्म सन् 1716 में बोगरा में हुआ था जो वर्तमान में बंगलादेश का हिस्सा है। भवानी के पिता का नाम आत्माराम चौधरी था जो एक गरीब गरीब ब्राह्मण थे। भवानी का विवाह आठ वर्ष की उम्र में ही रामाकांत के साथ हो गया था। रामाकांत नाटौर के उतराधिकारी थे। नाटौर के राजा ने उन्हे दत्तक पुत्र के रूप में गोद लिया था। रानी भवानी को पत्नी के रूप में पाकर रामाकांत का जीवन सफल हो गया था। रानी भवानी का जीवन परिचय हिन्दी में रानी सती मंदिर झुंझुनूं राजस्थान – रानी सती दादी मंदिर हिस्ट्री इन हिन्दी उन दिनो नवाब और ईस्ट इंडिया कंपनी, दोनो बंगाल की हरी भरी धरती को उजाड रहे थे। नवाब के पद पर अलीवर्दी खां था। उसने मुगल शासन की कमजोरी का लाभ उठाकर सारे बंगाल पर अपना प्रभुत्व स्थापित कर लिया था। मुर्शीदाबाद उसकी राजधानी थी। ईस्ट इंडिया कंपनी की ओर से वारेन हेस्टिंगस गवर्नर जनरल के पद पर प्रतिष्ठित था। वह बडी चालाकी से नवाब को अपने साथ मिलाकर ...

रानी चेन्नमा की कहानी - कित्तूर की रानी चेन्नमा

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रानी चेन्नमा का जन्म सन् 1778 में काकतीय राजवंश में हुआ था। चेन्नमा के पिता का नाम घुलप्पा देसाई और माता का नाम पद्मावती था। चेन्नमा के माता पिता दोनो सद्गुण संपन्न वीर और देशभक्त थे। बालिका चेन्नमा बचपन में बडी सुंदर और गुणवान थी। बच्ची के रूप और सुंदरता के कारण ही बच्ची का नाम  “चेन्नमा”  रखा गया था। चेन्नमा का अर्थ होता है जो देखने में अति सुंदर हो। माता पिता भी सुंदर और गुणवान पुत्री पाकर हर्ष से फूले नही समाते थे। धीरे धीरे जब पुत्री बडी होती गई तो उसकी शिक्षा दिक्षा पर भी ध्यान दिया गया चेन्नमा ने कन्नड उर्दू मराठी और संस्कृत भाषाओ का ज्ञान प्राप्त किया। इसके साथ साथ वह घुडसवारीऔर शस्त्र विद्या का भी अभ्यास करती थी। बारह तेरह साल की अवस्था में ही चेन्नमा शस्त्र विद्या और घुडसवारी में निपुण हो चुकी थी। कित्तूर की रानी चेन्नमा की वीर गाथा रानी चेन्नमा की जीवनी चेन्नमा जब विवाह योग्य हुई तो उनका विवाह कित्तूर के राजा मल्लसर्ज के साथ कर दिया गया। पूना से जो सडक बंगलौर के लिए जाती है। उसी सडक पर बेलगांव से पाच मील दूर कित्तूर पडता है। उन दिनो कित्तूर का राज्य बडा वैभवशाली था।...

भीमाबाई की जीवनी - भीमाबाई का जीवन परिचय

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भीमाबाई महान देशभक्ता और वीरह्रदया थी। सन् 1857 के लगभग उन्होने अंग्रेजो से युद्ध करके अद्भुत वीरता और साहस का प्रदर्शन किया था। उनकी देशभक्ति और वीरता ने उन्हे अमर बना दिया। भीमाबाई दूसरी लक्ष्मीबाई थी। यद्यपि उनकी वीरता की कहानी बहुत लंबी नही है। पर जोभी है, उसमे वीरता और साहस की अद्भुत गाथा है। जिसने उन्हे लक्ष्मीबाई जैसी भारतीय वीरांगनाओ की पंक्ति में बिठा दिया। अपने इस लेख में हम भारत की इसी विरांगना भीमाबाई की जीवनी, भीमाबाई का जीवन परिचय और भीमाबाई की वीरता की कहानी को विस्तार से जानेगें। भीमाबाई का बचपन भीमाबाई का जन्म सन् 1835 के लगभग होल्कर राज्य में हुआ था। वहह होल्कर राज्य के नृपति की पुत्री थी। उनके पिता का नाम जसवंत और माता का नाम केसरी बाई था। भीमा बाई के माता पिता दोनो शूरवीर थे। उन्हें वीरता अपने पूर्वजो से ही प्राप्त हुई थी। भीमा बाई बचपन से ही वीरता के चित्र बनाया करती थी। उन्हें गुडिया गुड्डो के साथ खेलने की अपेक्षा शस्त्रो से खेलना बहुत पसंद था। बचपन से ही वह धनुष पर बाण रखकर निशाना ललगाया करती थी। यह बच्ची जैसे जैसे उम्र की सीढियो पर चढने लगी वैसे वैसे उसकी वीरता ...

मैडम कामा का जीवन परिचय - मैडम भीकाजी कामा इन हिन्दी

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मैडम कामा कौन कौन थी? अपने देश से प्रेम होने के कारण ही मैडम कामा अपने देश से दूर थी। वे भारत से बाहर रहकर भारत की स्वतंत्रता चाहने वाले क्रातिकारियो में से एक थी। वह विदेश रहकर भी भारत के क्रांतिकारियो की मदद करती थी। क्रांतिकारियो की मदद करने के कारण ही उनकी आर्थिक स्थिति भी खराब हो गई थी। मैडम कामा उन दिनों फ्रांस में थी। तथा धनाभाव के कारण बडा कष्ट झेल रही थी। एक दिन उनके एक परिचित ने उनके पास कहा– आप तो संपन्न घराने की है। फिर इस तरह विदेशो में क्यो कष्टो की आग में जल रही है? कमला देवी चट्टोपाध्याय की जीवनी – स्वतंत्रता सेनानी मैडम भीकाजी कामा ने उत्तर दिया– आप जिसे कष्ट समझ रहे है, मै उसे कष्ट नही समझती।.मै उसे सुख समझती हूं। क्योकि उसके मूल में देशप्रेम और देशभक्ति है। भारत की स्वतंत्रता की कहानी को हम दो भागो में बांट सकते है। एक भाग तो वह है। जिसमे भारत के सपूत स्वतंत्रता के लिए शस्त्रो का अवलंबन लेते हुए दिखाई पडते है। तो दूसरे भाग में अहिंसा को मानने वाले है। मैडम कामा प्रथम भाग के क्रांतिकारियो में से थी। वे महान क्रांतिकारिणी थी। यद्यपि वे न तो गिरफ्तार हुई और न ही उन्हे क...

रानी पद्मावती की जीवनी - रानी पद्मिनी की कहानी

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महाराणा लक्ष्मण सिंह अपने पिता की गद्दी पर सन् 1275 मैं बैठे। महाराणा के नाबालिग होने के कारण, राज्य का सारा कारोबार उनके काका भीमसिंह जी चलाते थे। भीमसिंह का विवाह चौहान राजा हमीरसिंह की पुत्री पद्मिनी से हुआ था। जो अत्यंत रूपवती थी। रानी पद्मावती का रूप राजपूताना की दुर्दशा का कारण बना। उनके रूप की प्रशंसा सारे देश मैं फैल गई थी। उस समय दिल्ली की गद्दी पर अत्याचारी अलाउद्दीन खिलजी राज करता था। उसने रानी पद्मावती के रूप की प्रशंसा सुनकर उन्हें प्राप्त करने की मन में ठान ली। इसलिए उसने मेवाड पर चढाई करके चित्तौड़ को घेर लिया। और अपने दूत द्वारा चित्तौड़ संदेश भेजा की हम पद्मिनी को साथ लिए बिना दिल्ली वापस नही जाएंगे। रानी सती मंदिर झुंझुनूं राजस्थान – रानी सती दादी मंदिर हिस्ट्री इन हिन्दी परंतु राजपूतों की बहादुरी के सामने उसकी सेना ठहर न सकी। और वह वहां से निराश होकर खाली हाथ दिल्ली वापस चल पडा। परंतु रानी पद्मावती के रूप का जादू उसे चैन से नही बैठने दे रहा था। उसने निश्चय कर लिया कि बिना पद्मिनी को लिए चित्तौड़ से नही लौटूँगा। उसने दौबारा फिर चित्तौड़ को चारों ओर से घेर लिया। और राणा को...