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कोलकाता दर्शनीय स्थल - कोलकाता के टॉप 20 पर्यटन स्थल

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कोलकाता भारत के पश्चिम बंगाल राज्य की राजधानी है। तथा इसकी गीनती भारत के 4 सबसे बडे महानगरो में की जाती है। कोलकाता को पूर्वी भारत का प्रवेशद्वार भी माना जाता है। कोलकाता दर्शनीय स्थल की फेरहिस्त बहुत लम्बी है। लेकिन हम आपको अपने इस लेख में कोलकाता के टॉप 20 पर्यटन स्थलो की जानकारी हिन्दी में देगें। कोलकाता की सैर करने का अपना अलग ही मजा है। क्योकि हुगली नदी के किनारे बसा यह शहर कला और सांस्कृतिक गतिविधियो में इतना धनी है कि इसे देश की सांस्कृतिक राजधानी भी कहा जाता है। कहा जाता है कि सन्  1690 में जब एक अंग्रेज व्यापारी जॉब चारनाक ने यहा ईस्ट इंडिया कंपनी के व्यापारिक मुख्यालय की नीव रखी थी। तब यह एक छोटा सा गांव था। आज यही गांव कोलकाता महानगर के रूप में विकसित होकर विश्व प्रसिद्ध हो चुका है। यह महानगर अपनी गोद में अनेक सुंदर व आकर्षक पर्यटन स्थलो को संजोए हुए है। इसलिए साल भर यहा सैलानियो का आना जाना लगा रहता है। कोलकाता में घुमने लायक यूं तो अनेको स्थल है। आइए कोलकाता के टॉप 20 टूरिस्ट पैलेस के बारे में विस्तार से जानते है।   कोलकाता के दर्शनीय स्थलो के सुंदर दृश्य   कोलकात...

पांडुआ का इतिहास - पांडुआ के दर्शनीय स्थल

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पांडुआ यह स्थान गोलपाड़ा के निकट है। मध्य काल में यह बंगाल प्रांत का एक हिस्सा हुआ करता था। आजकल पांडुआ भारत के पश्चिम  बंगाल राज्य के हुगली ज़िले में स्थित एक शहर है। इसके गौरवशाली इतिहास के कारण यहां कई ऐतिहासिक स्मारक और भवन जो पांडुआ के पर्यटन में मुख्य भूमिका निभाते हैं।   पांडुआ का इतिहास – पांडुआ हिस्ट्री इन हिन्दी   मुहम्मद तुगलक के काल में अलाउद्दीन अली शाह (1339-45) ने अपने आपको लखनौती में स्वतंत्र घोषित कर तत्कालीन बंगाल प्रांत के पश्चिमी हिस्सों पर कब्जा कर लिया और अपनी राजधानी लखनौती से पांडुआ बदल ली। 1345 में उसके सौतेले भाई हाजी इलियास ने अपने आपको पूरे बंगाल प्रांत का स्वतंत्र शासक घोषित कर लिया और अपने राज्य की सीमा पश्चिम में बनारस तक बढ़ा ली। फिरोजशाह तुगलक ने उस पर चढ़ाई करके उससे एक संधि की और इलियास एक स्वतंत्र शासक की तरह बना रहा। उसने उड़ीसा पर आक्रमण करके चिल्का झील तक के इलाके को रौंद डाला।   उसके बाद उसका पुत्र सिकंदर 1357 में यहां का शासक बना। फिरोज ने बंगाल को जीतने का प्रयास एक बार फिर किया, परंतु सफल न हो सका। 1398 में तैमूरलंग के आक्र...

गौड़ का इतिहास - गौड़ मालदा के दर्शनीय स्थल

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गौड़ या गौर भारत के पश्चिम  बंगाल राज्य के मालदा जिले में स्थित एक ऐतिहासिक नगर है। किसी समय गौड़ राज्य हुआ करता था। सातवीं शताब्दी में यहां शशांक का राज्य था। हर्षवर्धन ने उसे कामरूप (आधुनिक असम) के राजा भास्कर वर्मन की सहायता से हरा दिया था। इसके बाद बंगाल के पूर्वी भाग, जिसमें गौड़ पड़ता था, को भास्कर वर्मन ने और पश्चिमी भाग को हर्षवर्धन ने अपने साम्राज्य में मिला लिया। आठवीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में कन्‍नौज के यशोवर्मा ने गौड़ के राजा को परास्त किया। इसके बाद कश्मीर के ललितादित्य, कामरूप के श्री हर्ष तथा कुछ अन्य राजाओं ने इस प्रदेश को रौंदा। इस प्रकार जब यहां अधिक अराजकता फैल गई, तो जनता ने गोपाल को अपना शासक चुनकर उसे राज्य भार सौंपा। उसने गौड़ में पाल वंश की नींव डाली। गोपाल ने यहाँ 780 ई० तक राज्य किया।   गौड़ का इतिहास – गौर का इतिहास   उसके बाद धर्मपाल (780-810), देव पाल (810-50) और महीपाल ने राज्य किया। धर्मपाल को अपने अस्तित्व के लिए प्रतिहार राजा वत्सराज से युद्ध करना पड़ा था, परंतु हार गया। परंतु राष्ट्रकूट शासक ध्रुव की सहायता से वह पुनः जीत गया। बाद में...

मुर्शिदाबाद का इतिहास - मुर्शिदाबाद के दर्शनीय स्थल

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मुर्शिदाबाद यह शहर कलकत्ता से 224 किमी दूर है। और  पश्चिम बंगाल राज्य के प्रमुख शहरों में आता है। मुर्शिदाबाद का इतिहास देखने से पता चलता है कि औरंगजेब के समय में आजिम यहां का सूबेदार था। औरंगजेब की मृत्यु के बाद वह अपने दीवान और नाएब सूबेदार मुर्शीद कुली जाफर खाँ को शासन-भार सौंपकर दिल्‍ली चला गया। 1713 में फरुखसियार ने मुर्शीद कुली जाफर खाँ को बंगाल का और 1719 में बिहार का सूबेदार बना दिया।   मुर्शिदाबाद का इतिहास   सन् 1727 में मुर्शीद कुली की मृत्यु के बाद उसका बेटा शुजाउद्दीन सूबेदार बना। 1733 में शुजाउद्दीन को बिहार का शासन भार सौंप दिया गया। 1739 में उसकी मृत्यु के बाद उसका बेटा सरफराज खाँ तीनों प्रांतों का नवाब बना। 1740 में अलीवर्दी खाँ सरफराज खाँ को मारकर स्वयं नवाब बन गया। दिल्‍ली के सम्राट ने उससे दो करोड़ रु. की भेंट लेकर उसकी सूबेदारी को मान्यता दे दी। साहू के पेशवा बालाजी बाजीराव ने मुर्शिदाबाद जीतकर चौथ के रूप में 12 करोड़ रुपये वसूले।   अलीवर्दी खाँ के बाद उसके भाई का पोता मिर्जा मुहम्मद उर्फ सिराजुद्दौला (1756-57) यहां का नवाब बना। सिराजुद्दौला का ...

कूच बिहार का इतिहास - कूच बिहार के दर्शनीय स्थल

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कूच बिहार  पश्चिम बंगाल राज्य का एक प्रमुख नगर और जिला है, यह जिला मुख्यालय भी है। कूच बिहार यह स्थान न्यू जलपाईगुड़ी के पूर्व में है। पहले इसे कोच बिहार कहा जाता है। सन् 1515 में यहां कोच जन-जाति के विश्वा सिन्हा ने एक शक्तिशाली शासन की स्थापना की थी। वह कामत राज्य का राजा था। उसके बाद उसके पुत्र नर नारायण के काल में राज्य की काफी उन्नति हुई, परंतु 1581 में उसके भतीजे रघुदेव ने उससे संकोष नदी के पूर्व के इलाके छीन लिए।   1639 में इस पर मुस्लिमों ने अधिकार कर लिया। औरंगजेब के बंगाल के सूबेदार मीर जुमला ने 1661 में असम के राजा से कूच बिहार छीन लिया। केशव चंद्र सेन के नेतृत्व में भारतीय ब्रहम समाज ने प्रयास करके 1872 में बाल विवाह के विरुद्ध विवाह अधिनियम पास कराया था, परंतु जब मार्च, 1878 में केशव चंद्र सेन ने अपनी 13 वर्षीय पुत्री का विवाह यहाँ के 14 वर्षीय राजकुमार के साथ कर दिया तो उसके अनुयायी विद्रोह करके उससे अलग हो गए और उन्होंने साधारण ब्रहम समाज की स्थापना कर ली।   कूच बिहार के दर्शनीय स्थल – कूच बिहार पर्यटन स्थल राजबाड़ी कूच बिहार राजबाड़ी या कूचबिहार पैलेस पश्...

नादिया के दर्शनीय स्थल - कृष्णानगर पर्यटन स्थल

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नादिया पश्चिम  बंगाल का एक जिला है जिसका जिला मुख्यालय कृष्णानगर है। नादिया सेन राजपूतों की राजधानी थी। मुहम्मद गौरी के सहायक सेनानायक बख्तियार खिलजी ने नादिया पर 1197 ई० में घोड़ों के सौदागर के रूप में उस समय आक्रमण कर दिया, जिस समय यहां का राजा लक्षमण सेन युद्ध के लिए तैयार न था। फलस्वरूप वह यहां से भाग खड़ा हुआ। गौरी ने बंगाल पर आधिपत्य कर लिया और बखतियार खिलजी को बंगाल तथा बिहार का राज्यपाल बना दिया।   1206 ई० में गौरी की मृत्यु के बाद बख्तियार खिलजी यहां का स्वतंत्र शासक बन बैठा। बाद में अली मर्दान ने बख्तियार खिलजी का वध करके नादिया पर कब्जा कर लिया, परंतु इसका भी उसी के सेनानायकों द्वारा वध कर दिया गया। नादिया को लेकर एक ओर इसके सूबेदार तथा उसके पुत्र व दूसरी ओर अल्तमश के मध्य 1225 से 1230 तक युद्ध होते रहे। श्रीकृष्ण के प्रसिद्ध अनुयायी चैतन्य महाप्रभु का जन्म नादिया में ही 1485 ई० में हुआ था।   नादिया के दर्शनीय स्थल – नादिया के पर्यटन स्थल नवद्वीप धाम नादिया नवद्वीप नादिया जिले में कृष्णानगर से लगभग 20 किलोमीटर दूर भागीरथी नदी के पश्चिमी तट पर स्थित है, और भगवा...

बैरकपुर छावनी कहां है - बैरकपुर दर्शनीय स्थल

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बैरकपुर  पश्चिम बंगाल राज्य के उत्तर 24 परगना जिले में स्थित एक ऐतिहासिक नगर है। यह नगर हुगली नदी के पूर्वी तट पर स्थित है। यह कोलकाता महानगर क्षेत्र के अंतर्गत भी आता है। कोलकाता से बैरकपुर 25 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। बैरकपुर में अंग्रेजी सेना की छावनी हुआ करती थी। 1857 की क्रांति का सर्वप्रथम बिगुल यही से वीर शहीद मंगल पांडे द्वारा बजाया गया था।   लार्ड एम्हर्स्ट के काल (1823-26) में यहां एक सैनिक आंदोलन हुआ था। उसने यहां स्थित एक हिंदू टुकड़ी को बर्मा युद्ध में भाग लेने का आदेश दिया। हिंदू सैनिकों का विचार था कि दूसरे देश में जाने से उनका धर्म भ्रष्ट हो जाएगा। अतः उन्होंने यह आदेश मानने से इन्कार कर दिया। एम्हर्स्ट ने अनेक सैनिकों को मारने का आदेश दे दिया। बैरकपुर ही वह स्थान है, जहां प्रथम स्वतंत्रता आंदोलन की चिंगारी प्रज्वलित हुई। यहां पर एक अंग्रेजी कंपनी ठहरी हुई थी, जिसमें अनेक हिंदू और मुस्लिम सिपाही थे। ऐसा विश्वास है कि अंग्रेज इन सैनिकों को गाय और सूअर की चर्बी वाले कारतूस प्रयोग करने के लिए देते थे। 29 मार्च, 1857 को एक सैनिक मंगल पांडे ने ऐसे कारतूसों का प...

दीघा बीच कहां है - दीघा बीच की जानकारी हिंदी में

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दीघा कलकत्ता से 183 किमी की दूरी पर एक खूबसूरत समुंद्री तट है। प्राकतिक संपदा से भरपूर और छह किमी लंबा यह तट संसार के लंबे समुंद्री तटों में गिना जाता है। यह  पश्चिम बंगाल का सबसे लोकप्रिय तट भी है। दीघा बीच के पास दादनपात्र में नमक बनाया जाता है। यहां से लगभग आठ किमी दूर चंदनेश्वर में एक प्राचीन शिव मंदिर है। दस किमी दूर शंकरपुर मछली बंदरगाह तथा लगभग 44 किमी दूर दरियापुर में एक प्रकाश स्तंभ है। इतनी ही दूर समुंद्री जीवों संबंधी एक संग्रहालय है। दीघा से सागर द्वीप भी जाया जा सकता है, जहां गंगा समुंद्र में मिलती है। यहां पर प्रति वर्ष मकर संक्रांति के अवसर पर मेला लगता है। कपिल मुनि का आश्रम यहीं पर था।   दीघा बीच पश्चिम बंगाल दीघा पश्चिम बंगाल में स्थित एक छोटा समुद्र तट शहर है। इस शहर के सबसे प्रसिद्ध समुद्र तटों में से एक न्यू दीघा बीच है। दूसरा ओल्ड दीघा बीच। दोनों तट एक दूसरे से लगभग 2 किलोमीटर की दूरी पर स्थित यह गंतव्य एक मानव निर्मित आकर्षण है। इसकी आसान पहुंच, बड़े विस्तार और कम भीड़ के के कारण इसे पर्यटकों द्वारा पसंद किया जाता है।   दीघा बीच न्यू दीघा बीच की मु...

तामलुक कहां है इतिहास और दर्शनीय स्थल

तामलुक  पश्चिम बंगाल में गंगा के पूर्व-पश्चिमी डेल्टा पर स्थित है। यह पश्चिम बंगाल के पूर्व मेदिनीपुर जिले में स्थित एक नगर है, तथा यह पूर्व मेदिनीपुर जिले का मुख्यालय भी है। इसे ताम्रलिप्त भी कहा जाता है। मौर्य पूर्व और मौर्य काल के दौरान यह एक बंदरगाह थी। यहां से दक्षिण-पूर्व एशिया, चीन, बर्मा, जावा, सुमात्रा, कम्बोडिया और रोम के साथ व्यापार किया जाता था। रोम भारत को शराब, दुहवत्थे कलश और लाल रंग के चमकीले बर्तन तथा चीन रेशमी वस्तुएं भेजता था।   भारत से इन देशों को मोती बहुमूल्य रत्न, वस्त्र, मसाले, हाथी दाँत की वस्तुएं, नील, दवाइयां, नारियल और सुगंधित तेल भेजे जाते थे। सड़क मार्ग से यह स्थान पाटलीपुत्र, प्रयाग, कान्यकुब्ज और पुष्कलावती से जुड़ा हुआ था। यहाँ पाए गए 200 ई०्पू० के 350 ईस्वी सिक्‍कों से सिद्ध होता है कि यह स्थान उन दिनों व्यापार का प्रमुख केंद्र था। यहां अशोक का स्तूप और बहुत से बौद्ध मठ भी पाए गए हैं। इन बौद्ध मठों में अनेक बौद्ध रहते थे। सांस्कृतिक दृष्टि से भी प्राचीन काल में यह एक महत्त्वपूर्ण शहर था। पर्यटन की दृष्टि से यह स्थान काफी महत्वपूर्ण है। तामलुक...

गंगासागर तीर्थ - गंगासागर का इतिहास - गंगासागर का मंदिर

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गंगा नदी का जिस स्थान पर समुद्र के साथ संगम हुआ है। उस स्थान को गंगासागर कहा गया है। गंगासागर तीर्थ एक सुंदर वन द्वीप समूह हैं। जो बंगाल राज्य की दक्षिण सीमा मे बंगाल की खाडी पर स्थिति है। गंगासागर धाम को प्राचीन समय में पाताल लोक के नाम से भी जाना जाता था। नैमिषारण्य का इतिहास – नैमिषारण्य तीर्थ का महत्व मकर सक्रांति को यहा मेला लगता हैं। मेले के दिनो मैं यहाँ काफी भीडभाड रहती है। लेकिन बाकी के दिनो मैं शांति व एकाकीपन छाया रहता है। मकर सक्रांति के दिन गंगासागर तीर्थ पर सागर मे स्नान का महात्म्य सबसे बड़ा माना गया है। माना जाता है कि सारे तीर्थों का फल अकेले गंगासागर तीर्थ मे मिल जाता है।   गंगासागर तीर्थ की धार्मिक पृष्ठभूमि राजा भागिरथ ने अपने 60 हजार पितरो के उद्धार के लिए, भगवान शंकर जी की कठोर तपस्या कर गंगा जी को धरती पर लाए। भागिरथ के पितर कपिल ऋषि की क्रोधाग्नि मे जलकर राख हो गए थे। गंगा जी भगवान शंकर की जटाओं को छोडते ही वह राजा भागिरथ के पीछे पीछे चल दी, और हिमालय के पहाड़ों से हरिद्वार के मैदान मे उतरी, उसके बाद काशी होते हुए प्रयाग आई, और वहा से कलकत्ता पहुंची। वहा से डा...

तारकेश्वर मंदिर - तारकेश्वर महादेव कोलकाता, बाबा तारकनाथ मंदिर

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भारत के बंगाल राज्य की राजधानी कोलकाता से 85 किलोमीटर की दूरी पर हुुगली जिले में तारकेश्वर नामक एक प्रमुख शहर है। यह शहर यहां स्थित ताड़केश्वर मंदिर के रूप में काफी प्रसिद्ध है। इस शहर का नाम भी इस मंदिर के ऊपर ही पड़ा है। तारकेश्वर मंदिर भगवान तारकनाथ को समर्पित है, जो भगवान शिव के ही एक रूप है।  अपने इस लेख में हम तारकेश्वर महादेव की यात्रा करेगें और तारकेश्वर टेम्पल हिस्ट्री, ताड़केश्वर महादेव स्टोरी, तारकेश्वर महादेव की कहानी, तारकेश्वर मंदिर कहाँ है। ताडकेश्वर शिव मंदिर, तथा बाबा तारकनाथ मंदिर के बारें में विस्तार से जानेंगे।   तारकेश्वर महादेव कहानी , तारकेश्वर मंदिर महादेव स्टोरी Tarkeshwar Mahadev Temple story in hindi, About Tarkeshwar Mahadev temple kolkata तारकेश्वर महादेव   अधिक पैसा कमाना चाहते हैं तो यहां क्लिक करें   तारकेश्वर महादेव मंदिर बंगाल का प्रमुख शिव मंदिर है। जिसके बारें में.कहा जाता है कि भारमल राव जो राजा विष्णु दास का भाई था, उसके महल में एक बहुत सुंदर गाय थी। जिसका नाम कपिला था। भारमल का महल तारकेश्वर महादेव से 3 मील दक्षिण में रामनगर गाँ...

तारापीठ मंदिर का इतिहास - तारापीठ का श्मशान - वामाखेपा की पूरी कहानी

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तारापीठ पश्चिम बंगाल के वीरभूमि जिले में स्थित है। यह जिला धार्मिक महत्व से बहुत प्रसिद्ध जिला है, क्योंकि हिन्दुओं के 51 शक्तिपीठों में से पांच शक्तिपीठ वीरभूमि जिले में ही है। बकुरेश्वर, नालहाटी, बन्दीकेश्वरी, फुलोरा देवी और तारापीठ। तारापीठ यहां का सबसे प्रमुख धार्मिक तीर्थ है। और यह एक सिद्धपीठ भी है। यहां पर एक सिद्ध पुरूष वामाखेपा का जन्म हुआ था, उनका पैतृक आवास आटला गांव में है। जो तारापीठ मंदिर से 2 किमी की दूरी है। कहते है कि वामाखेपा को माँ तारा के मंदिर के सामने महाश्मशान में तारा देवी के दर्शन हुए थे। वही पर वामाखेपा को सिद्धि प्राप्त हुई और वह सिद्ध पुरूष कहलाए। माँ तारा, काली माता का एक रूप है। मंदिर में माँ काली की मूर्ति की पूजा माँ तारा के रूप मे की जाती है।     तारापीठ का इतिहास, तारापीठ का धार्मिक महत्व     तारापीठ मुख्य मंदिर के सामने महाश्मशान है। उसके बाद द्वारिका नदी है, इस नदी में आश्चर्य की बात यह है कि भारत की सब नदियां उत्तर से दक्षिण की ओर बहती है। लेकिन यह नदी दक्षिण से उत्तर की ओर बहती है।   तारापीठ राजा दशरथ के कुलपुरोहित वशिष्ठ ...

दार्जिलिंग के पर्यटन स्थल - दार्जिलिंग पर्यटन के बारे में

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दार्जिलिंग हिमालय पर्वत की पूर्वोत्तर श्रृंखलाओं में बसा शांतमना दार्जिलिंग शहर पर्यटकों को बरबस ही अपनी ओर आकर्षित कर लेता है। लगभग 7000 फुट तक की ऊँची श्रृंखलाओं को काट-काटकर बसा यह ढलवां शहर पर्यटकों के लिए नयनाभिराम दृश्य प्रस्तुत करता है। अत्यंत साफ-सुथरा दार्जिलिंग अपने निश्छल-हृदय निवासियों का प्रतिबिंब है। यह ऐसा शहर है, जिसकी यात्रा के आरंभ-स्थल से ही मन रोमांचित होना शुरू हो जाता है।   दार्जिलिंग टॉय ट्रेन का सुहाना सफर   दार्जिलिंग यात्रा का वह आरंभ-स्थल है न्यू जलपाईगुड़ी स्टेशन, जिसे संक्षेप में ऐनजेपी भी कहते हैं। दार्जिलिंग के लिए ऐनजेपी स्टेशन से रेलगाड़ी पकड़नी होती है। यह गाड़ी खिलौना गाड़ी के नाम से ज्यादा जानी जाती है। इसे 1881 में फ्रैंकलिन प्रेस्टेज द्वारा चलाया गया था। ज्यों-ज्यों हम ऐनजेपी से दार्जिलिंग की ओर बढ़ते हैं, इसका चुंबकीय आकर्षण हमें बरबस अपनी ओर खींचता महसूस होता है। इसी आकर्षण वश हम प्रकृति की गोद में समाते चले जाते हैं। दार्जिलिंग वस्तुत: प्रकृति की गोद है। इस गोद में जो आकर्षण है, जो स्नेह है जो मधुरता है और जो विशालता है, वह यहां की घाटि...