बदरुद्दीन तैयबजी कौन थे और उनका जीवन परिचय

बदरुद्दीन तैयबजी 8 अक्टूबर 1844 को एक सम्मानित अरबी घराने में जो बहुत समय से बम्बई आ बसा था, पैदा हुए थे। बदरुद्दीन तैयब के पिता तैयबजी भाई मियां एक समृद्ध व्यापारी ओर सूरुचि वाले सुसंस्कृत व्यक्ति थे।

 

बदरुद्दीन तैयबजी का जीवन परिचय हिन्दी में

 

बचपन मे उर्दू फारसी की शिक्षा आपने दादा मखरा के मदरसे में प्राप्त की। फिर एलफिस्टन इंस्टीट्यूशन ( अब कालेज ) में भर्ती हुए, पर वहां ज्यादा नहीं रहे। आंख के इलाज के लिए पिता ने आपको फ्रांस भेज दिया, वहां से इंग्लैंड गये और लन्दन के न्यूबरी हाईपार्क कालेज में भर्ती हुए। वहां लन्दन यूनिवर्सिटी से मैट्रिक पास किया, पर तन्दुरुसती खराब होने के कारण उसके बाद शीघ्र ही हिन्दुस्तान लौट आये। एक साल यहां रहकर 1865 में फिर इंग्लैंड गये और अप्रैल 1867 में बेरिस्टरी पास की। नवम्बर 1867 में भारत लौटे और दिसम्बर में बम्बई हाईकोर्ट के एडवोकेट बन गये यही आपके भाई कमरूद्दीन तैयबजी एटर्नी थे, जिससे आपका बड़ी सुविधा रही। अपनी योग्यता से, खासकर जिरह में, आपने बहुत ख्याति प्राप्त की।

 

बदरुद्दीन तैयबजी
बदरुद्दीन तैयबजी

 

बेरिस्टरी शुरू करने के बाद पहले दस वर्ष तो आप अपने धंधे को बढ़ाने में लगे रहे और खूब यश व धन अर्जन किया। दूसरे दस वर्ष नयी ज़िम्मेदारियों के साथ शुरू हुआ। मैंचेस्टर मे आने वाले माल (विलायती कपड़े ) पर से आयात-कर उठाने के विरुद्ध हुए आन्दोलन में बम्बई के अन्य प्रमुख नागरिकों के साथ आप भी सम्मिलित हुए। इस सिलसिले में आपने ऐसा सुन्दर भाषण दिया, कि उसकी चारो ओर प्रशंसा हुई।

 

1882 में बम्बई के तत्कालीन गवर्नर सर जैम्स फ़म्युर्सन ने आपको बम्बई-कौंसिल का अतिरिक्त-सदस्य नियुक्त किया। वहां स्थानिक संस्थाओं सम्बन्धी ( बॉम्बे लोकल बोर्डस एण्ड’ म्यूनिसिपैलिटीज़ ) बिलो की बहस में आपने प्रमुख भाग लिया। बारीकी की दलीलों, विचारपूर्ण निर्णय, स्पष्ट विवेचन और प्रभावकारी वक्तृत्व में आपका सिक्का जम गया, यहां तक कि कौंसिल के अध्यक्ष की हैसियत से सर जैम्स ने आपके भाषणों की प्रशंसा करते हुए कहा कि “ब्रिटिश कॉमन सभा में वे होते तो वहां भी उन्हें बड़े ध्यान के साथ सुना जाता।” बम्बई के श्रोताओं में आप इतने लोकप्रिय थे कि हर एक सभा में लोग आपका भाषण सुनने के लिए उत्सुक रहते थे। उन दिनो के बदरुद्दीन तैयबजी जी के कई भाषण तो स्मरणीय हैं।

 

आपकी सार्वजनिक सेवाओं से प्रसन्न होकर 1887 में देश ने अपनी राष्ट्रीय महासभा के तीसरे अधिवेशन (मद्रास) का आपको सभापति बनाया। उस समय आपने जो भाषण दिया उसने आपके वक्‍तृत्व की धाक बैठा दी। बम्बई में आपके कहने पर इस काम के लिए एक समिति बनाई गई कि कॉग्रेस में विचारार्थ जो बहुत से प्रस्ताव आये उन पर विचार करके कांग्रेस का कार्यक्रम ( एजैंडा ) निश्चित किया जाया करे। इस समिति को बाद में बनने वाली विषय निर्वाचन समिति का पूर्व रूप कहना चाहिए। फिर बम्बई में 1904 मे होने वाले बीसवें अधिवेशन तक आप कांग्रेस सम्बन्धी किसी हलचल में नहीं दिखते, क्यों कि इस बीच आप बम्बई हाईकोर्ट के जज हो गये थे, पर रहे उन दिनो में भी आप सदा कांग्रेस के हामी।

 

1887 में जब आप कोंग्रेस के सभापति हुए तब बम्बई के अन्जुमन ए-इस्लाम के भी सदस्य थे ओर कांग्रेस के सिद्धान्तों व राजनीति को अंगीकार करके भी आपने उसे छोड़ नहीं दिया। इससे आपने यह सिद्ध कर दिया कि मुसलमानों के कोंग्रेस में शामिल होने में कोई बाधा नही है। 1903 मे अखिल भारतीय मुसलिम शिक्षा परिषद्‌ के सभापति की हैसियत से तो आपने साफ ही कह दिया था, कि “ऐसी किसी संस्था की कार्यवाई में में भाग नहीं ले सकता जो किसी भी तरह कांग्रेस के विरुद्ध हो या उससे विरुद्ध प्रतीत होती।” आपका मत था कि सरकार भी चाहे खुलेआम कोंग्रेस से अपनी सहानुभूति न दरसाये पर दिल मे वस्तुतः उसके और उसके सदस्यों के लिए बड़ा ऊंचा ख्याल रखती है और समय समय उसके प्रस्तावों पर अमल भी करती रहती है। लेकिन थे आप सोलह आना नरम विचारों के और कहा करते थे कि हमें अपने भाषणों मे बहुत सतर्क रहना चाहिए। एक बार तो आपने यहां तक कह डाला था “कि “हमारे देशवासियों ने उच्छुडंलता ओर स्वतन्त्रता के भेद को पूरी तरह नहीं समझा है और यह वे नहीं जानते कि स्वतन्त्रता में जहां सुविधायें होती हैं वहां उससे ज़िम्मेदारियां भी कुछ कम नहीं आती।””

 

भारतीय मुसलमानों मे समाज सुधार-आन्दोलन के आप अग्रणी थे। इस बात की आपने शिकायत की थी कि मुसलमान ही नहीं बल्कि हिन्दू-मुमलमान सभी हिन्दुस्तानी समाज-सुधार से राजनीति पर ज्यादा ध्यान देते हैं। एक बार आपने कहा था, “मुझे भय है कि तरुण भारत ने राजनीति पर भी बहुत ज्यादा ध्यान दिया है, शिक्षा ओर समाज सुधार पर बहुत कम। में तो उन लोगो में से हूँ जो यह समझते हैं कि किसी एक ही दिशा में प्रयत्न करने से हमारी उन्नति ओर प्रगति नहीं होगी, बल्कि विभिन्न दिशाओं में प्रयत्न करना होगा। इसलिए राजनितिक स्थिति के साथ-साथ हमें उतना ही अधिक अपनी सामाजिक ओर शिक्षा-सम्बन्धी स्थिति भी सुधारते जाना चाहिए।”

 

स्वयं अपने कुटुम्ब से आपने समाज-सुधार का आदर्श उपस्थित किया था। वह यह कि अपनी लड़कियों को पढ़ने के लिए इंग्लैंड भेजा। पर, मुसलमानों के लिए सर्वोत्तम काम तो आपने बम्बई के अन्जुमन-ए इस्लाम के द्वारा किया, जिसके आप पहले तो मंत्री ओर फिर
सभापति रहे। मुसलमानों में पश्चिमी शिक्षा फेलाने में अन्जुमन ने जो काम किया उसकी आज कल्पना भी नहीं की जा सकती, और यह सन्देह-रहित है कि उसका प्रधान और अधिकांश श्रेय बदरुद्दीन तैयबजी को ही है।

 

1895 में सरकार ने बदरुद्दीन तैयबजी को बम्बई हाईकोर्ट का जज बनाया ओर इस काम को भी आपने बड़ी आजादी और अच्छाई के साथ सम्पादन किया। लोकमान्य बालगंगाधर तिलक के पहले मुकदमे में उन्‍हें जमानत पर आपने ही छोड़ा था। भाषा के प्रवाह तथा जोर के लिए आपके फैसले मशहूर थे, जो बहुत विचार और अध्ययन के परिणाम होते थे।

 

1903 में जब आप अखिल-भारतीय मुस्लिम शिक्षा परिषद के सभापति हुए थे तो अपने भाषण में परदा-प्रथा के विरुद्ध भी आवाज़ उठाई थी। 1906 मे लन्दन में अलीगढ़ कालेज का उल्लेख करते हुए, जिसके कि आप शुभ चिन्तक ओर समर्थक थे, आपने स्त्री-शिक्षा की ओर उसका ध्यान दिलाया और स्त्रियों के बारे में उत्तरी मुसलमानों को अपने दक्षिणी भाइयों से सबक़ लेने की सलाह दी। शिक्षा-प्रेम आपका धर्म-प्रेम से भी बड़ा था। लन्दन में ईस्ट इण्डिया एसोसियेशन के सम्मुख भाषण करते हुए आपने कहा था कि “मुसलमानों में यह बड़ी बुराई हे कि जब कोई मालदार मरता हैं और उसका कोई नज़दीकी रिश्तेदार नहीं होता तो वह अपनी सम्पत्ति फकीरों को खिलाने, पुराने गढ्ढे के तालाब बनाने, मक्का की तीर्थ-यात्रा करवाने या कुरान के पन्‍ने या ऐसी ही चीजें अमुक बार पढ़वाने के लिए वसीयत कर जाता है, जिनसे देश का कोई भला नहीं होता। नई सन्तति जब बूढ़ी होगी, तो बजाय इन बातों के शिक्षा के लिए अपना धन खर्च करेगी।”

 

कांग्रेस के 1904 के बीसवें अधिवेशन में बदरुद्दीन तैयबजी ने सरकारी नौकरियों में भारतीयों की नियुक्ति सम्बन्धी प्रस्ताव की बहस मे भाग लिया। 1906 में आपको आंख की पुरानी शिकायत फिर हुई, जिसका इलाज कराने के लिए इंग्लैंड गय। वहां कुछ ही महीनों में बहुत तेजी से आपकी तन्दुरुस्ती सुधरी ओर वहां आपने सभाओं में भाग लेना शुरू कर दिया। परिणाम यह हुआ कि हृदय में भी खराबी पैदा हो गई, जिसने उग्र होकर 16 अगस्त 1906 को बदरुद्दीन तैयबजी को इस संसार से ही उठा लिया। कांग्रेस की ब्रिटिश कमिटी ने, दादाभाई नौरोजी के प्रस्ताव और गोपाल कृष्ण गोखले के समर्थन पर आपके निधन पर शोक-प्रस्ताव पास किया। 22 अगस्त को लन्दन-स्थित तुर्की राजपूत की अध्यक्षता में आपकी स्मृति में सभा हुई, जिसमें भाषण करते हुए मि० यूसुफ अली आई० सी० एस ने ठीक ही कहा था कि “कोई और मुसलमान हिन्दुओं का इतना प्रीतिभाजन नहीं हुआ जितने कि बदरुद्दीन तैयबजी हुए हैं।”

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