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सुनीति की कथा - सुनीति और सुरूचि की कहानी - भक्त ध्रुव की कथा

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राजा उत्तानपाद के दो रानियां थी। बड़ी रानी सुनीति एवं छोटी रानी सुरूचि। सुनीति पटरानी थी किंतु राजा उत्तानपाद का दूसरा विवाह सुरूचि के सौंदर्य पर मुग्ध होकर किया था। सुरूचि जितनी सुंदर थी उतनी ही चतुर और कपटी भी थी। उसने अपने रूप के मोह जाल से राजा उत्तानपाद को शीघ्र ही अपने वश में कर लिया। सुनीति राजमहिर्षी थी, यज्ञादि कार्यों एवं अन्य धार्मिक अनुष्ठानों में राजा के साथ उसकी प्रधान रानी सुनीति ही भाग लेती थी। यह बात छोटी रानी को बहुत अखरती थी। मन ही मन वह बड़ी रानी से द्वेष करती थी। उलटी सीधी मनगढ़ंत बात बनाकर राजा उत्तानपाद को उसके विरुद्ध कर दिया। राजा उत्तानपाद जिसे सुरूचि के सौंदर्य ने अंधा बना दिया था। विवेक रहित होकर राजा उत्तानपाद ने सुरूचि की हर बात को मानना प्रारंभ कर दिया। अंत में एक दिन अपने मान का ढोंग रच सुनीति को जो अत्यंत गुणवान थी राजमहलों से निर्वासित करा दिया। काम का आकर्षण गुण की अपेक्षा रूप की और अधिक होता है। राजा उत्तानपाद ने अपनी बड़ी रानी का परित्याग कर दिया। सुनीति और सुरूचि की कहानी – ध्रुव की कहानी पति परित्यक्ता रानी गोद में अपना नन्हा शिशु लिए राजधानी के स...

सावित्री सत्यवान की कथा - सावित्री यमराज की कहानी

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मद्रदेश के धर्मनिष्ठ राजा अश्वपति पर उनकी प्रजा बहुत प्रेम रखती थी। अश्वपति भी सत्यवादी और प्रजापालक राजा थे। उनके राज्य में हर प्रकार का अमन चैन था। सभी प्रकार की सुख सुविधा होने के बावजूद भी अश्वपति के कोई संतान नहीं थी। इस बात का उन्हें बडा दुख था। इस दुख की निवृत्ति और संतान प्राप्ति हेतु राजा अश्वपति ने अठारह वर्ष तक कठोर तपस्या की। इस कठोर तपस्या के परिणाम स्वरूप उनकी रानी के गर्भ से एक तेजस्वी कन्या का जन्म हुआ जिसका नाम सावित्री रखा गया। जो आगे चलकर एक पतिव्रता नारी कहलाई। अपने इस लेख में हम इसी सावित्री सती की कथा, सावित्री सत्यवान की कहानी, सावित्री यमराज की कहानी के बारें विस्तार पूर्वक जानेंगे। शकुंतला दुष्यंत की प्रेम कथा – शकुंतला दुष्यंत की अमर प्रेम कहानी राजा अश्वपति ने बडे ही लाड़ प्यार के साथ पुत्री का पालन पोषण किया। और जब यह पुत्री सयानी हुई तो उसके पिता राजा अश्वपति ने अपनी पुत्री से स्वयं ही अपने लिए योग्य वर खोजने को कहा। बड़े संकोच भाव से उसने पिता की आज्ञा को शिरोधार्य कर इस प्रयोजन हेतु कई वृद्ध मंत्रियों व राज्य कर्मचारियों के साथ यात्रा के लिए निकली। विभिन्...

तारामती की कथा - तारामती की कहानी, राजा हरिश्चंद्र की कहानी

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शिवि नरेश की कन्या का नाम तारा था। शिवि देश और वहां के राजा की पुत्री होने के कारण लोग इसे शैव्या नाम से भी पुकारते थे। शैव्या जब विवाह योग्य हुई तो उसका विवाह सत्यवादी महाराजा हरिश्चंद्र से हुआ और वह शैव्या (तारा) से महारानी तारामती बनी। उसकी कोख से रोहित नाम का राजकुमार उत्पन्न हुआ। तारा पतिव्रत धर्म का पालन करने वाली अद्भुत क्षत्रिय नारी थी। उसने अपना अस्तित्व ही पति में विलीन कर दिया था। महाराज हरिश्चन्द्र का सुख उसका सुख था और उनका दुख उसके लिए भी दुख था। ऐसी ही महान नारी रानी तारामती की कथा, तारामती की कहानी हम अपने इस लेख में जानेंगे। शकुंतला दुष्यंत की प्रेम कथा – शकुंतला दुष्यंत की अमर प्रेम कहानी समय परिवर्तनशील है, सब दिन एक समान नहीं गुजरते। राजा हरिश्चंद्र तारामती जैसी पतिव्रता पत्नी और रोहित जैसा मनोहारी राजकुमार पाकर अपने आप को सौभाग्यशाली समझते थे। उन्हें क्या पता था कि उनकी यह हंसी खुशी की दुनिया चंद दिनों तक ही रहेगी। एक दिन राजा हरिश्चंद्र ने मुनि विश्वामित्र के मांगने पर अपना सारा राजपाट उन्हें दान कर दिया, और आकर अपनी महारानी तारा से मिले। महाराजा हरिश्चंद्र को उदा...

नल और दमयंती की कहानी - नल और दमयंती का विवाह स्वयंवर व प्रेम कथा

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दमयंती विदर्भ देश की भीष्मक नाम राजा की पुत्री थी। राजा भीष्मक ने संतान प्राप्ति हेतु दमन ऋषि की सेवा की और उन्ही के आशीर्वाद से भीष्मक के चार संतानें हुई — दम, दान्त, और दमन नामक तीन पुत्र और दमयन्ती नामक कन्या। दमयन्ती अत्यंत रूपवती थी। उन्हीं दिनों निषध देश पर नल नामक राजा राज्य करता था। वीरसेन का पुत्र नल गुणवान और परम सुंदर था। विदर्भ की राजकुमारी दमयन्ती राजा नल के गुणों की प्रशंसा सुन उसके प्रति आकर्षित हो गई, और उधर राजा नल भी दमयन्ती के रूप सौंदर्य और गुणों पर मुग्ध हो मन ही मन उसे चाहने लगा था। नल और दमयंती की यही पौराणिक प्रेम कहानी जगत प्रसिद्ध है। जिसे हम और आप नल और दमयंती की कथा या नल और दमयंती की कहानी के रूप में जानते है। अपने इस लेख में हम अपने पाठकों को इसी जगत प्रसिद्ध पौराणिक प्रेम कथा के बारे में विस्तार से बताएंगे।   नल और दमयंती का विवाह व स्वयंवर नल और दमयंती की शादी कैसे हुई अब हम इसी पर चर्चा करेगें। जब दमयन्ती सयानी हुई तो राजा भीष्मक ने अपनी पुत्री को विवाह योग्य समझ राजा भीष्मक ने दमयन्ती के स्वयंवर का आयोजन किया। दमयंती के स्वयंवर का निमंत्रण पाकर दूर...

शकुंतला दुष्यंत की प्रेम कथा - शकुंतला दुष्यंत की अमर प्रेम कहानी

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शकुंतला दुष्यंत की प्रेम कहानी की शुरुआत– एक बार राजा दुष्यन्त शिकार को निकले। मृग का पिछा करते हुए वे बहुत दूर निकल गए। मृगया के उद्देश्य से वह एक आश्रम में प्रविष्ट हुए। राजा दुष्यंत का एक आश्रम वासी ब्रह्मचारी ने अभिवादन करते हुए निवेदन किया — राजन ! यह महात्मा कण्व का आश्रम है। मृगया यहां वर्जित है। इस तपोभूमि में सभी प्राणी अभय है। आइए आप ऋषि का आतिथ्य स्वीकार करें। राजा दुष्यन्त ने ब्रह्मचारी का आमन्त्रण स्वीकार कर लिया। शकुंतला दुष्यंत की कहानी महर्षि कण्व आश्रम में नहीं थे, वे सोम तीर्थ गये हुए थे। आश्रम पर उनकी पालित पुत्री शकुंतला ने अतिथि राजा दुष्यन्त का स्वागत किया और मधुर कन्द तथा फल आहार हेतु प्रस्तुत किये। मृगया की थकान से थका हारा राजा दुष्यंत, शकुन्तला के मधुर अतिथि सत्कार से संतुष्ट और प्रभावित हुआ, साथ ही शकुन्तला के सौंदर्य पर मुग्ध भी। इसलिए आतिथ्य ग्रहण के उपरांत दुष्यन्त ने शकुन्तला का परिचय पूछते हुए कहा — भद्रे ! तुम कौन हो ? तुम मुनि कन्या तो नहीं जान पड़ती।   शकुंतला के माता पिता कौन थे शकुन्तला ने अपना परिचय देते हुए कहा — मै राजर्षि विश्वामित्र की पुत्...