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बादल महल कहां स्थित है - बादल महल जयपुर

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जयपुर  नगर बसने से पहले जो शिकार की ओदी थी, वह विस्तृत और परिष्कृत होकर बादल महल बनी। यह जयपुर की सबसे पुरानी इमारतों मे से है और इसका “बादल महल’ नाम भी बडा सार्थक है। बादल महल  तालकटोरा तालाब पर खडा है, जिसके सामने जय निवास का निचला बाग है। मेह बरसता हो तो लहराते ताल और हरे-भरे विस्तृत बाग के बीच कटावदार मेहराबों और आसमानी रंग की छत ओर दीवारों वाला यह बादल महल जैसे बादलों मे उड़ान भरता प्रतीत होता है। बादल महल जयपुर जयपुर के प्रसिद्ध तीज और गणगौर के त्याहारों पर जयपुर के राजा बादल महल में दरबार लगाया करते थे, ओर इन दरबारों में आने वाले जागीरदारो उमरावों ओहदेदारों ओर शागिर्दपेशा लोगों तक को लाल या हरी, एक-सी पोशाक में आना पडता था। महाराजा प्रताप सिंह के समय में देवर्षि भट्ट जगदीश एक उत्कृष्ट कवि थे। वे कवि कलानिधि श्रीकृष्ण भट्ट के द्वितीय पुत्र थे। उन्होने तीज के जुलूस और बादल महल के दरबार के दृश्य का इस प्रकार वर्णन किया है :— उतै भूरि बादर है बादर महल इतै चचला उतै को इतै कचनिया लाखी है। जगन जमात उतै, दीपन की पात इतै गरज उतै को इतै, नौवतिया आखी है।। उतै सांझ फली इतै रग रूली...

मुबारक महल कहां स्थित है - मुबारक महल सिटी प्लेस

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राजस्थान  की राजधानी जयपुर के महलों में मुबारक महल अपने ढंग का एक ही है। चुने पत्थर से बना है, किंतु इसके बहिरंग की छटा उन काठ के मकानों जैसी है जो काठमाण्डु या गंगटोक मे देखे जाते है। यह प्रभाव पत्थर को तराश कर उसमे बारीक कराई द्वारा पैदा क्या गया है। दो मंजिले मुबारक महल का अन्तरंग जयपुर के अन्य मकानों जैसा ही है, पलस्तर से परिपूर्ण या फिनिश्ड, पर सुदृढ़ और सुरुचिपूर्ण। मुबारक महल की पूरी इमारत में किवाडों की जोडियां भी ऐसी लगी है कि अन्तरंग और बहिरंग के शिल्प से पूरा मेल खाती है। मुबारक महल सिटी प्लेस जयपुर मुबारक महल जयपुर नगर के ऐतिहासिक भवनों में सबसे नया है। महाराज माधोसिंह (1880-1922) ने यह अपने मेहमानों के उपयोग के लिये बनवाया था। बाद में इसमें जयपुर रियासत का महकमा खास भी रहा और अब इसकी ऊपरी मंजिल में जयपुर सवाई मानसिंह संग्रहालय का वस्त्र विभाग हैं और नीचे इस संग्रहालय ओर पोथीखाने के अधिकारीगण बैठते है। जिस विशाल चौक के बीचो-बीच यह महल है, उसके उत्तर-पूर्वी कोने में समधर आवाज की घडियो वाला घंटाघर है, जो एक कुएं के ऊपर बना है। यह महाराजा रामसिंह ने बनवाया था। त्रिपोलिया ग...

चंद्रमहल सिटी पैलेस जयपुर राजस्थान

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राजस्थान  की राजधानी जयपुर के ऐतिहासिक भवनों का मोर-मुकुट चंद्रमहल है और इसकी सातवी मंजिल ”मुकुट मंदिर ही कहलाती है। दिवाने खास के पश्चिम में बडे और ऊंचे दरवाजों के बजाय जयपुर के स्थापत्य की परम्परागत ताजदार “पोली” हैं जो अति सुन्दर और नयनाभिराम है। यह रिधसिधे पोल या गणेश पोल है जो चंद्रमहल को सर्वतोभद्र से जोडती है। इसमे संदेह नही किस चंद्रमहल जैसा आज है, उसमे सवाई जयसिंह से लेकर मानसिंह द्वितीय तक सभी राजाओं का कुछ न कुछ योगदान रहा है। लेकिन अठारहवी सदी के इस भव्य राजपूत इमारत के प्रधान निर्माताओ में जयसिंह, प्रतापसिंह और रामसिंह द्वितीय के नाम लिये जा सकते है। सवाई जयसिंह भव्यता के साथ सादगी का हिमायती था, पर प्रताप सिंह के समय में जयपुर की निर्माण-शैली जिस प्रोढता और परिपक्वता को जा पहुची थी उसमे जयपुर के मजबूत चूने के पलस्तर में अलंकरण का भी बडा रिवाज हो गया था। यह “ प्रीतम निवास” के विशाल आंगन मे बनी हुईं चार पोलो या “पोलियो”‘ से ही स्पष्ट है जिनके अलंकरण में मयूर बने हुए है। यह कक्ष जयसिंह के बनवाये हुए ‘ चन्द्र मंदिर के पीछे है। प्रीतम निवास, रिधमसिध पोल और भीतर का विशाल चा...

जय निवास उद्यान जयपुर - जय निवास गार्डन

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राजस्थान  की राजधानी और गुलाबी नगरी जयपुर के ऐतिहासिक इमारतों और भवनों के बाद जब नगर के विशाल उद्यान जय निवास मे आते है तो चंद्रमहल के सामने ऐसा चित्रोपम दृश्य उपस्थित होता हैं जो मुगलो के शाही किलो मे भी नही है। किन्तु यह सही है कि जयपुर बसने के समय तक मुगल स्थापत्य और शिल्प आगरा के ताजमहल और एतमादुद्दौला के मकबरे, दिल्ली के लाल किले की शाही इमारतों और दूसरे उद्यान-भवनों मे अपनी सुन्दरता और भव्यता की पराकाष्ठा को पहुंच चुके थे। इसलिये यह स्वाभाविक था कि सवाई जयसिंह भी अपने महल की रूप रेखा मे बागायत को इमारत जितना ही महत्त्व देता। जिस तालाब के किनारे शिकार की ओदी मे बैठकर सभवत पहली बार उसने इस सुन्दर नगर की कल्पना की थी, वही “ताल कटोरा” उस विशाल उद्यान का उत्तरी छोर बना जिसे ”जय निवास उद्यान का नाम दिया गया। चंद्रमहल इस बाग के दक्षिणी छोर पर बनाया गया और पूर्व तथा पश्चिम मे ऊंची और मजबूत दीवारो से घेर कर इस राजसी उद्यान भवन की हदबंदी की गई। गोविन्द देव जी का मंदिर (सूरज महल) इस बाग के बीच मे विशाल बारादरी थी और दक्षिणी छोर पर ताल कटोरे में मुंह देखता बादल महल बनाया गया था। जय निवास...

जनता बाजार जयपुर और जय सागर का इतिहास

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राजा के नाम पर बन कर भी  जयपुर जनता का शहर है। हमारे देश में तो यह पहला नगर है जो मूलत जनता के स्वस्थ आवास- प्रवास, जीविकोपार्जन एव वाणिज्य-व्यवसाय तथा सुरुचि और सौन्दर्य-बोध को सर्वोच्च प्राथमिकता देकर नियोजित और निर्मित हुआ। इतने लम्बे-चौडे परकोटे से घिरे शहर मे कोई बाजार, कोई रास्ता-गलियारा और मोहल्ला ऐसा नही जो किसी राजा या रानी की याद सजोता हो। इस जनहित-प्रेरित नगर-रचना के आदर्श ओर मूल भावना को अक्षुण्ण रखते हुए ही जयपुर की नगर परिषद ने राजामल के तालाब की जगह अपने नव-निर्मित बाजार को जनता बाजार का नाम दिया है। आज यह जनता बाजार जयपुर में खरीदारी का प्रमुख स्थल है। जनता बाजार जयपुर और जय सागर राजामल का तालाब दस एकड से अधिक उस काली-कलूटी, कूडा-कचरा भरी ऊबड-खाबड जमीन का नाम था जो एक ओर बरहमपुरी, दूसरी ओर ताल कटोरा, बादल महल एव जयनिवास उद्यान तथा तीसरी ओर चांदी की टकसाल आर रामप्रकाश नाटकघर से घिरी थी। तालाब तो कभी का सूख गया या सुखा दिया गया था, किन्तु यहां की नम ओर सीलन भरी मिट॒टी तथा मटमेले कचरे मे छोटे-छोटे सफेद शंख ओर सीपियां बराबर यह प्रतीति कराती थी कि कभी यहां तालाब लहराता ...

माधो विलास महल का इतिहास हिन्दी में

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जयपुर  में आयुर्वेद कॉलेज पहले महाराजा संस्कृत कॉलेज का ही अंग था। रियासती जमाने में ही सवाई मानसिंह मेडीकल कॉलेज की स्थापना के कुछ आगे-पीछे आयुर्र्वद कालेज को संस्कृत कॉलेज से सर्वथा स्व॒तन्त्र सस्था के रूप मे स्थापित क्या गया ओर उसके लिए मुद॒दत से खाली पडे माधो विलास महल की इमारत चुनी गई जो नगर-प्रासाद के उत्तर-पूर्व मे राजामल के तालाब की पाल पर माधोसिंह प्रथम (1750-1767 ई ) ने अपने आमोद- प्रमोद के लिए बनवायी थी। अब तो आयुर्वेद कालेज का आधुनिक भवन भी पास ही बन गया है ओर माधो विलास में इससे संबद्ध आतुरालय चलता है। माधो विलास महल जयपुर माधोसिंह अपनी युवावस्था तक अपनी ननिहाल उदयपुर में रहा था और गृह-कलह ओर युद्ध के बाद जिसका अन्त उसके बडे और सौतेले भाई इश्वरीसिंह के विषपान के साथ हुआ, वह जयपुर का राजा बना था। उदयपुर के स्थापत्य का सौन्दर्य झीलों से द्विगणित हुआ है ओर माधोसिह को यहा राजामल के तालाब ने नगर प्रासाद के पास ही निर्माण की बसी ही आकाक्षा को मूर्त रूप देने का अवसर दिया। इस तालाब के किनारे उसने गिरिधारी जी का मन्दिर भी बनवाया जिसका सोन्द्य अब ट्रकवालों की बडी-बडी टीन की टालो...

ईश्वरी सिंह की छतरी - महाराज सवाई ईश्वरी सिंह

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बादल महल के उत्तर-पश्चिम मे एक रास्ता ईश्वरी सिंह की छतरी पर जाता है।  जयपुर के राजाओ में ईश्वरी सिंह के साथ उसकी वीरता, गुण-ग्राहकता और कला-प्रेम के बावजूद जो कुछ बीती उसे विधि का विधान मानकर ही सब्र करना पडता है। अन्य राजाओं की छतरियां जहां गेटोर (ब्रहमपुरी) मे हैं, वहां ईश्वरी सिंह की छत्री सीटी पलैस के अहाते में ही  तालकटोरा के पास समाधिस्थ है। चार स्तम्भो पर बनी गुम्बजदार छतरी जिसके पलस्तर मे नीले अलकरण ”लोई” मे रगडकर चमकाये गये है, वह स्थान है जहा सवाई जय सिंह के इस लाडले बेटे को चैन और आराम नसीब हुआ। ईश्वरी सिंह की छतरी 1721 ई में दिल्ली के जय सिंहपुरा मे रानी सुख कंवर के गर्भ से जन्मे ईश्वरी सिंह को जय सिंह कितना प्यार करता था, यह इसी से सिद्ध है कि दो साल के चीमाजी” (ईश्वरी सिंह का बचपन का प्यार का नाम) को “चबेणी” के लिये लगभग पांच हजार रुपये की वार्षिक आय की जागीर निकाल दी गई थी। इस बालक को राजधानी से दूर बसवा मे रखा गया और जब वह चार साल का था तो पिता ने जय सिंहपुरा (दिल्ली) से ही उसके लिए जेवर, हथियार और लवाजमा भेजा। अपने मरने के दस बरस पहिले 1733 ई मे जय सिंह ने ...

रामप्रकाश थिएटर जयपुर - रामप्रकाश नाटकघर का इतिहास

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राजस्थान  की राजधानी जयपुर में जयसागर के आगे अर्थात जनता बाजार के पूर्व में सिरह ड्योढ़ी बाजार मे खुलने वाला रामप्रकाश थिएटर कभी इस गुलाबी शहर जयपुर की एक अलग ही शान था। साहित्याचार्य भट्ट मथुरानाथ शास्त्री ने इस नगर के इस भारत-विख्यात रंगमच के प्रसंग मे खेद जनित आश्चर्य के साथ व्यक्त किया है कि नवीनयुग रुच्या नरनाट्यस्थले चित्रताट्यमीक्षचलज्जल्पच्चित्र बन्धुरे” (इस थिएटर मे मानव नाट्य-कला के स्थान पर अब चित्रों की नाट्यकला देखता है)। वस्तुत जिन लोगो को रामप्रकाश थिएटर मे नाटक देखने का अवसर मिला है ओर जिन्होने इस रंगमच के ऐतिहासिक महत्त्व को आका है, वे सभी इस बात पर खेद प्रकट करते हैं। रामप्रकाश थिएटर जयपुर रामप्रकाश के नाटकघर से थिएटर बन जाने के कारण इस नगर की कोई ऐसी चीज खत्म हो गई है जो रखने ओर रहने लायक थी। इस नाटकघर को सिनेमा में परिणत करने का ‘अपराध’ जयपुर के प्रसिद्ध प्रधानमन्त्री सर मिर्जा इस्माइल ने किया था जिन्हे अन्यथा जयपुर को सुधारने-सवारने का बडा श्रेय है। जब ऐसा किया गया था तब भी पुराने ओर जानकार लोगों को यह परिवर्तन बहत अखरा था ओर उनके इस तर्क में सचमुच सच्चाई थी कि...

ईसरलाट जयपुर - मीनार ईसरलाट का इतिहास

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राजस्थान  के जयपुर में एक ऐतिहासिक इमारत है ईसरलाट यह आतिश के अहाते मे ही वह लाट या मीनार है जो आज तक गुलाबी नगर की आकाश रेखा बनी हुई है। जयपुर वाले इसे सरगा सूली कहते है, किन्तु इसका अधिकृत ओर उपयुक्त नाम ‘ईसरलाट” है। ईसरलाट का इतिहास हिन्दी में 1743 ई में सवाई जयसिंह की मृत्यु होने के बाद उसका ज्येष्ठ पुत्र इश्वरी सिंह उसका उत्तराधिकारी हुआ, किन्तु उसके नसीब में न राज लिखा था ओर न चैन। उसका सौतेला भाई माधोसिंह अपने मामा उदयपुर के महाराणा की शह से स्वयं जयपुर का राज्य हथियाने के सपने सजो रहा था। जब माधोसिंह ने महाराणा, कोट के दुर्जनसाल ओर बूंदी के उम्मेद सिंह के सहयोग से जयपुर पर धावा बोला तो ईश्वरी सिंह ने अपने प्रधानमन्त्री राजामल खत्री और धुला के राव के नेतृत्व मे एक सेना भेजी। दोनो ही सेना नायक बडी वीरता से लड़े ओर उन्होंने आक्रमणकारी को रणक्षेत्र छोडकर भागने पर विवश कर दिया। 1744 ई मे यह हमला तो विफल रहा, लेकिन 1748 ई में माधोसिंह ने महाराणा, मल्हार राव होल्कर, जोधपुर, कोटा, बूंदी और शाहपुरा के राजाओं की सहायता से फिर कूच किया। जयपुर से बीस मील दर बगरू के पास दोनो सेनाओ की मु...

ब्रज निधि जी मंदिर जयपुर परिचय और इतिहास

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राजस्थान  में जयपुर वाले जिसे ब्रजनंदन जी का मन्दिर कहते है वह ब्रज निधि का मंदिर है। ब्रजनिधि का मंदिर जयपुर नगर-प्रासाद के चांदनी चौक में स्थित है। यह ‘ब्रज निधि’ उपनाम से काव्य रचना करने वाले महाराजा प्रतापसिंह की भक्ति-भावना का प्रतीक तो है ही, देवालय निर्माण की उस शैली का विशिष्ट प्रतिनिधि भी है जो जयपुर बसने के साथ ही आरम्भ हई थी, और प्रतापसिंह के समय में अपने चरम विकास को पहंची थी। ब्रज निधि जी मंदिर का इतिहास और परिचय इस शैली की विशेषता दुर्ग के समान ऊंचे और भव्य प्रवेश द्वार, ऊची उठान का आंतरिक द्वार या पोल, खुले विशाल चौक और जगमोहन या मण्डप की ऐसी संयोजना है जहां पहुंचकर प्रतीति होती है जैसे किसी हवेली के ”रावले ” या अन्तपुर में आ गये। आज कल यह देखकर बडा क्लेश होता हैं कि जयपुर के इतिहास, संस्कृति और कला की दृष्टि से ऐसे महत्त्वपूर्ण देवालय भी घोर उपेक्षा के शिकार हैं और संस्कारहीन शासकों तथा लालची प्रबन्धकों ने मन्दिरों को वृस्तुत अपने-अपने मजीदानों और यार-दोस्तों के रहने के मकानों मे परिणत कर दिया हैं। ठाकुरजी तो बेचारें बस उस निज मन्दिर या गर्भगृह के मालिक हैं जहां वे ...

राजराजेश्वरी मंदिर कहां स्थित है - राजराजेश्वरी मंदिर जयपुर

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राजस्थान  की राजधानी और गुलाबी नगरी जयपुर के चांदनी चौक के उत्तरी-पश्चिमी कोने मे रसोवडा की ड्योढी से ही महाराजा रामसिंह द्वितीय द्वारा निर्मित राजराजेश्वरी माता मंदिर मे जाने का खुर्रा है। श्री राजराजेश्वरी मंदिर जयपुर का प्रसिद्ध और प्रमुख मंदिर है। महाराज रामसिंह शिव-भक्‍त थे और वे नित्य शंकर जी का पूजन और दर्शन करते थे। राजराजेश्वरी मंदिर जयपुर महाराजा के लिये प्रतिदिन चौडा रास्ता स्थित विश्वेश्वर शिव मंदिर मे जाना शक्य नही था। अत उन्होंने जनानी और मर्दानी ड्योढियों के बीच अपने कमरे के पास ही सवत्‌ 1921 में माता राजराजेश्वरी मंदिर बनवाया था। मंदिर क्या है, एक छोटा सा मकान है जिसमे शमशान-वासी शिव राजमहलो के बीच ही अचल हो गये हैं। किन्तु, राजराजेश्वर का सेवा-श्रृंगार तथा नाम तथा गुण है, एकदम राजसी। महाराजा रामसिंह के समय के कुछ दीर्घाकार सुनहरी कलम के चित्र भी राजराजेश्वरी मंदिर की शोभा बढाते हैं। राजराजेश्वरी मंदिर जयपुर अधिक पैसा कमाना चाहते हैं तो यहां क्लिक करें वैसे राजराजेश्वरी मंदिर जनता के लिये आज भी खुला नही है, केवल शिवरात्रि और अन्नकूट को ही इसका द्वार जनता के लिये खोल...

गोविंद देव जी मंदिर जयपुर - गोविंद देव जी मंदिर का इतिहास

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राजस्थान  की राजधानी और गुलाबी नगरी जयपुर के सैंकडो मंदिरो मे गोविंद देव जी मंदिर का नाम दूर-दूर तक श्रृद्धालुओं में प्रसिद्ध है। जो भी हिन्दू यात्री या पर्यटक इस शहर में आता है, वह यहां के अन्य दर्शनीय स्थानों के साथ गोविंद देव जी की झांकी करने के लिए भी अवश्य जाता है। जयपुर के राजा भी अपने जमाने मे गोविंद देव जी को राजा और अपने को उनका दीवान मानते थे। गोविंद आज भी राजा हैं। उनके दरबार में हजारों भक्त हाजिर होते है और राधा-कृष्ण की लीलाओं के भजन-कीर्तन से सारे जय निवास उद्यान को निनादित करते रहते है। वृन्दावन की सी धूम अनेक अवसरों पर तो उससे भी अधिक गोविंद देव जी के मंदिर मे मची रहती है। इत्र और फलों की महक यहां की हवा मे तैरती है। बंगाल के चैतन्य महाप्रभु ने चार सदियों पहिले भक्ति भाव और कीर्तन का जो रास्ता सांसारिक लोगो को बताया था, उसका जादू अब भी बरकरार है। गोविंद देव जी के मंदिर मे यह प्रत्यक्ष देखा जा सकता है। गोविंद देव जी मंदिर का इतिहास यह विख्यात गोविंद देव जी मंदिर उस बारहदरी में है जो ”सूरज महल” के नाम से जय निवास बाग मे चंद्रमहल और बादल महल के मध्य में बनी थी। किंवदन्...