कबीर पंथ के मूलमंत्र, शिक्षा, नियम, व परिचय
मध्यकाल में गुजरात एवं राजस्थान के भक्त-जन-समुदाय को संत कबीर दास की विचारधारा ने सर्वाधिक प्रभावित किया है। यहां प्रवर्तित सन्त सम्प्रदायों में से अधिकांश सम्प्रदाय कबीर की शिष्य परम्परा के ही संतों के द्वारा संस्थापित हैं। वस्तुतः संतमत के नाम से हम जिस चिन्तन प्रणाली एवं साधना धारा से परिचित हैं वह कबीरदास के द्वारा ही प्रवाहित हुई है। इसके अतिरिक्त कबीर के नाम से ही कबीर पंथ की स्थापना इन दोनों प्रदेशों में व्यापक रूप से हुई है। प्रमाण स्वरूप गुजरात एवं राजस्थान के लगभग प्रत्येक प्रमुख नगरों में कबीर मन्दिर आज भी विद्यमान हैं।
कबीर पंथ के मूल मंत्र परिचय नियम व शिक्षा
कबीर पंथ के अनुयायियों में ब्राह्मण तथा वणिक जाति को छोड़कर अन्य जाति के ग्रहस्थ होते हैं। विशेष उल्लेखनीय तथ्य यह है कि इन दोनों प्रेदेशों में कबीर मन्दिरों की स्थापना तथा कबीर पंथ का इस रूप में प्रचार 17वीं तथा 18वीं शताब्दी में होने लगा था। 17वीं शताब्दी तक यहां कबीर पंथ का प्रसार संतमत के प्रभाव के रूप में ही रहा है। गुजरात में कबीर पंथ के शिष्यों में लुहाणा, सुनार, सुथार, कुम्हार, नाई, धोबी, राज, काछिया, कणवी, कोली आदि जाति के लोग हैं। श्री किशनसिंह चावडा के मतानुसार कबीर का सं० 1564 में गुजरात में आगमन हुआ था। परन्तु इस बात का कोई प्रमाण प्राप्त नहीं होता है। गुजरात में कबीर पंथ आगे चलकर दो शाखाओं के रूप में प्रचलित हुआ। वे शाखायें राम कबीरिया तथा सन्त कबीरिया नाम से प्रसिद्ध हैं। परन्तु इनका प्रसार हमारे आलोच्यकाल के पश्चात हुआ है, उसकी विस्तार पूर्वक चर्चा यहां आवश्यक होगी।

कबीर पंथ अथवा कबीर मन्दिरों की स्थापना गुजरात में कबीर के पश्चात हुई है परन्तु कबीर वाणी का प्रभाव यहां बहुत पहले आ चुका था। नरसी मेहता तथा अन्य भक्त कवियों के ज्ञान वैराग्य के पदों पर कबीर का ही प्रभाव है ऐसा मत श्री आनन्द शंकर ध्रुव ने व्यक्त किया था। उधर राजस्थान में तो दादूदयाल आदि प्रसिद्ध संत कबीर की शिष्य परम्परा के ही थे।
कबीर मत का प्रसार सर्वत्र इतने व्यापक रूप में हुआ उसका कारण उनका विशाल दृष्टिकोण तथा साधना का सहज रूप था। कबीर ने अपने समय में प्रचलित विभिन्न उपासना-पंथों के सार तत्व को ग्रहण कर एक समन्वयात्मक सरल मार्ग प्रशस्त किया था। कबीर ने वेदांत के अद्वेतवाद, नाथ-पंंथियों की योग साधना, वैष्णवों की भक्ति तथा सूफियों के प्रेम तत्व को लेकर एक नवीन, सहज रूप का निर्माण किया। विभिन्न पंथों में फैले हुए आडंबर तथा निर्थक आचार विचारों का तीव्र विरोध किया। जातिगत तथा धर्म गत भेदभावों की निस्सारता का भंडाफोड़ किया। मनुष्य मात्र को परमात्मा की शरण में समान अधिकार की घोषणा की। हिन्दू और मुसलमानों के धर्म गुरु पंडित और मुल्लाओं की घमण्ड पूर्ण स्वार्थपरक नीति पर कठोर प्रहार किये। हिन्दू समाज के निम्न जाति के भक्तों को भी उपासना में उच्चकोटि का स्थान दिया।
संत कबीर के जीवन काल का समय लगभग 15वीं शताब्दी था। स्वामी रामानन्द का शिष्यत्व प्राप्त करने का सौभाग्य उन्हें मिला। वेदशास्त्रों की विधिवत शिक्षा-दिक्षा का तो उन्हें अवसर ही नहीं मिला, किन्तु उनका अनुभव का ज्ञान अत्यन्त विशाल था। कबीर का व्यक्तित्व अत्यन्त प्रभाव शाली था। उनमें सरलता, स्पष्टवादिता एवं निर्भीकता थी सत्यान्वेषण के सम्बन्ध मे होने वाली अनुभूतियों को वे स्पष्ट शब्दों में व्यक्त कर देते थे।
कबीर निर्गुण ब्रह्म के उपासक थे। नाम स्मरण के लिये उन्होंने राम को स्वीकार किया है। परन्तु कबीर का राम निराकार ब्रह्म का स्वरूप है। उन्होंने भक्ति और ज्ञान दोनो को समान स्थान दिया है। ज्ञान के द्वारा मनुष्य अपने भ्रम का निवारण कर सकता है, अंध विश्वासों का खंडन तथा सत्य की दृष्टि प्रदान करता है। माया का आवरण जो मनुष्य को परमात्मा के साथ तादात्म्य स्थापित करने में बाधा पहुँचाता है, ज्ञान के सहारे ही नष्ठ किया जा सकता है। कबीर की इन पंक्तियों में यह बात स्पष्ट हो गई है:—
संतो भाई ! आई ज्ञान की आंधी रे।
भ्रम की टाटी सर्व उड़ाणी माया रहे न बांधो रे॥
कबीर ने अपनी वाणी में तर्क-वितर्क के हारा बाहयाचारों की निरर्थकता प्रमाणित की है। कर्मकांड, मूर्तिपुजा, माला, तिलक कठी, व्रत, तीर्थ इत्यादि केवल आडंवर है। इनके द्वारा सच्ची भक्तित असभावित है। स्वानुभव एवं सहज भाव ही भक्ति का सच्चा मार्ग है। इन बातों का प्रतिपादन कबीर ने ज्ञान की सहायता से ही किया है, किन्तु कबीर के तर्कों का सहारा लेकर भी इन आध्यात्मिक विषय के सम्बन्ध में कोई उलझन पैदा नही होती है। ब्रह्म, जीव, जगत, माया, आचार, धर्म इत्यादि तत्वों को समझाने के लिये उन्होंने सरल, सुबोध तर्क दिये है। उनकी शैली बड़ी मार्मिक किन्तु व्यंग्यात्मक होती है। आध्यात्मिकता की बड़ी गंभीर, गूढ बातोंको एक सामान्य सांसारिक मनुष्य भी सरलता से समझ सके इसका ध्यान कबीर के सम्पुर्ण रूप से रखा है।
कबीर के राम निर्गुण ब्रह्म है। किन्तु उन्होंने अपने ईष्ट को-उस परम सत्य को-सगुण, निर्गुण से परे शब्दातीत कहा है। वह अगम्य, अगोचर है। फिर भी प्रेम की दृष्टि से वह प्रत्येक के अन्तर में देखा जा सकता है। वह वर्णनातीत है। उसका भक्ति और प्रेमपूर्ण हृदय में अनुभव किया जा सकता है,किन्तु वर्णन नहीं। वह स्वत व्याप्त है। सगुण और निर्गुण के भ्रम में पड़कर हम सच्चे मार्ग को भूल बैठते हैं। कबीर ने इस तथ्य को समझाते हुए लिखा है :—
संतो धोका कासू कहिये।
गुण में निरगुण निरगुण में गुण है बाट छाँड़ि क्यू बहिये॥
इस प्रकार कबीर ने ज्ञान के साथ प्रेम की आवश्यकता का अनुभव किया है। कबीर ने अपने युग में सगुण, निर्गुण ज्ञान, भक्ति, आचार, धर्म, इत्यादि के सम्बन्ध में फैली हुई परस्पर विरोधी भावनाओं एवं विश्वासों के बीच में से एक स्पष्ट सहज सर्वमत मार्ग ढूंढ़ निकाला, और सत्य की प्राप्ति के लिए ज्ञान एवं प्रेम को जीवन में एक साथ लेकर चलने का आह्वान किया
राजस्थान में दादूदयाल, सुन्दरदास, लालदास, मीरां तथा गुजरात में अखा एवं नरसी मेहता ने भी कबीर की ज्ञान एवं प्रेममयी वाणी का तथा उनके संतमत के विचारों का प्रभाव ग्रहण किया था, जिसका प्रमाण हमें इन संत-भक्त कवियों की रचनाओं में स्पष्ट दृष्टिगोचर होता है।
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