खजुराहो का मंदिर (कामुक कलाकृति) kamuk klakirti khujraho
अनेक भसाव-भंगिमाओं का चित्रण करने वाली मूर्तियों से सम्पन्न खजुराहो के जड़ पाषाणों पर चेतनता भी वारी जा सकती है। पाषाण-निर्मित निर्जीव और स्थिर प्रतिमाएँ जिव्हाहीन होकर भी जैसे मन का भाव स्पष्ट कर देती है। ये कठोर पाषाण की मूर्तियाँ इतने कोमल भाव व्यक्त करती है कि मन आश्चर्यं चकित हो जाता है। विविध उपास्य देवी-देवताओं को सुंदरतम एवं भव्य मूर्तियों के साथ ही खजुराहो में अनेक काम-क्रिड़ा और रति-केलि’ का चित्रण करने वाली मूर्तियाँ भी है, जो प्रणयी जीवन की प्रणय-गाथाओं को निः:शव्द मूक स्वर में मुखरित करती है। पाषाणों के माध्यम से कलाकारों ने जैसे समस्त नायिकाभेद का रहस्योद्घाटन कर इन मूर्तियों में मुग्धा, गुप्ता, प्रोषित पतिका, रूपगर्विता, परकीया इत्यादि नायिकाओं का चित्रण किया है। खजुराहो के
मंदिरों की मदमाती एवं काम क्रिड़ाओं की अनेक परिभाषाओं को विशद करने वाली मूर्तियों में उद्वेगी एवं कलुषित मन भले ही अश्लीलता देखे किंतु जिन कलाकारों ने इनका निर्माण किया था उनकी भावना निश्चित ही ऐसी नहीं थी, क्योंकि ऐसी मूर्तियाँ उपास्य नहीं उपासक है। उपास्य तो हे देवी-देवता, जो आलों में प्रतिष्ठित हैं। जीवन के परम सौंदर्यतत्व काम एवं संभोग-तत्व के अनेक व्यापारों का विशद वर्णन वास्तव में उस दार्शनिक पृष्ठभूमि को स्पष्ट करता है, जो ‘सत्यम शिवम सुन्दरम” की परिभाषा देता हुआ सौंदर्य में और सत्य में शिवम की प्रतिष्ठा करता है। खजुराहो में अंकित मूर्तियों में ऐसी ही सौंदर्य-भावना को प्राधान्य दिया गया है जो मंगल एवं कल्याण के साथ समन्वित हैं। इन मंदिरों और मूर्तिकला के निर्माण में जिस दार्शनिक प्रेरणा से कार्य किया है, वही विकसित होकर शैव प्रत्यभिज्ञ में परिवर्तित हुआ, और कालान्तर में वही साहित्य शास्त्र में रसवाद की भूमिका बना।
खजुराहो के मंदिरों में कन्दरिया विश्वनाथ, दूलह देव, लालगुवां महादेव, मातंगेश्वर, अवारी, लक्ष्मणेश्वर आदि प्रमुख मंदिर है। आदिनाथ, पार्श्वनाथ आदि जैन मंदिर हैं। इन मंदिरों में नृत्य-गीत, दर्पण में मुख देखती हुई अप्सरा, वंशीवादन का त्रिभंगी रूप, कामक्रीड़ा इत्यादि का चित्रण करने वाली अनेक प्रतिमाए है जिनका एकमात्र उद्देश्य जीवन को आनन्द तक पहुँचाने एवं उसके सौंदर्य-तत्व में शिवत्व का प्रतिस्थापन करने का है।खजुराहों छतरपुर से 27 मील पूर्व तथा पन्ना से 25 मील उत्तर कोने पर बमीठा- राजनगर सड़क पर स्थित है। बमीठा-राजनगर सड़क सतना-तौगांव की शाखा है। खजुराहो के मंदिर और प्राचीन अवशेष 8 वर्गमील के घेरे में है। ये मंदिर पूर्व-मध्य-कालीन भारतीय कला के उत्कृष्ट नमूने है। अनुमान है कि ये मंदिर खजुराहो के प्राचीन शक्तिपीठ के महान विचारकों की प्रेरणा एवं चन्देल राजाओं के प्रोत्साहन से 8 वीं से 15 वीं शताब्दी के समय में बने हैं। इन मंदिरों का स्थापत्य आर्यशैली का है।
खजुराहो के दर्शनीय स्थल
भारत के मध्यप्रदेश के झांसी से 175 किलोमीटर दूर छतरपुर जिले में स्थित शहर खजुराहो अपने प्राचीन एवं मध्यकालीन मंदिरों के लिए विश्व भर में प्रसिद्ध है । इस प्रमुख शहर को प्राचीन काल में खजूरपुरा ओर खजूर वाहिका के नाम से पुकारा जाता था ।यहाँ बड़ी संख्या में हिन्दू धर्म तथा जैन धर्म के मंदिर है । मंदिरों का शहर खजुराहो पूरे विश्व में इन एतिहासिक इमारतों की दीवारों पर तराशी गई कामुक कलाकृति के लिए प्रसिद्ध है ।हिन्दू कला ओर संस्कृति को शिल्पियों ने इस शहर के पत्थरों पर मध्यकाल में उत्कीर्ण किया था । खजुराहो का इतिहास लगभग एक हजार साल पुराना है यह शहर चन्देल सम्राज्य की प्रथम राजधानी था चंदेल वंश ओर खजुराहो के संस्थापक चन्द्रबर्मन थे।देश विदेश से लाखों पर्यटक इस सौंदर्य की प्रतीक कलाकृति को देखने निरंतर आते रहते है। इन मंदिरों को तीन समूहों में बांटा गया है :- पश्चिमी समूह, पूर्वी समूह, दक्षिणी समूह
पश्चिमी समूह खजुराहो
ब्रिटिश इंजीनियर टी एस वर्ट ने खजुराहो के मंदिरों की खोज की थी तब से मंदिरों के एक विशाल समूह को पश्चिमी समूह के नाम से जाना जाता है । यह खजुराहो के सबसे आकषर्ण स्थानों में से एक है । इस स्थान को यूनेसको ने 1986 में विश्व विरासत की सूची में शामिल किया है । शिव सागर के नजदीक स्थित इस पश्चिमी समूह के मंदिरों के साथ यात्रा की शुरुआत करनी चाहिए इस समूह में कई आकषर्ण मंदिर है इन मंदिरों की बहुत ज्यादा सजावट की गई है ।
लक्ष्मण मंदिर
वराह मंदिर
कंदारिया महादेव मंदिर
चौसठ योगिनी
यह मंदिर 64 देवियों को समर्पित है । इस मंदिर का निर्माण लगभग 9 वी शताब्दी में हुआ था यह खजुराहो के प्रसिद्ध पर्यटन आकर्षणो में से एक है ।
विश्वनाथ मंदिर
नंदी मंदिर
देवी जगदंबा मंदिर
सूर्य (चित्रगुप्त मंदिर)
पूर्वी समूह खजुराहो
जावरी मंदिर
वामन मंदिर खजुराहो
आदिनाथ जैन मंदिर खजुराहो
शांतिनाथ मंदिर
दक्षिणी समूह खजुराहो
चतुर्भुज मंदिर
दुलह देव मंदिर
दुला देव मंदिर भगवान शिव को समर्पित है । इस मंदिर में एक महामंडप बनाया गया है । जिसका आकार अष्टभुज जैसा है । इस अष्टभुज आकार वाले मंडप में 20 अप्सराएं दर्शाई गई है जोकि मुकुट व भारी आभुषण पहने हुए है
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