सुरेंद्रनाथ बनर्जी का जीवन परिचय हिन्दी में

सुरेंद्रनाथ बनर्जी का नाम किसने नहीं सुना, हिमालय से कन्याकुमारी तक और सिन्ध से आसाम तक, किसी समय बंगाल के इस शेर की आवाज गूंजती रही है। यही नहीं बल्कि भारत में कांग्रेस के मंच से उठी आपकी बुलन्द आवाज सभ्य संसार के दूर-दूर के कोने तक पहुंचती थी। भाषा-प्रभुत्व, रचना-नेपुण्य, कल्पना-प्रवणता, उच्च भावुकता, वीरोचित हुंकार, डा० पट्टाभि सीतारामैया के शब्दों में, “इन गुणों में आपकी वक्त॒त्व-कला को पराजित करना कठिन है, आज भी कोई आपकी समता तो क्या, आपके निकट भी नहीं पहुँच सकता।

 

सुरेंद्रनाथ बनर्जी का जीवन परिचय हिन्दी में

शिक्षा

कलकत्ता के एक कुलीन ब्राह्मण परिवार में सन् 1848 में सुरेंद्रनाथ बनर्जी का जन्म हुआ था। सुरेंद्रनाथ बनर्जी के पिता बंगाल के उस समय के एक मशहूर एलोपैथ डाक्टर दुर्गाचरण बनर्जी थे, जिनके पांच पुत्रों में आप दूसरे पुत्र थे। शिक्षा-प्राप्ति के लिए पहले पाठशाला भेजा गया, फिर 7 वर्ष के होने पर डोवेटन-कालेज में भर्ती हुए, जो मुख्यतः एंग्लो-इण्डियनों की शिक्षा-संस्था है। 1863 में द्वितीय भाषा के रूप में लेटिन लेकर प्रथम श्रेणी में प्रवेशिका परीक्षा पास की और जूनियर छात्रवृत्ति प्राप्त की। इसी प्रकार एफ० ए० प्रथम श्रेणी में पास करने पर सीनियर छात्रवृत्ति प्रात्त की। 1868 में ग्रेजुएट होकर प्रिंसिपल की सिफ़ारिश पर इण्डियन-सिविल-सर्विस की परीक्षा के लिए इंग्लैग्ड गये। कहते हैं सुरेंद्रनाथ बनर्जी की माता इसके लिए तैयार नहीं थीं, परन्तु जब रमेशचन्द्र दत्त और बिहारी लाल गुप्त जाने लगे तो मौका पाकर आप भी चुपचाप चल दिये। 1871 में अपने पिता की मृत्यु के कुछ ही सप्ताह बाद, सिलहट के असिस्टेंट मजिस्ट्रेट बनकर आप हिन्दुस्तान लौटे। लेकिन विधाता को तो आपसे कुछ और ही काम लेना था।

 

अंग्रेज सरकार द्वारा शोषण

यह वह ज़माना था जब कि हिन्दुस्तानियों को ज़िम्मेदारी के पदों से यथा सम्भव दूर रखा जाता था और कोई हिन्दुस्तानी थोड़े बहुत ऊंचे पद पर पहुंच भी जाता तो उस पर बहुत सख्त निगाह रखी जाती थी। आपको इण्डियन सिविल सर्विस में प्रवेश किये कोई दो साल हुए होंगे कि आपके आफ़िशियल कण्डक्ट के बारे में आप पर कुछ इलज़ाम लगा दिये गये। आपने उनकी खुली जाँच की जाने पर ज़ोर दिया, पर जो कमीशन मुकर्रिर हुआ था उसने कलकत्ता से बाहर गुप्त रूप से अपना काम किया। उसका निर्णय कदाचित पहले से जानी बूझी बात थी। उसने आपको दोषी क़रार दिया और सरकार ने 50 रूपए माहवार की बरायनाम पेंशन देकर आपको सिविल-सर्विस से अलग कर दिया। अपना मामला लेकर आप इंग्लैंड गये और निजी तौर पर भारत-मंत्री से मिले, लेकिन निराश होकर लौटे। बुराई से भी भलाई पैदा हुई। सिविल-सर्विस से निकलना देश की ओर आना हुआ। आपको मिली हुई यह कठोर सजा निश्चय ही देश के लिए बड़ा भारी आशीर्वाद सिद्ध हुई।

 

सुरेंद्रनाथ बनर्जी का शिक्षा और पत्रकारिता में योगदान

 

सिविल सर्विस से अलग हो सबसे पहले आप शिक्षा के क्षेत्र में उतरे। 1876 में आप मेट्रोपालिटन इंस्टीट्यूशन में अंग्रेज़ी-साहित्य के प्रोफ़ेसर हो गये। 1881 में फ्री चर्च कालेज से भी आपका सम्बन्ध हो गया। 1882 में आपने अपना खुद का स्कूल खोला, जिसमें शुरुआत में सौ विद्यार्थी थे, पर 7 वर्षो के ही अन्दर वह इतना बढ़ा कि रिपन-कालेज के रूप में परिणत हो गया, जो न केवल बंगाल बल्कि सारे हिन्दुस्तान की सर्वोत्तम शिक्षा-संस्थाओं में गिना जाता है।

 

इसके बाद सुरेंद्रनाथ बनर्जी ने जनर्लिजम में प्रवेश किया। लार्ड लिटन की वाइस-रायलटी के तूफ़ानी दिनों में श्री उमेशचंद्र बनर्जी ने जिस “बंगाली पत्र को जन्म दिया था, उसे आपने अपनाया। दिलोजान से आप उसमें लग गये और उसे बहुत ऊंचे दर्जे का पत्र बना दिया। साप्ताहिक से वह दैनिक हो गया। उस समय वही ऐसा भारतीय पत्र था, जो रूटर के ( विदेशी ) तार मोल लेता था। निर्भीक पत्रकार को समय-समय पर कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। आप भी इसके अपवाद नहीं रहे। इलर्बट बिल के वक्त बंगाली ने नौकरशाही ओर एंग्लो-इण्डियनों की निर्भीक आलोचना की, उसका फल आपको शीघ्र ही मिल गया। 1883 में एक मुक़दमे में कलकत्ता-हाईकोर्ट के एक जज ने शालिग्राम की मूर्ति को शहादत के लिए अदालत में पेश करने का हुक्म दिया। आपने ‘बंगाली’ में उसकी तीव आलोचना की, जिस- के लिए अदालत की मानहानि का मुकदमा आप पर चला दिया गया और माफ़ी माँग लेने पर भी जजों ने, सर आर० सी० मित्र के असहमत होने पर भी, बहुमत से आपको दो मास की सज़ा दे दी सार्वजनिक जीवन में आप पहले ही प्रवेश कर चुके थे, इसलिए इस सज़ा से सर्वसाधारण का प्रेम ओर सहानुभूति आपके प्रति पैदा हुई। जेल से छूटकर आपने उत्तर-भारत का दौरा किया, जिसे सर हेनरी काटन ने अपनी पुस्तक “न्यू इंडिया’ में विजय-यात्रा कहा है। आप जहाँ-जहाँ गये, वहाँ वहाँ आपका बड़े उत्साह से स्वागत हुआ। सच तो यह है कि देश के राजनैतिक विकास में बंगाली के द्वारा आपने बहुमूल्य सेवा की है। राजनैतिक उतार-चढ़ाव के सब समय बंगाली लोकमत को बनाने, शिक्षित करने और उसको संगठित करने में किसी से पीछे नहीं रहा। सम्पादन में भी आपने इतनी ख्याति पैदा की कि 1910 में होने वाली इम्पीरियल प्रेस काफ्रेन्स में भारत के प्रतिनिधि की हैसियत से आपको निमंत्रित किया गया, जिसमें सुरेंद्रनाथ बनर्जी ने बहुत प्रभावशाली भाषण दिया। आपके भाषण के बाद लार्ड क्रोमर ने भारत के देशी अखबारों पर तानाकशी की। आपने उसी समय उसका मुहंतोड़ जवाब दिया प्रसिद्ध सम्पादकाचार्य डब्लू० टी० स्टेड के शब्दों में आप ‘सरेण्डर-नॉट थे। एक उपनिवेश के प्रतिनिधि पर इसका इतना प्रभाव पड़ा कि उसने कहा– “यदि भारत में सुरेन्द्रनाथ जैसे और भी आदमी हैं तब उसे तुरन्त स्वशासन दे देना चाहिए।”

 

26 जुलाई 1876 को आप और आनंद मोहन वसु आदि के संयुक्त प्रयत्न से कलकत्ता के इण्डियन एसोसियेशन का जन्म हुआ। जिस दिन उस एसोसियेशन का उद्घाटन होना था उसी दिन सुरेंद्रनाथ बनर्जी के पुत्र का एकाएक देहान्त हो गया। पर, आपका कर्तव्य-भाव इतना दृढ़ था कि फिर भी शाम को एसोसिएशन की स्थापना के समय उपस्थित रहे, क्‍योंकि वह देश के लिए आपकी दृष्टि में बहुत महत्वपूर्ण था। ऐसी ही एक घटना आपके जीवन में और मिलती है। वह सुरेंद्रनाथ बनर्जी की प्रिय पत्नी के देहावसान की है। उस दिन की आपके मन की व्यथा की कल्पना कौन कर सकता है ? पर अपने सम्पादकीय कर्तव्य की आपने उस दिन भी उपेक्षा नहीं की। नित्य की तरह उस दिन भी आपने अपना सम्पादकीय कार्य पूरा किया और अग्रलेख भी लिखवाया। सचमुच ये असाधारण घटनायें हैं जो आज भी आपको हमारी नज़रों में बहुत ऊँचा चढ़ाने वाली हैं। बहुत दिनों तक आप एसोसियेशन के मंत्री रहे और 30-40 वर्षों तक एसोसियेशन की कोई राजनैतिक हलचल ऐसी नहीं हुई, जिसमे आपका प्रमुख भाग न रहा हो। एसोसिऐशन की ओर से आपने दौरा भी किया ओर एक मसीह की तरह वैध आन्दोलन का सन्देश सारे देश को सुनाया।

 

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष बने

कांग्रेस के आन्दोलन में आपका व्यक्तित्व प्रकाश-स्तम्भ की तरह रहा और बंगाल के शेर तथा देश के बेताज बादशाह के नाम से आपने ख्याति प्राप्त की। कांग्रेस के बम्बई के प्रारम्भिक अधिवेशन में तो आप सम्मिलित न हो सके, परन्तु उसके बाद तब तक सम्भवतः सभी अधिवेशनों में उपस्थित होते रहे हैं जब तक कि निश्चित रूप से आप उससे अलग नहीं हो गये। प्रत्येक अधिवेशन में आप कई प्रस्ताव पेश करते थे, ओर बहुत से लोग तो आपका भाषण सुनने के लिए ही अधिवेशन में आते थे। बम्बई 1889 के पांचवें अधिवेशन में चंदे के लिए आपकी अपील पर 60000 तुरन्त जमा हो गया। इसी अधिवेशन के प्रस्तावानुसार धारा सभाओं के सुधार के लिए आंदोलन करने को एक शिष्ट-मंडल इंग्लैंड गया, आप भी उसमें थे। इंग्लैंड में आपने अनेक सभाओं में भाषण दिये और बहुत अच्छा असर डाला। चारों ओर आपकी बहुत प्रशंसा हुईं। उस समय किसी ने कहा था कि पार्लियामेंट तथा उससे बाहर जो अनुभवी वक्ता हैं उन्हें सुरेंद्रनाथ बनर्जी के रूप में एक ऐसा व्यक्ति देखने को मिला, जिसमें विलियम पिट की दहाड़ है, फ़ॉक्स की विवादपटुता है, बर्फ का ताजापन है और शेरिडन का तेज़ विनोद है।

 

सन् 1890 में कलकत्ता में हुई कांग्रेस के सभापति-पद से फिरोजशाह मेहता ने भी आपके इंग्लैंड के काम की भूरि-भूरि प्रशंसा की थी। आपकी इन्हीं सेवाओं के लिए 1895 में पूना में हुए कांग्रेस के ग्यारहवें अधिवेशन का सुरेंद्रनाथ बनर्जी को सभापति बनाया गया। उस समय कांग्रेस में अन्दरूनी मतभेद बहुत हो रहे थे, फिर भी आप राष्ट्र की नौका को सफ़ाई के साथ पार ले गये। उस समय सभापति-पद से आपने जो भाषण दिया वह बहुत प्रभावशाली था। करीब तीन घण्टों तक धारा-प्रवाह बोलते गये, जिसमें प्रायः एक बार भी अपने लिखित भाषण को आपने नहीं देखा और श्रोता मंत्रमुग्ध हो निस्तब्ध रहे। जिन लोगों ने यह भाषण सुना था, उनका कहना है कि वह सर्वोपरि था। उसके बाद 1902 में अहमदाबाद में हुए 18 वें अधिवेशन के आप फिर सभापति हुए, जिसमें लगभग दो घण्टों तक आपका भाषण हुआ, जो पहले भाषण से भी अधिक प्रभावशाली और महत्वपूर्ण था।

 

बंग-भंग के साथ आपके राजनैतिक जीवन का स्मरणीय अध्याय शुरू होता है। आपने बंग-भंग का विरोध किया और उसके ख़िलाफ़ ज़ोरदार आन्दोलन संगठित किया। बंगाल भर को आपने हिला दिया। इतने पर भी जब आन्दोलन सफल न हुआ, तो स्वदेशी और बहिष्कार का झण्डा लहराया और एक सिरे से दूसरे सिरे तक सारे बंगाल में जाति की लहर पैदा कर दी। आपके विचारानुसार स्वदेशी और बहिष्कार एक ही सिक्के के दो पहलू हैं और वे एक-दूसरे से जुदा नहीं हो सकते। आज पुलिस का लाठी-प्रहार चाहे नई बात न रही हो, लेकिन उस जमाने में वह बिलकुल नई बात थी। फरीदपुर की एक सभा में आपको पुलिस की लाठी का भी शिकार होना पड़ा था।

 

‘सिटी फादर’ के रूप में सुरेंद्रनाथ बनर्जी बहुत पहले से म्यूनिसिपल मामलों में बहुत दिलचस्पी लेते थे। 1876 में कलकत्ता कारपोरेशन के आप पहली बार सदस्य चुने गये थे। तबसे 1909 तक,जबकि न्यू म्यूनिसिपल एक्ट के प्रतिवाद स्वरूप आपने इस्तीफ़ा दे दिया,आप उसके एक प्रमुख सदस्य रहे। इसी प्रकार आप कौंसिल के भी सभासद रहे। 1893 में नई बनी हुई कौंसिलों के लिए पहले पहल चुने जाने वाले लोगों में आप थे। 1894 और 1896 में कलकत्ता-कारपोरेशन की ओर से चुने गये और 1898 में प्रेसिडेंसी-डिबीजन की ओर से जिला-बोर्ड ने आपको चुना। 1900 में जिला-बोर्ड के चुनाव की बारी तो नहीं थी, पर म्यूनिसिपल बिल कौंसिल में विचारार्थ पेश था। इसलिए सर जान वुडबर्न ने उसे रिआयतन चुनाव का मौका दिया और उसने आपको ही दौबारा चुना।

 

1895 का सेनिटरी ड्रैनेज एक्ट कौंसिल में मुख्यतः आपके ही कारण पास हुआ, पर कलकत्ता म्यूनिसिपल एक्ट का विरोध सफल न हुआ। इम्पीरियल लेजिस्लेटिव कौंसिल के लिए तो आप दो बार खड़े हुए, पर दोनों ही बार असफल रहे। कांग्रेस से अलग होने पर, उन लोगों के साथ जो नरम कहलाने लगे थे, आपने नैशनल लिबरल फ़ेडरेशन की स्थापना की और उसके सर्वप्रथम अधिवेशन (1818) के सभापति आप ही चुने गये थे। उसके बाद आप सरकार की नजरों में चढ़ते गये और ‘सर’ तथा माण्ट फोर्ड सुधारों के बाद मिनिस्टर भी बने। निश्चय ही तब आपकी वह लोकप्रियता नहीं रही,पर पूर्व-सेवाओं के लिए आपकी प्रतिष्ठा फिर भी होती रही। और’ कलकत्ता कारपोरेशन का जो रूप आज हम देखते हैं वह मुख्यतः मिनिस्टरी-काल के आपके सतत-प्रयत्न का ही शुभ परिणाम है। अपने आन्दोलन के बीच जब गांधीजी कलकत्ता गये थे तब आपके सम्मानार्थ आपसे मिलने भी गये थे। यही नहीं, अपने और राष्ट्र के विकास-सम्बन्धी जो सुन्दर पुस्तक आपने लिखी थी, उसकी पाण्डुलिपि भी महात्मा जी ने गुजरात-विद्यापीठ में सुरक्षित रखने के लिए आपसे मांगी थी, हालांकि रिपन कालेज को देने का वचन दे चुकने के कारण आप, उसे गांधीजी को दे नहीं सके थे। राजनीति के साथ ही समाज-सुधार की भावना भी आपमें विद्यमान थी। आप ब्राह्म समाजी थे और अपना विवाह अपनी पसन्द से किया था। सुरेंद्रनाथ बनर्जी के एक पुत्र और पांच पुत्रियां थीं। क्रियात्मक समाज-सुधारक होने के कारण, लड़कियों की समुचित शिक्षा की आपने उपेक्षा नहीं की। समाज-सुधार के बारे में आपका क्‍या रुख था, यह “बंगाली” के निम्न उद्धरण से स्पष्ट हैः—

“सदियों से हम शक्ति की पूजा करते चले आ रहे हैं, फिर भी हमारा राष्ट्र इतना निर्बल और असहाय क्‍यों बना हुआ है? सरस्वती के हम बड़े उपासक है, लेकिन हमें उसका प्रसाद बहुत ही कम मिला है। जो पुरोहित धर्म-कृत्यों पर अपना एकाधिकार किये हुए हैं और पूजा पाठ कराने का ठेका लिये हुए हैं, उनमें से अधिकांश को आज वेदों का उतना ही ज्ञान है जितना कि उस प्राचीन काल में शूद्रों को था, जबकि जाति-रूपी लोहे की सलाखों से उनके लिए ज्ञान के बन्द द्वार किये हुए थे। लक्ष्मी की हम आये साल पूजा करते हैं, फिर भी हमारा राष्ट्र कंगाल बना हुआ है।

“कट्टर हिन्दू अपने पूर्वजों द्वारा प्राचीन काल में निर्मित सफाई की कुछ विधियों पर मरे जाते हैं। उदाहरण के लिए बिना नहाये भोजन करना या रोज कपड़े न धोना पाप समझते हैं। सफ़ाई के इन पुराने नियमों को धर्म मानते हुए भी आधुनिक विज्ञान से सिद्ध नियमों की वे बिलकुल परवा नहीं करते, . . . . . . इसमे ज़्यादा बहस करने की ज़रूरत नहीं कि कट्टर हिन्दुओं की इतनी कट्टरता … . . . . जो पुरानी प्रथाओं में ज़रा भी रद्दोबदल करना अपवित्रता और पाप समझती है, निश्चय ही प्रगति के मार्ग में रुकावट है।”

 

सुरेंद्रनाथ बनर्जी की मृत्यु

स्वास्थ्य और दिनचर्या का भी सुरेंद्रनाथ बनर्जी खूब ध्यान रखते थे। हालांकि काम आप कलकत्ता में करते थे, किन्तु रहते थे कलकत्ता से उत्तर की ओर कोई 13 मील दूर एक गाँव मनिरामपुर में। बाग़बानी का आपको शौक था और अपनी फुरसत का काफी समय आप अपने घर के आसपास लगाये हुए बाग़ में बिताते थे। 60 वर्ष से अधिक उम्र हो जाने पर भी व्यायाम नियमित रूप से करते रहे।संभवतः यही कारण है कि आपको लम्बी आयु मिली और आयु के अन्तिम दिनों तक आपका स्वास्थ्य औरों की बनिस्बत अच्छा रहा। 1925 में कलकत्ते में सुरेंद्रनाथ बनर्जी स्वर्गवास हो गया।

 

भले ही कोई आपके राजनैतिक लक्ष्य या उसे प्राप्त करने के साधनों से मतभेद रखे, लेकिन इस बात से शायद ही कोई इन्कार कर सकेगा कि भारतीय राष्ट्र को जाग्रत करने में आपका बहुमूल्य भाग रहा है और स्वदेशी व बहिष्कार की भावना के रूप में राष्ट्र को आपने अमोध अस्त्र प्रदान किया है।

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