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मणिपुर का इतिहास हिंदी में - मणिपुर हिस्ट्री

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मणिपुर  भारत की उत्तरी पूर्वी सीमा पर स्थित छोटा-सा राज्य है जिसका क्षेत्रफल 22,347 वर्ग कि० मी० है। मणिपुर का लगभग 90%भाग पर्वतों से घिरा है जबकि घाटी का मैदानी भाग कुल क्षेत्रफल का 10% मात्र है। सन्‌ 2011 ई० की जनगणना के अनुसार मणिपुर की जनसंख्या 2855794 है। कुल जनसंख्या का दो-तिहाई भाग मणिपुर की घाटी में रहता है, जबकि पर्वतों में शेष भाग। प्रकृति ने मणिपुर को दो भागों में बांट दिया है। मणिपुर की घाटी को ऊंचाई 800 से 1000 मीटर है, जबकि सबसे ऊँची पर्वत श्रृंखला की समुद्रतल से ऊँचाई लगभग 2831 मीटर है। मणिपुर का मध्य भाग मणिपुर की घाटी है, जो समतल है किन्तु इसका कुल क्षेत्रफल 1800 वर्ग कि० मी० ही है। मणिपुर की पश्चिमी पर्वत श्रृंखला के पीछे 250 वर्ग कि० मी० का छोटा-सा मैदान है जिसको बराक नदी बेसिन कहां जाता है। यह सूरमा घाटी (कछार-असम) का ही विस्तार है। मणिपुर के उत्तर में नागालैंड, पश्चिम में असम तथा दक्षिण में मिजोरम और पूर्व में बर्मा स्थित है। मणिपुर की पर्वत श्रृंखलाएँ उत्तर पूर्वी हिमालय की शाखाएँ हैं जो मणिपुर के उत्तर से होती हुई दक्षिण पूर्व की ओर बर्मा में अराकान योमा तक ...

मणिपुर जनजाति और उनका जनजीवन

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मणिपुर जनजाति के निवासी मंगोलियन या हिन्द-मंगोलियन जाति के माने जाते हैं। मणिपुर के मूल निवासियों की शारीरिक संरचना तथा चेहरे की बनावट मंगोल जाति जैसी है, परन्तु उनमें से बहुत से ऐसे लोग भी हैं जिनका शारीरिक गठन आर्य जाति से मिलता है। डा० ब्राउन ने भी आर्य एव मंगोल जाति की मिली-जुली बनावट का उल्लेख किया है। वास्तविकता यह है कि मणिपुर विभिन्‍न जातियों का आश्रय स्थल रहा है, इसलिए शारीरिक संगठन में विविधता आ जाना कोई आश्चर्य की बात नही हैं। इस समय इसके निवासियों को विद्वान निम्न प्रमुख चार विभागों में रखते हैं – (1) मैतेई (जिसमें अनुसूचित जाति लोइ भी सम्मिलित हैं।) (2) विष्णुप्रिया (3) पर्वतीय जन, तथा (4) मणिपुर मुस्लिम।   मणिपुर जनजाति और जनजीवन   मैतेई जाति, लोइ जाति और मुस्लिम लोग सामान्यत घाटी में रहते हैं। मैतेई लोग असम, पश्चिमी बंगाल, उत्तर प्रदेश , बंगला देश और बर्मा में भी रहते हैं। पर्वतीय जन जातियो में ताखुल, माली, मरम, बदुई, कुकी, आदि जाति के नागा व आधे नागा तथा गैर नागा जन-जातियो के लोग रहते हैं। विष्णुप्रिया लोग कछार, सिलहट व त्रिपुरा निवासी हैं। विभिन्‍न समय और स्था...

मणिपुर धर्म - मणिपुर में धार्मिक स्थिति क्या है

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भारत का छोटा सा राज्य मणिपुर धर्म और धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है जो अन्य राज्यों से कुछ अलग सा प्रतीत होता है। मणिपुर में मैते धर्म का प्राचीनकाल में प्रचलन था। उस धर्म का वास्तविक स्वरूप क्‍या था, यह आज विवाद का विषय बन गया है। पौराणिक और लोक कथाओं एवं प्रचलित प्रथाओ के आधार पर भी कुछ कहना कठिन हो गया है, क्योकि इसके वर्ग विशेष की भावना को ठेस पहुंचने और प्रतिक्रिया की सभावनाएं हैं। फिर भी इतना तो कहना ही होगा की सुष्टिकर्ता गुरू सिदवा और देवी लैमारैन को माना जाता है, जो शिव और पार्वती के अवतार हैं। नवजागरण में विश्वास करने वाले इनको शिव-पार्वती से भिन्‍न बताते हैं। जनजागरण वालों का कहना है कि गरीब निवाज के शासन काल में अर्थात्‌ 18 वीं शताब्दी के पूर्वार्ध में मणिपुर धर्म, संस्कृति तथा पुराणों को नष्ट कर दिया गया है। यह ऐतिहासिक सत्य भी है। इस आधार पर वे हिन्दू देवी-देवताओं के साथ मणिपुरी देवताओं का सबंध जोडना भी अस्वीकार करते हैं। किन्तु कुछ लोगों के विचार से नोडपोक निडथौ की तथा पाथौइदी कथा में (जिसको वे भी स्वीकार करते हैं) नोडपोक निडथौ की जो वेशभूषा चित्रित की गई है, उसके आधार...

मणिपुर का भोजन - मणिपुर का खानपान

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मणिपुर का मुख्य भोजन चावल है। गेहूं भौर मक्की का उत्पादन होता है, परन्तु खाते नहीं है। पर्वतीय जन मांसाहारी हैं जबकि घाटी के लोग केवल मछली खाते हैं और अपने को निरामिष या शाकाहारी मानते हैं। भोजन में गोभी, आलू, बंदगोभी, आदि सब्जियों के साथ सरसों और राई के पत्तों की साग बहुत प्रचलित है। मैतेई समुदाय एक चटनी बनाते हैं जिसको “एराम्बा” कहा जाता है। सूखी मछली, आलू योंकचाक (एक लम्बी फली), बांस की कोपल का भीतरी भाग आदि विभिन्‍न वस्तुओ को उबालकर एरोम्बा चटनी बनाई जाती है। इसमें मिर्च की मात्रा बहुत अधिक होती है।   मणिपुर का भोजन   मणिपुर के खानपान में विभिन्‍न प्रकार की दालों और सब्जियों का प्रयोग करना तथा तली हुई मछली व रसदार मछली भी भोजन में अवश्य रहती है। तेल-घी का बहुत कम प्रयोग किया जाता है। दूध और दूध उत्पादन का भी अधिक प्रचलन नही है। मणिपुर में मोटे या तोंद वाले व्यक्ति बहुत ही कम हैं। भोजन भूमि पर बैठकर दिया जाता है। मैतेई भोजन में व्यजनों की विविधता रहती है और उत्सवों आदि पर आयोजित भोज या दावत में व्यंजन संख्या 100 से 150 तक भी हो सकती है। दावतों या प्रसाद में खीर बनाई जाती है...

मणिपुर की वेशभूषा - मणिपुर का पहनावा

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भारत  विविधताओं से भरा देश है, यहां लगभग हर 100 किलोमीटर पर लोगों की भाषा और वेषभूषा बदलाव नजर आने लगता है, आज हम बात करेंगे मणिपुर की वेशभूषा यानि मणिपुर के पहनावे की। यहां की मुख्य जनजाति मैतेई, कुकी और नागा है, अपने मणिपुर राज्य से संबंधित पिछले एक दो लेखों में कई स्थानों पर मैतेई पुरुष की वेशभूषा का उल्लेख किया है। मैतई पुरुष अक्सर धोती-कूर्ता पहनते हैं विशिष्ट अवसरो पर वे साफा भी बाँधते हैं। मैतेई स्त्रियों का पहनावा में कमर में फनेक” (तहमद) बाँधा जाता है, तो कंधों पर चादर डाली जाती है जिसको “इनाफि” कहा जाता है। पुराने समय में वक्षस्थल को भी फनेक से ही ढका जाता था, किन्तु इधर ब्लाउज का प्रचलन हो गया है।   मणिपुर की वेशभूषा – मणिपुर का पहनावा क्या है   आदिवासी जनजातीय लोगो में पुरुष कमर में लंगोटनुमा वस्त्र बाँधते हैं, ऊपर एक शाल या कम्बल ओढ़ते हैं। आदिवासी जनजातीय महिलाओं की वेशभूषा मैतेई महिला से अधिक भिन्‍न नही होती। कमर में तहमद, ऊपर शाल और ब्लाउज का भी प्रचलन है। यह परम्परागत मणिपुर का पहनावा है, किन्तु पाश्वात्य प्रभाव के कारण मैतेई एवं जनजातीय स्त्री-पुरुष की व...

मणिपुर का रहन सहन कैसा है

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मनुष्य का निवास भौगोलिक परिस्थितियों पर निर्भर करता है। वह उपलब्ध सामग्री से आवश्यकतानुसार घर बनाता है। मणिपुर को प्रकृति ने दो भागों में विभक्त कर रखा है, अतः मणिपुर के पर्वतीय क्षेत्र का रहन सहन घाटी में बसने वाले लोगो से भिन्‍न हैं। पर्वतीय लोग पर्वत शिखरों या ढ्रालो पर मकान बनाते हैं। इन क्षेत्रों में जनसंख्या छितरी हुई है। 100 से 200 जनसंख्या वाले गांवों की संख्या दो तिहाई से भी अधिक है। घर बनाने के लिए लकड़ी, घास, पते, सरकड़ें, कच्ची मिट्टी की ईंटे व बांस का प्रयोग किया जाता है। घर केवल एक मंजिल के होते हैं, अपवाद स्वरूप कहीं दो मंजिलें घर भी मिल सकते हैं। घरों पर 50° से 60° कोण के ढलान वाली छत बनाई जाती है। अक्सर छत घास-फूस की होती है, कुछ घरों पर टिन भी है, किन्तु वे भी ढालवा ही हैं। फर्श लकडी या बांस से बनाए जाते हैं और सामान्यत यह भूमि से ऊंचे होते हैं। घर से कुछ ही दूरी पर धान का भंडार गृह होता है। घरों में धान नहीं रखा जाता न किसी घर में दरवाजे पर ताला लगाया जाता है। गाँव के मुखिया को छोडकर एक ही कमरे के घर होते हैं। गांव बूढ़े के घर लकडी के बने होते हैं, जिन पर थोड़ी नक्का...

मैतेई समुदाय कौन है तथा मैतेई जाति का इतिहास

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वैसे तो मणिपुर में अनेक जातियां जनजातियां बस्ती है किन्तु मणिपुर प्रदेश के असली निवासियों को मैतेई कहा जाता है। जो हिन्दू धर्म से संबंध रखते हैं। वैसे तो इन लोगों की सक्लें  चीनी लोगों की भांति ही होती हैं परन्तु इन का डील डौल उनकी तरह नाटे कद का नहीं होता। अपितु यह भारत के अन्य आर्य वंशजों की भांति ही उच्च तथा बलिष्ठ शरीर के होते हैं। इनके मुख की बनावट चीनी लोगों से कुछ कुछ मिलती जुलती है परन्तु बहुत से लोग इनमें ऐसे भी हैं, जो हमारी तरह ही सरल मुखाकृति के भी है । कारण यह है, कि वास्तव में यह आर्यो के ही वंशज हैं, परन्तु सीमा प्रदेश के निवासी होने से बाहर की जातियों से भी इनका सम्बन्ध रहा है तथा उन से विवाह आदि सम्बन्ध स्थापित करने के कारण से, कुछ वंशों की मुखाकृतियां विदेशी लोगों से मिलने जुलने लगी है।   यहां पर बसने वाले मैतेई समुदाय के लोगों की मुख्य जीविका कृषि है। पर बहुत से लोग वनों में लकड़ी आदि काटने तथा ढोने का काम भी करते हैं। जगह जगह अनेक प्राकृतिक जल कुण्डों में लोगों ने मछली पकड़ने का व्यवसाय भी स्वीकार कर रखा है, क्योंकि मछली यहां का मनभाता खाजा है। मछली का साल...

नागा जनजाति के जनजीवन बारे में जानकारी

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नागा प्रदेश  भारत की उत्तर-पूर्वी सीमाओं पर स्थित है। यह एक जगत-विख्यात पहाड़ी प्रदेश है। सारे संसार में प्रसिद्ध होते हुए भी यह प्रदेश हमारे लिये आश्चर्य का विषय बना हुआ है। यहां के नागा जनजाति के निवासी बहुत पिछड़े हुए हैं। इन्सान होकर भी वे हिंसक बने हुए हैं। भारत जैसी देव-भूमि पर जन्म लेकर भी वे अब तक उन्नति के पथ पर अग्रसर क्यों नहीं हो पाये। इन सब बातों का उत्तर केवल एक ही है, और वह है, विद्या तथा शिक्षा का अभाव। इसी लिए नागा लोग हम से बहुत दूर हैं। यदि इन लोगों को शिक्षा से वंचित न रखा जाता, तो ये भी जीवन की दौड़ में आगे बढ़ सकते।   नागा जनजाति कहां पाई जाती हैं, नागा कौनसी जाति के होते हैं भारत के इन नागा जनजाति के लोगों को देख कर प्रतीत होता है कि इन का अतीत अवश्य ही गौरव-मय रहा होगा। इन का रहन-सहन, खाना- पीना, आचार-विचार, तथा ओढ़ना-पहनना सभी विचित्र हैं। संसार कितना आगे बढ़ चुका है इस बात की इनको तनिक चिन्ता नहीं है। ये अपने रीति-रिवाजों तथा जीवन- प्रणाली को इतना महत्व देते है कि देखते ही बनता है। नागा समुदाय के लोगों का प्रदेश बर्मा, मणिपुर तथा आसाम की सीमान्त पहाड...

मणिपुर की भाषा का इतिहास और लिपि

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मणिपुर  क्षेत्रफल की दृष्टि से बहुत ही छोटा राज्य है। मणिपुर की जनसंख्या 30-32 लाख के आसपास है। परन्तु इसमें अनेक भाषाओं और बोलियों का प्रचलन है। इन भाषाओं में मणिपुरी जिसे स्थानीय भाषा में ‘मैतेलौन” कहा जाता है, प्रमुख एवं सम्पर्क भाषा है। मणिपुरी भाषा-भाषी जन संख्या लगभग 2/3 है और शेष 1/4 लोग भी मणिपुरी भाषा बोलते हैं । वास्तव में मणिपुर की घाटी में बसने वाले मैतेई जनजाति की भाषा मैतेलोन या मणिपुरी है, जब कि पर्वतों में रहने वाले आदिवासियों की लगभग चालीस भाषाएं हैं, जिनकी अनेक उप भाषाएं और बोलियां भी हैं।   मणिपुर की भाषा का इतिहास   पर्वतीय भाषाओं मे प्रमुख है :– आइमोल, अडामी, अण्ड्रो, अताल, कच्चा नागा, कबुई, कौम, कौराओ, कौरेड (लियाड), कूपोमे, खोइराओ, खाओइ, खुरीकुल, डाडते, चाइरेल, चिरू, चौथे, ताखुल, भादौ (घादोइ), पाइसे, पुरुम, फदाड़, मरम, मरिझ, माओ (सोपवोमा), भार, मियाड, मोतासाझ, मोयोन, एलते, लाभडाड, लुशाई, वाईफ, शान, साथे, सिमते सेडमई, सेमा, हिरोइ लाभडाड आदि। इन भाषाओं के अतिरिक्त भारत के विभिन्‍न भागो की भाषाएं व बोलियां भी मणिपुर मे प्रचलित हैं, जिनमें, बंगला, राजस्...

मणिपुर के नृत्य - मणिपुर के कौन कौन से नृत्य प्रसिद्ध है

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नृत्य एवं संगीत मणिपुरी जनजीवन एवं संस्कृति के अभिन्‍न अंग है। प्रत्येक धार्मिक उत्सव, पर्व, त्योहार के साथ नृत्य जुडा हुआ है। लोक नृत्य-संगीत के क्षेत्र मे मणिपुर की श्रेष्ठता का कारण मणिपुर की जनता की कला में गहरी अभिरूचि है। प्रत्येक कलाकार, खिलाडी आदि को दर्शक साधुवाद देते हैं, इसलिए कलाकार निरन्तर अपनी कला का परिष्कार करता है। समाज में सम्मान पाने के लिए कलाकार दत्त-चित्त होकर अभ्यास करते हैं। समाज और राज्य के द्वारा कलाकारो को संरक्षण एवं प्रोत्साहन देने की प्राचीन परम्परा रही है। इसलिए मणिपुर में नृत्य एवं अन्य अकलाएं निखरती गई हैं और आज भी निखरती जा रही हैं। ठकेमणिपुर के लोक नृत्य की प्राचीन परम्परा रही है जिनमे बालक से वृद्ध तक सम्मिलित होते हैं, चाहे वे स्त्री हो या पुरुष। इसलिए मणिपुर मे कहा जाता है कि कोई ऐसा व्यक्ति नहीं जो नाचना न जानता हो। प्रत्येक मैतेई समुदाय के घर में ‘शघोई” (बरामदा) होता है, और प्रत्येक गांव व बस्ती मे मंदिर होता है जिसमें एक बडा मंडप बना होता है। इस मंडप में नृत्य गान का आयोजन होता रहता है। इस प्रकार नृत्य-गान दैनिक जीवन का अजय बन गया है।   मणिप...