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महाराणा कुम्भा का इतिहास और जीवन परिचय

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राणा मोकल के बाद उनके पुत्र महाराणा कुम्भा ने मेवाड़ के गौरवशाली राज्य-सिंहासन को सुशोभित किया। मेवाड़ के जिन महापराक्रमी राणाओं ने अपने अपूर्व वीरत्व, अद्वितीय स्वार्थत्याग आदि दिव्यगुणों से भारतवर्ष के इतिहास को उज्ज्वल किया है, उनमें महाराणा कुम्भाका आसन सर्वोपरि है। उन्होंने जो जो महान विजय प्राप्त की हैं, उनका न केवल मेवाड़ के इतिहास में, वरन भारतवर्ष के इतिहास में बड़ा महत्व है। इन प्रतापी महाराणा कुम्भा का पूर्ण परिचय देने के प्रथम यह आवश्यक है कि तत्कालीन भारतवर्ष की परिस्थिति पर कुछ प्रकाश डाला जावे। जिस समय मेवाड़ में परम तेजस्वी, परम पराक्रमी और परम राजनीतिज्ञ महाराणा कुम्भा का उदय हो रहा था, उस समय दुर्दांत तैमूरलंग ने भारतवर्ष पर आक्रमण कर दिल्ली को बर्बाद कर  दिल्ली के तत्कालीन मुसलमान तुगलक बादशाह की ताकत को तोड़ डाला था। यद्यपि तैमूरलंग के लौट जाने पर मुहम्मद तुगलक दिल्‍ली को वापस लौट आया था, पर इस वक्त वह अपनी सारी प्रतिष्ठा, प्रभाव और तेज को खो चुका था। इस वक्त वह केवल नाम मात्र का बादशाह रह गया था। इससे मालवा, गुजरात , और नागौर के सल्तानों ने इसकी अधीनता से निकल...

बप्पा रावल का इतिहास और जीवन परिचय

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राजा महेन्द्र के बाद उनके पुत्र कालभोज, (बप्पा रावल का मूल नाम) जो बप्पा रावल के नाम से प्रसिद्ध हैं, राज्यासीन हुए। यह बड़े प्रतापी और पराक्रमी थे। इनके सोने के सिक्के चलते थे।अनेक संस्कृत शिलालेखों तथा पुस्तकों में बप, बैप्पक’ बप्प’ बप्पक’ बाप! बप्पाक’ बापा’ आदि मिलते हैं। बप्पा रावल के समय का जो स्वर्ण-सिक्का मिला है उससे एक ऐतिहासिक रहस्य का उद्घाटन होता है। उदयपुर राज्य के राज्यवंश की मूल जाति के विषय में जो अनेक तरह के भ्रम फैले हुए हैं, उनसे इनका निराकरण होता है।     बप्पा रावल का इतिहास और जीवन परिचय   इस सिक्के में, जो कि सुप्रख्यात्‌ पुरातत्वविद राय बहादुर पं० गौरी शंकरजी ओझा को अजमेर के किसी महाजन की दुकान से प्राप्त हुआ है, एक ओर चँँवर, दूसरी ओर छत्र और बीच में सूर्य का चिन्ह है। इससे यह पाया जाता है कि बप्पा रावल सूर्यवंशी थे। इन बप्पा रावल ने चित्तौड़ के मोरी (मौर्य वंशीय ) राजा से चितौड़ का किला विजय किया था। इन्होंने अपने राज्य का विस्तार दूर दूर तक फैलाया था । दंत-कथाओं में तो यहां तक उल्लेख है कि उन्होंने ठेठ ईरान तक धावा मारा था और वहीं उनका देहान्त हुआ...

रावल जैत्रसिंह का इतिहास और जीवन परिचय

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रावल जैत्रसिंह मेवाड़ के राजा मंथनसिंह के पौत्र और पद्मसिंह के पुत्र थे। प्राचीन शिलालेखों में जैत्रसिंह के स्थान पर जयतल, जयसल, जयसिंह और जयतसिंह आदि इनके नाम भी मिलते हैं। भाटों की ख्यातों में उनका नाम जैतसी या जैतसिंह मिलता है। वे बड़े प्रतापी राजा हुए। उन्होंने अपने आस-पास के हिन्दू राजाओं तथा मुसलमानों से कई युद्ध किये। उनके समय के वि० सं० 1270 से 1309 तक के कई शिलालेख मिले हैं। उनसे पाया जाता है कि इस महान पराक्रमी नृपति ने कम से कम 40 वर्ष राज्य किया। इस प्रबल पराक्रमी राजा के गौरवशाली कार्यों का उल्लेख कई शिलालेखों में किया गया है। जैत्रसिंह के पुत्र तेजसिंह के समय के घाघसा गाँव से जो चित्तौड़ से 6 मील पर है, वि० सं० 1322 का एक शिलालेख मिला है। इसमें जैत्रसिंह के गौरव पर दो श्लोक हैं। जिनका भाव यह है– “उस (पद्मसिंह) का पुत्र जैत्रसिंह हुआ जो शत्रु राजाओं के लिये प्रलयकाल के पवन के समान था। उसके सवत्र प्रकाशित होने से किनके हृदय नहीं काँपे। गुजेर (गुजरात) मालव, तुरुष्क (देहली के मुसलमान सुलतान) और शाकंभरी के राजा (जालौर के चौहान) आदि आदि उसका मान मर्दन न कर सके।   रावल जैत्र...

महाराणा विक्रमादित्य का इतिहास

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महाराणा विक्रमादित्य महाराणा सांगा के पुत्र थे, और महाराणा रतन सिंह द्वितीय के भाई थे, महाराणा रतन सिंह द्वितीय की मृत्यु के पश्चात और अपने पुत्र को फांसी पर चढ़ाने के बाद महाराणा रतन सिंह द्वितीय के अब कोई पुत्र न बचा था, अतएवं उनके भाई महाराणा विक्रमादित्य सन् 1531 में राज्य सिंहासन पर बैठे। इस समय इनकी उम्र 14 वर्ष थी। इनके शासन-काल में घरेलू विरोध की आग बड़े जोर से धधकने लगी। भील भी उनसे नाराज़ रहने लगे। इस उपयुक्त अवसर को देख कर गुजरात के शासक बहादुर शाह जफर ने फिर मेवाड़ पर आक्रमण कर दिया। यह बढ़ा भीषण आक्रमण था। शिसोदिया वीरों ने अपूर्व वीरत्व के साथ युद्ध किया।     महाराणा विक्रमादित्य का इतिहास     यहाँ तक कि स्वयं राजमाता महारानी कर्णावती कई वीर क्षत्राणियों के साथ हाथ में तलवार लेकर शत्रुओं पर टूट पड़ी और उसने सैकड़ों शत्रु-सेनिकों को तलवार के घाट उतार दिये। बहादुर शाह जफर दंग रह गया। पर बहादुर शाह जफर के पास असंख्य सेना एवं बढ़िया तोपखाना था, अतएव आखिर में वह विजयी हुआ। असंख्य राजपूत वीर और वीर रमणियाँ अपनी मात्रभूमि की रक्षा करती हुई स्वर्गलोक को सिधारीं...

महाराणा रतन सिंह द्वितीय का इतिहास

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महाराणा संग्रामसिंह (सांगा) के बाद उनके पुत्र महाराणा रतन सिंह द्वितीय राज्य-सिंहासन पर बैठे। आपमें अपने पराक्रमी पिता की तरह वीरोचित गुण भरे पड़े थे। रणक्षेत्र ही को आप अपनी प्रिय वस्तु समझते थे। आपने चित्तौड़गढ़ के दरवाजे खुले रखकर लड़ने का प्रण किया था। इन्होंने आमेर के राजा पृथ्वीराज की पुत्री के साथ गुप्त विवाह किया था। स्वयं पृथ्वीराज को यह बात मालूम न थी। उन्होंने हाड़ा वंशीय सरदार सूरजमल के साथ अपनी पुत्री का विवाह कर दिया जब महाराणा को इस विवाह की खबर लगी तो उन्हें बडा दुःख हुआ।   महाराणा रतन सिंह द्वितीय का इतिहास   राजा सूरजमल की बहिन महाराणा को ब्याही थी, अतएव प्रत्यक्ष रूप से महाराणा उन्हें कुछ न कह सके। पर उनके दिल में इसका बदला लेने की आग बड़े जोर से धधक रही थी। थोड़े ही दिनों के बाद अहेरिया का दिन आया। महाराणा शिकार खेलने के लिये निकले। प्रसंगवश सूरजमल भी महाराणा के साथ शिकार खेलने के लिये चल पढ़े। अवसर देख कर महाराणा ने सूरजमल को ललकारा। दोनों वीरों ने तलवार से फ़ैसला करने का निश्चय किया। इसमें दोनों काम आये। महाराणा रतन सिंह के केवल एक ही पुत्र था, जो महाराणा...

महाराणा प्रताप सिंह का इतिहास - महाराणा प्रताप की मृत्यु कैसे हुई

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सन्‌ 1572 में महाराणा प्रताप सिंह जी मेवाड़ के महाराणा हुए। इस समय महाराणा के पास न तो पुरानी राजधानी ही थी न पुराना सैन्य दल और न कोष ही था। महाराणा प्रताप सिंह रात दिन इसी चिन्ता में रहने लगे कि चितौड़ का उद्धार किस तरह किया जाय। ये इस बात को अच्छी तरह जानते थे कि सम्राट अकबर की सेना और शक्ति के सामने हमारी शक्ति कुछ भी नहीं है। चारण और भाटों के मुख से अपने पूर्वजों की कीर्ति और वीरता सुनकर प्रताप के हृदय में देशोद्धार और स्वाभिमान ने पूरा स्थान पा लिया था। मेवाड़ के सभी सरदारों ने महाराणा की उच्च अभिलाषा का हृदय से समर्थन किया। अकबर ने मेवाड़ के सब सरदारों को धन दौलत और राज्य का लोभ देकर अपनी ओर मिलाने की चेष्टा की, परन्तु चण्ड, जयमल और फत्ता के वंशधरों ने किसी भी लोभ में पड़कर महाराणा का साथ नहीं छोड़ा। अकबर ने भी स्वयं महाराणा को कई बार लिखा कि यदि आप मेरे दरबार में एक बार आकर मुझे भारतेश्वर कह कर पुकारों तो में अपने राज्य-सिंहासन की दाहिनी ओर आपको स्थान देने के लिये तैयार हूं परन्तु महाराणा प्रताप सिंह ने किसी भी प्रलोभन में आकर अपना प्राचीन गौरव न घटाया। वे सदा कहा करते थे कि बा...

महाराणा फतह सिंह जी का परिचय

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महाराणा सज्जन सिंह जी के बाद महाराणा फतह सिंह जी सन 1885 में  उदयपुर राज्य के राजसिहासन पर बिराजे। आपका जन्म 16 दिसंबर सन् 1849 को हुआ था। इस्वी सन्‌ 1887 में जी० सी० एस० आई० की उपाधि से विभूषित किये गये। इसी साल आपने अफीम को छोड़ कर तमाम जावक माल का महसूल माफ कर दिया। आपके समय में चित्तौड़ से लगा कर उदयपुर तक रेलवे लाइन खोली गई। उदयपुर राज्य को जमीन का बन्दोबस्त हुआ। खास उदयपुर नगर और जिलों में कई अस्पताल खुले। और भी कई काम हुए। तत्कालीन भारतीय नरेशों में महाराणा फतह सिंह जी एक विशेष पुरुष थे।     महाराणा फतह सिंह जी का परिचय   संयम, तेजस्विता, आत्मसम्मान ओर प्रतिभा के आप मूर्तिमंत उदाहरण हैं। पुराने ढंग के होने पर भी भारतीय जनता आपको बड़े भादर का दृष्टि से देखती है। आपकी एक पत्नी व्रतधारी थी और यही कारण था कि की वृद्धावस्था में भी आप सूर्य की तरह चमकते थे। आपके मुख मण्डल पर संयम और शील का आलौकिक भाव दिखलाई पड़ता था। जो भारतीय नरेश राजधर्म के उच्च श्रेय को भूल कर प्रजा की कठिन कमाई के लाखों रुपयों को ऐय्याशी और विलास- प्रियता में खर्च कर जनता और इश्वर की दृष्टि में...