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महाराजा रत्नसिंह बीकानेर का परिचय और इतिहास

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महाराजा सूरत सिंह जी के परलोकवासी होने पर उनके पुत्र महाराजा रत्नसिंह जी  बीकानेर राजसिंहासन पर विराजमान हुए। आपके सिंहासन पर बेठने के साथ ही बीकानेर राज्य के सामन्‍त और समस्त प्रजा के मन का भाव भी सहसा बदल गया। महाराज सूरत सिंह जी की मृत्यु के पहले राज्य में जिस प्रकार अशान्ति, उत्पीड़न और अत्याचारों की वृद्धि हो रही थी, चोर डाकुओं के उपद्रव से जो राज्य में अराजकता फैली हुई थी, वह सब इस नवीन शासन के प्रारम्भ में शान्त हो गई। आपके सिंहासन पर बैठते ही जैसलमेर की प्रजा ने तथा राज-कमचारियों ने बीकानेर राज्य की प्रज्ञा के ऊपर घोर अत्याचार करना शुरू कर दिया। उन्होंने बीकानेर राज्य की सारी धन सम्पत्ति लूट ली। जब यह समाचार आपको मालूम हुए तो आपने जैसलमेर महाराज के पास युद्ध करने का प्रस्ताव भेजा। आपके युद्ध के प्रस्ताव को सुन कर जैसलमेर के महाराज कुछ भी भयभीत न हुए। आपने जयपुर और मेवाड़ आदि के राजाओं से सहायता मांगी। युद्ध की तैयारियाँ हो जाने पर आपने जैसलमेर पर आक्रमण कर दिया। अंग्रेजों के साथ संधि करते समय महाराज सूरतसिंह ने स्वीकार किया था कि बीकानेर के अधीश्वर किसी देशी राज्य पर आक्रम...

महाराजा सरदार सिंह बीकानेर परिचय और इतिहास

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महाराजा रत्नसिंह जी के स्वर्गवासी हो जाने पर सन् 1852 में उनके पुत्र महाराजा सरदार सिंह जी  बीकानेर राज्य के सिंहासन पर विराजमान हुए। महाराजा सरदारसिंह ने सन् 1852 से सन् 1872 तक बीकानेर राज्य पर शासन किया। आपके राज्याभिषेक के समय से बीकानेर की राज्य-शक्ति मानो क्रमश: हीन होने लगी थी। जो बल, विक्रम, शूरता, साहस आदि गुण राठौर राजाओं के भूषण थे, वे सब अग्रेज सरकार के साथ सन्धि करने से एक बार ही निर्जीव से हो गये थे। युद्धों से शान्ति मिलने से राजपूत जाति की वीरता का मानों एक बार ही लोप हो गया था। आपको राज्य करते हुए केवल पाँच ही वर्ष हुए थे कि भारत में सिपाही विद्रोह का कांड उपस्थित हो गया। इस समय आप बड़े आग्रह के साथ अपनी सेना सहित ब्रिटिश गवर्नमेंट की सहायता के लिये तैयार हुए। आपने इस समय हजारों अंग्रेजों के प्राणों की रक्षा करके उन्हें अपनी राजधानी में आश्रय दिया।   महाराजा सरदार सिंह का इतिहास और जीवन परिचय   महाराजा सरदार सिंह बीकानेर   विद्रोह शान्त हो जाने पर आपकी इन बहुमूल्य सहायताओं के उपलक्ष्य मे हिसार देश के चौद॒ह हज़ार दो सौ बानवे रुपये की आमदनी वाले 41 गा...

राव बीका जी का इतिहास और जीवन परिचय

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बीकानेर राज्य के शासक उस पराक्रमी और सुप्रिसिद्ध राठौड़ वंश के है, जिसके शौर्य साहस और रणकौशल का वर्णन हम अपने अन्य लेखों में भी कर चुके हैं। ये उन्हीं शक्तिशाली राव जोधा जी के वंशज हैं जिनका उल्लेख हम अपने  जोधपुर राज्य का इतिहास नामक लेख में कर चुके हैं।  बीकानेर राज्य के मूल संस्थापक मारवाड़ के राजकुमार राव बीका जी थे। ये मारवाड़ के प्रसिद्ध वीर महाराजा  राव जोधा के पुत्र थे। इन्हीं जोधा जी ने अपने राज्य की प्राचीन राजधानी मंडौर को छोड़कर सन् 1459 में जोधपुर में नवीन राजधानी स्थापित की थी।     राव बीका जी का इतिहास और जीवन परिचय   जिस समय जोधा जी अपनी नवीन राजधानी में आये उस समय आपके वीर पुत्र राव बीका जी अपने चाचा कांधल जी के साथ तीन सौ राठौडो की सेना लेकर अपने पिता जी के राज्य की सीमा दूर दूर तक फैलाने के लिए रवाना हुए। राव बीका इस दिग्विजय प्रस्थान से पहले आपके भाई बीदा ने भारत के प्राचीन निवासी मोहिलो पर आक्रमण कर उन्हें अपने अधीन कर लिया था। राव बीका जी भ्राता की इस विजय से उत्साहित होकर कुमार बीका जी ने एक छोटी सी राठौड़ सेना के साथ देश विजय के ...

महाराजा कर्ण सिंह बीकानेर परिचय और इतिहास

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महाराजा रायसिंह के स्वर्गवासी हो जाने घर उनके एक मात्र पुत्र महाराजा कर्ण सिंह जी पिता के सिंहासन पर विराजमान हुए। अपने पिता की जीवित अवस्था में ही सम्राट की अधीनता में महाराजा कर्ण सिंह दौलताबाद के शासन-कर्ता के पद पर नियक्त हुए थे। महाराजा कर्ण सिंह दाराशिकोह के विशेष अनुगत थे और आपने उसको बादशाह के दरबार में प्रवेश करने के लिये विशेष सहायता दी थी।   महाराजा कर्ण सिंह का जीवन परिचय   इस कारण दारा के प्रतिद्वंदी मुगल सम्राट के प्रधान-सेनापति, जिनकी अधीनता में आप काम करते थे, आपसे चिढ़ गये। उन्होंने महाराजा कर्ण सिंह का प्राण-नाश करने का गुप्त षड़यंत्र रचा। परन्तु बूँदी के तत्कालीन महाराज ने आपको पहले से ही सावधान कर दिया। इससे आपने सहज ही में शत्रुओं की उस पाप-कामना को निष्फल कर दिया। कई वर्षों तक प्रबल प्रताप के साथ राज्य शासन कर आपने इस नश्वर शरीर को त्याग दिया। आपके चार पुत्र थे- पद्मसिंह, केशरी सिंह, मोहन सिंह और अनूप सिंह। इनमें से दो पुत्र तो सम्राट की ओर से असीम साहस दिखा कर बिजापुर युद्ध में वीरगति को प्राप्त हुए थे। तीसरे पुत्र मोहन सिंह के जीवन के वियोगान्त अभिनय का...

महाराजा रायसिंह बीकानेर का परिचय

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स्वर्गीय कल्याणमल जी के पश्चात उनके ज्येष्ठ पुत्र महाराजा रायसिंह जी बीकानेर राज्य के राज सिंहासन पर बैठे। आपके शासन-काल से  बीकानेर राज्य के गौरव की सीमा बढ़ने लगी। आपके राजपद पर अभिषिक्त होने के पहले बीकानेर राज्य एक छोटा सा राज्य गिना जाता था। यद्यपि एक के बाद एक वीर एवं साहसी राजाओं ने इस राज्य की सीमा को दूर दूर तक फेलाया था, तथापि मान मर्यादा में बीकानेर राज्य एक सामान्य राज्य की श्रेणी में गिना जाता था। आपने सिंहासनारूढ़ होकर राजनेतिक रंणभूमि में पर्दापण किया। आपकी राजनीतिकता एवं दूरदर्शिता ने बीकानेर राज्य को गौरव के इतने ऊँचे शिखर पर पहुँचा दिया कि थोड़े ही समय में उसकी गणना एक महान शक्तिशाली राज्य में की जाने लगी। आपके शासन-समय में दिल्‍ली के सिंहासन पर सम्राट अकबर विद्यमान थे। अधिकांश राजपूत राजा दिल्ली के मुगल बादशाह की अधीनता स्वीकार कर अपने राज्यों की सीमा वृद्धि कर रहे थे। आपने निश्चय किया कि केवल बीकानेर के शासन कार्य से ही संतुष्ट होकर समय बिताना उचित नहीं है, वरन ऐसे स्वर्ण अवसर पर र उचित लाभ उठाकर अपनी बराबरी वाले अन्यान्य राजाों की तरह नाम और यश पाने की चेष्टा ...

महाराजा अनूप सिंह का इतिहास

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महाराजा कर्ण सिंह जी के तीन पुत्रों की मृत्यु तो उपरोक्त लेख में बतलाये मुताबिक हो ही चुकी थी। केवल चौथे पुत्र महाराजा अनूप सिंह जी बच गये थे। अतएव सन् 1764 में राजा की उपाधि धारण कर आप राज सिंहासन पर बेठे। आप एक महावीर ओर असीम साहसी पुरुष थे। बादशाह ने आपको पाँच हज़ार अश्वारोही सेना की मनसब तथा बीजापुर और औरंगाबाद आदि प्रांतों के शासन का भार अर्पण किया। जिस समय काबुल के अफगान दिल्ली के बादशाह से विद्रोही हो गये थे, उस समय उस विद्रोह को दमन करने के लिये महाराजा अनूप सिंह बादशाह द्वारा काबुल भेजे गये थे। आपने वहाँ पहुँच कर इस विद्रोह को दमन करने में विशेष सहायता की थी। इसके बाद भी आपने कई युद्धों में अपना पराक्रम दिखाया था। आपके मृत्यु-स्थान के विषय में मतभेद है। फारसी इतिहासकार फरिश्ता लिखता है कि- आपने दक्षिण में प्राण त्याग किये।” परन्तु राठौरों के इतिहास से यह मालूम होता है कि जिस समय आप दक्षिण में सेना सहित गये थे, उस समय मार्ग में अपने डेरा जमाने के स्थान पर बादशाह के सेनापति के साथ आपका कुछ झगड़ा हो गया। इससे आप अत्यंत्र विरक्त होकर अपने बीकानेर राज्य में विपस लौट आये। कुछ ही दिन...

महाराजा सूरत सिंह बीकानेर जीवन परिचय और इतिहास

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महाराजा राजसिंह के दो पुत्र थे। महाराजा सूरत सिंह की माता की इच्छा राजसिंह के प्राण हरण कर अपने पुत्र को  बीकानेर राज्य के सिंहासन पर बैठाने की थी। किन्तु सूरत सिंह ने देखा कि वीर सामन्‍त तथा कार्य कुशल अमात्यगणों के सम्मुख इस शोचनीय हत्या काण्ड के पश्चात्‌ सिंहासन पर बैठना महा विपत्ति-कारक है। अतएव प्रकट रूप में अपने सौतेले भाई की मृत्यु पर शोक प्रकट कर वे भविष्य में उससे भी अधिक रोमहर्षण कार्य करने के लिये प्रवृत्त हुए। इन्होने राज्य के सामन्तों की सलाह के अनुसार स्वर्गीय राजसिंह जी के बालपुत्र प्रताप सिंह को गद्दी पर बैठाया तथा आप स्वयं राज-प्रतिनिधि रूप से राज्य शासन करने लगे। आपने अठारह वर्ष तक विशेष चतुराई और सावधानी के साथ राज्य किया। आप इस अवधि में प्रधान-प्रधान साम्नन्तों तथा अमात्यगणों को खुश करने के लिये समय समय पर उन्हें कीमती उपहार देते रहे। जब आपने देखा कि अपनी बाह्य दया ओर नम्रता से सब सामंतगण संतुष्ट हैं तो पहले पहल आपने अपने विशेष अछुगत महाजन और भादरं के दोनों सामन्तों से अपने हृदय में अठारह वर्ष तक छिपाये हुए पापी अभिप्राय को कह सुनाया। आपके अभिप्राय को सुनकर उक्...

महाराजा डूंगर सिंह का इतिहास और जीवन परिचय

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महाराजा सरदार सिंह जी की पुत्रहीन अवस्था में मृत्यु होने से बीकानेर का राज्य-सिंहासन सूना हो गया। इसी कारण से ब्रिटिश गवनमेंंट की आज्ञानुसार मंत्रि-मण्डल की सृष्टि करके उसके हाथों में शासन का भार सोंपा गया। प्रधान राजनैतिक कर्मचारी इस मंत्रि-मण्डल के सभापति होकर राज्य करने लगे। इस प्रकार कुछ काल तक राज्य-कार्य चलने के पश्चात्‌ राजरानी और सामन्तों ने नवीन महाराज नियुक्त करने का विचार किया। अतएव राज-घराने के लालसिंह नामक एक बुद्धिमान मनुष्य के पुत्र डूंगर सिंह को दत्तक ग्रहण करने का प्रस्ताव किया गया। ब्रिटिश गवर्मेंट ने स्वर्गीय महाराज सरदार सिंह जी को दत्तक लेने की सनद प्रदान कर दी थी, अतएवं उसने बिना कुछ आपत्ति किये महाराजा डूंगर सिंह जी के राज्याभिषेक के प्रस्ताव में शीघ्र ही अपनी अनुमति दे दी। अल्पावस्था ही में महाराजा डूंगर सिंह जी राजा की उपाधि धारण कर बड़ी धूमधाम के साथ बीकानेर के राज्य-सिहासन पर बिराजे।   महाराजा डूंगर सिंह का इतिहास और जीवन परिचय महाराजा डूंगर सिंह अल्पवयस्क होने के कारण राजकार्य को कुछ नहीं जानते थे, इसी से आपके हाथ में सम्पूर्ण राज्य-शासन का भार देना असम...

महाराजा गंगा सिंह का इतिहास और जीवन परिचय

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महाराजा डूंगर सिंह की मृत्यु के बाद महाराजा गंगा सिंह जी  बीकानेर राज्य के सिंहासन पर विराजे। महाराजा गंगा सिंह का जन्म सन्‌ 1880 की 3 अक्टूबर को हुआ था। आप राठौड़ राजपूत थे तथा स्वर्गीय महाराजा डूंगरसिंह जी के ग्रहीत पुत्र थे। महाराजा गंगा सिंह तथा स्वर्गीय महाराजा भाई भाई थे। आप महाराज लाल सिंह के पुत्र थे। सन्‌ 1887 की 31 वीं अगस्त को महाराजा गंगा सिंह जी बीकानेर राज्य की गद्दी पर बैठे। उस समय आप नाबालिग थे, अतएवं आपको शासनाधिकार प्राप्त न हुए। महाराजा गंगा सिंह का इतिहास और जीवन परिचय बाद में बालिग हो जाने पर सन्‌ 1898 की 16 दिसम्बर को आप सम्पूर्ण अधिकारों से सम्पन्न हुए। आपके शासन-भार गृह करने के कुछ ही दिनों पश्चात्‌ राज्य भर में भयंकर अकाल पड़ा। इस समय आपने अपनी प्रजा को अकाल से बचाने के लिये बहुत कोशिश की, जिसके पुरस्कार में आपको ब्रिटिश सरकार की ओर से प्रथम श्रेणी के केसर ए-हिन्द का सम्मान मिला। सन्‌ 1902 की 14 जून को आप इन्डियन आर्मी के ऑनरेरी मेजर के पद पर नियुक्त हुए। महाराजा गंगा सिंह का विवाह प्रतापगढ़ के महाराजा साहिब की कन्या के साथ हुआ था। सन्‌ 1900 के अगस्त मास म...