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कोल्लम पर्यटन स्थल - कोल्लम के टॉप 15 दर्शनीय स्थल

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कोल्लम, केरल राज्य का जिला मुख्यालय और एक प्रसिद्ध शहर है। कोल्लम वह जगह है जो देश के काजू व्यापार और मसाला उद्योग का केंद्र बनने का श्रेय लेती है। कोल्लम पर्यटन की दृष्टि से भी बहुत सुंदर और महत्वपूर्ण जगह है। कोल्लम अरब सागर के तट पर बसा है, जो इसकी खूबसूरती का एक मुख्य कारण है। समुद्री तटीय शहर होने के कारण कोल्लम मे बीच और वनस्पतियों की अधिकता है। कोल्लम के बीच पुरी दुनिया मे प्रसिद्ध है। जो अपनी खूबसूरती और शांत वातावरण के लिए जाने जाते है।     कोल्लम को मालाबार तट पर सबसे पुराने बंदरगाहों में से एक माना जाता है और यह लंबे समय से अंतरराष्ट्रीय देशों को आकर्षण को आकर्षित कर रहा है। शहर मध्ययुगीन और आधुनिक युग में अग्रणी मसाला बाजार के रूप में कार्य करता है। माना जाता है कि कोल्लम की जगह का नाम संस्कृत शब्द कोल्लम अर्थात् काली मिर्च से लिया गया है। यह भी माना जाता है कि वर्तमान शहर क्षेत्र 9वीं शताब्दी में एक सीरियाई व्यापारी, सैपीर इसो द्वारा बनाया गया था।       कोल्लम अरब तट पर एक पुराना समुद्री बंदरगाह शहर है, जो अष्टमुडी झील पर खड़ा है। प्राचीन काल में, क...

एर्नाकुलम पर्यटन स्थल - कोच्चि पर्यटन स्थल - कोचीन पर्यटन

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एर्नाकुलम केरल राज्य का जिला और एक आधुनिक शहर है। एर्नाकुलम को कोचीन या कोच्चि के नाम से भी जाना जाता है। क्योंकि पुराने कोच्चि बंदरगाह शहर को कोचीन या कोच्चि कहा जाता है। और कोच्चि से बाहर बसे आधुनिक शहर को एर्नाकुलम कहा जाता है। यह एक ऐसा आधुनिक शहर है, जहां शॉपिंग मार्केट, सिनेमा परिसरों, औद्योगिक भवन, मनोरंजन पार्क, समुद्री ड्राइव इत्यादि स्थित हैं। यह केरल का वाणिज्यिक और आईटी हब भी है। एर्नाकुलम पर्यटन के क्षेत्र मे भी केरल का महत्वपूर्ण जिला है।     प्राचीन समय से, अरब, चीनी, डच, ब्रिटिश और पुर्तगाली समुद्री यात्रियों ने कोच्चि के समुद्र मार्ग का पालन किया और शहर पर अपनी छाप छोड़ी। चीनी मछली पकड़ने की जाल बैकवाटर, यहूदी सिनेगॉग, डच पैलेस, बोलघाटी पैलेस और कोच्चि में पुर्तगाली वास्तुकला की जिती जागती तस्वीर है, जो केरल की ऐतिहासिक विरासत को समृद्ध करती है।     प्रारंभ में, कोच्चि एक अस्पष्ट मछली पकड़ने वाला गांव था। जो बाद में भारत में पहला यूरोपीय शहर बन गया। इस शहर को पुर्तगाली, डच और बाद में अंग्रेजों द्वारा आकार दिया गया था। जिसका सांस्कृतिक प्रभावों का नतीज...

अलेप्पी पर्यटन स्थल - अलप्पुझा के टॉप 14 दर्शनीय स्थल

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त्रिवेंद्रम से 152 किमी और कोच्चि से 63 किमी की दूरी पर, अलप्पुझा केरल में बैकवॉटर और बीच के मिश्रण के साथ एक शानदार गंतव्य है। आलप्पुषा को अलेप्पी के नाम से भी जाना जाता है, जो वेम्बनाद झील के किनारे अरब सागर के तट पर स्थित है। यह आलप्पुझा जिले का प्रशासनिक मुख्यालय है, और केरल के 6 सबसे बड़े शहरो मे से है। यह कोच्चि और त्रिवेंद्रम के आदर्श सप्ताहांत गेटवे में से एक है, और अलेप्पी पर्यटन की दृष्टि से केरल के प्रमुख पर्यटन स्थलों में से एक है।   कुमारकोम के साथ, आलप्पुषा केरल के बैकवाटर के सबसे प्रसिद्ध गंतव्य में से एक है। इन बैकवाटर में एक हाउसबोट क्रूज एक सुखद अनुभव है। यह कुमारकोम और कोचीन को उत्तर में और कोल्लम को दक्षिण में जोड़ता है। हरे धान के खेतों के साथ साथ कभी-कभी खत्म होने वाले पैनोरमा,नारियल के ऊंचे पेड़, पानी को कम करने और आलप्पुषा के चारों ओर लंबे नहरों को एक सुखद गंतव्य बनाते हैं। इसे लोकप्रिय रूप से ‘वेनिस ऑफ़ द ईस्ट’ के नाम से जाना जाता है। आलप्पुषा – कुमारकोम, अलेप्पी – कोट्टायम, एलेप्पी – पाथिरमानल द्वीप, और अलेप्पी – कुमारको...

केरल की वेषभूषा - केरल का पहनावा

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प्रत्येक प्रदेश की भोगोलिक स्थिति और आबोहवा का प्रभाव उस प्रदेश के अधिवाधियों के रहन-सहन, वेशभूषा, खानपान तथा सामान्य सभ्यता पर अनिवार्य रूप से पड़ता है।  केरल की पहाड़ी भूमि समुद्र के किनारे उष्ण मेखला में स्थित है। यहां हर साल अक्सर छः महीने बराबर पानी बरसता रहता है। इस प्रदेश में कभी पानी का अभाव या कमी नहीं होती। इसलिए यहां की उपजाऊ भूमि सदेव पेड़-पौधों से हरी-भरी रहती है। हर कहीं हरियाली दिखती है मानों प्रकृति-रमणी स्वयं हरे रंग की रेशमी किनारेदार सुन्दर साड़ी में आवेष्टित होकर सब को अपनी ओर आकर्षित कर रही हो। इस वेभव पूर्ण प्रकृति की सुखद गोद में विहार करने वाले केरल के लोगों पर बदलती हुई ऋतुओं का विशेष प्रभाव नहीं पड़ता। वे कभी कड़ी शीत या गर्मी के शिकार नहीं होते । इसलिए वे अपने को प्रकृति-माता के हरे आंचल में क्रीड़ा करने वाले अबोध बालकों की भाँति अद्ध-नग्न रखने में कोई आपत्ति नहीं मानते हैं। इतना ही नहीं, केरल के स्वच्छ जल में सायं-प्रातः स्नान करके स्वयं सुन्दर और साफ़ रहना वे आवश्यक और अनिवार्य समझते हैं। इसी कारण केरल के लोग अन्य प्रदेशों के लोगों की अपेक्षा स्तान-प्र...

केरल का भोजन - केरल का खानपान

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केरल  के उपजाऊ खेतों में धान बहुत पैदा होता है। अतः केरल के लोग ज़्यादा चावल या भात ही खाते हैं। गेहूं बहुत कम लोग खाते हैं। यहां नदी, झीलों ओर तालाबों में मछलियां खूब पायी जाती हैं। इसलिए मछली भी अधिकांश लोगों का मुख्य भोजन हैं। लोग भात के साथ कई तरह की स्वादिष्ट तरकारियां तथा शाक- भाजियां लेते हैं। नारियल की गरी ओर नारियल के तेल से भोजन बनाना यहां के लोग बहुत पसन्द करते है।   केरल का भोजन – केरल का खाना   केरल के व्यंजन साधारणत: भोजन के लिये केरल के लोग कालन्‌, ओलन्‌ , आवियल, साम्बार, कट्टुकरी, एरिश्शेरी, आदि कई प्रकार के व्यंजन बनाते हैं। ये सभी चीज़ें अपने ढंग की निराली होती हैं। इनके बनाने के तरीके भी अलग-अलग हैं। केरल नारियल की भूमि हैं। अतः केरलीय व्यंजनों में नारियल का अनिवार्य योग रहता है। उबाले हुए खट्टे दही के साथ नमक, काली मिर्च, नारियल आदि अच्छी तरह पीसकर मिला देते हैं ओर केले तथा जमींकंद के छोटे टुकड़ों के साथ पकाकर कालन्‌ बनाते हैं जो कढ़ी जैसा होता हैं। कालन्‌ का महत्व उसके अधिक से अधिक गाढ़ा होने में माना जाता है। कुम्हड़ा, बैंगन, कदृदू, आलू आदि के छोटे-छ...

केरल की भाषा - मलयालम भाषा का इतिहास

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केरल के अधिकांश लोगों की मातृभाषा मलयालम है। मलयालम को अपनी जन्मभूमि के नाम के आधार पर कई लोग केरली भाषा भी कहते हैं। यद्यपि केरली भाषा अपनी बड़ी बहन तमिल भाषा के बराबर अत्यधिक पुरानी अथवा प्राचीनतम भाषा नहीं मानी जाती है और उसका स्वतंत्र अस्तित्व केवल 900 ई० के करीब ही साबित किया जा सकता है, तो भी उसका व्याकरण और शब्द- समूह तमिल की अपेक्षा अधिक वैज्ञानिक एवं सर्वागसंपूर्ण हैं। दक्षिण भारत की प्राचीन द्राविड़-भाषा के कुल में जन्म लेने पर भी मलयालम पर अपनी जननी की अपेक्षा धात्री ‘संस्कृत-भाषा’ का बहुत अधिक प्रभाव दिखाई पड़ता हैं। प्राचीन मलयालम में भी उत्तर भारत की कई प्रमुख भाषाओं की तरह संस्कृत के सैकड़ों शब्द अपने तत्सम ओर तद्भव रूपों में पाये जाते हैं ।     केरल की भाषा का परिचय – मलयालम भाषा का इतिहास   भाषा-विज्ञान के विद्वानों के बीच में मलयालम भाषा की उत्पत्ति के सम्बन्ध में प्रधानतः दो प्रकार के मत प्रचलित हैं। एक मत यह है कि प्राचीन काल में मलयालम नामक कोई भाषा नहीं थी ओर उन दिनों केरल में प्रचलित भाषा का नाम “मलयामतमिल” था, जिससे यही मानना पड़ता है कि मलयालम तमि...

कथकली नृत्य - कथक नृत्य की वेशभूषा उत्पत्ति और इतिहास

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भारत  का केरल राज्य अपनी विविध कलाओं की वजह से दुनिया में बहुत मशहूर हुआ है। उन कलाओं में कथकली का स्थान सबसे प्रथम कहा जा सकता हैं। कथकली एक विशिष्ट नृत्य कलात्मक नाटकाभिनय प्रणाली हैं। इसे कथक नृत्य के नाम से भी जाना जाता है, इसमें अभिनय, नृत्य और संगीत इन तीनों का सुन्दर समावेश है। यह एक प्रकार की संवाद-शून्य एवं अभिनय-प्रधान नाटय कला है। यद्यपि इसको नाट्यकला के अन्तर्गत मानना ही पड़ता है, तो भी साधारण नाटकों की तरह कथकली में अभिनय करने वाले पात्र रंगमंच पर आकर एक दूसरे से वार्तालाप करने के लिए मौखिक एवं श्रव्य भाषा का उपयोग बिलकुल नहीं करते। वे गूंगों की तरह केवल सुख-मुद्राओं, हस्त-मुद्राओं और इशारों के सहारे अपने विचार और भाव एक दूसरे को समझा देने का प्रयत्न करते हैं। दर्शक लोग उन अभिनेताओं का अभिनय देखकर नाटक के प्रत्येक दृश्य की बातें समझ लेते हैं। कथक नृत्य के कलाकारों को नट कहते हैं। इन नटों के इशारों और मुख तथा हाथ के संकेतों का अध्ययन करने में दर्शकों को विशेष तत्पर रहना पड़ता है, तभी वे पूरी कथा ओर घटनाओं का व्यक्त परिचय पा सकेंगे। बहू विचित्रता ही कथकली की सबसे बड़ी वि...