लालमोहन घोष का जीवन परिचय हिन्दी में
लालमोहन घोष कांग्रेस के मंच पर तो पहले-पहल छठे अधिवेशन ( कलकत्ता, 1890 ) में आये, जब कि आपने ब्रैडला साहब के भारत-सरकार-सम्बन्धी बिल पर प्रस्ताव उपस्थित किया था, किन्तु देश के लिए आप कांग्रेस के निर्माण से पहले से ही काम कर रहे थे। उससे पहले दो बार देश के मिशन पर ओर एक बार पार्लियामेंट की सदस्यता के लिए आप इंग्लैंड के चक्कर भी लगा चुके थे, जिसमें दो बार तो भारत लौटने पर भारतीय जनता की ओर से सार्वजनिक सम्मान करके आपका आभार माना गया था ओर तीसरी बार जिस निर्वाचन-क्षेत्र से पार्लियामेंट की सदस्यता के लिए उम्मीदवार हुए थे उसके निर्वाचकों ने वहां से भारत के लिए, विदा होते समय आपको मानपत्र दिया था।
लालमोहन घोष का जीवन परिचय हिन्दी में
लालमोहन घोष का जन्म 17 दिसम्बर 1849 को कृष्णनगर ( बंगाल ) में हुआ था। आपके पिता रायबहादुर रामलोचन घोष ढाका-कालेज के संस्थापकों में से एक थे और बंगाल के न्याय-विभाग में तरक्क़ी करते हुए ख़ास सदर अमीन के औहदे तक जा पहुँच थे। लालमोहन घोष की प्रारम्भिक शिक्षा कलकत्ता में हुई और कलकत्ता यूनिवर्सिटी की एण्ट्रेन्स ( मेट्रिक ) परीक्षा में आप सारे प्रान्त में प्रथम रहे। 1869 में बड़े भाई ने बेरिस्टरी के लिए आपको इंग्लैंड भेजा, जहां से 1873 में बेरिस्टर होकर लौटे और कलकत्ता में बेरिस्टरी करने लगे।
लालमोहन घोष के सार्वजनिक जीवन का प्रारम्भ इंडियन सिविल सर्विस और उसकी परीक्षा के सिलसिले में उठे आन्दोलन से हुआ, जिसे नव-निर्मित इंडियन एसोसियेशन के मंत्री की हैसियत से श्री सुरेंद्रनाथ बनर्जी ने शुरू किया था। उसके सम्बन्ध में भारतीय विचारों को ब्रिटिश जनता तक पहुंचाने के लिए एक प्रतिनिधि की आवश्यकता थी, आपके रूप में वह मिल गया। 1879 में, पार्लियामेंट में पेश करने के लिए ढेरियों दरख्वास्तों के आवेदनपत्र के साथ, आप इंग्लैंड पहुंचे। अपनी योग्यता और अपने कौशल से आपने सुप्रसिद्ध जॉन ब्राइट का सहयोग एवं सहानुभूति प्राप्त की और इंग्लैंड की सभाओं में भाषण देने शरू किये। पहला भाषण जॉन ओइट की अध्यक्षता में लन्दन के विलीज़रूम में दिया, जिसका इतना असर पड़ा कि चौबीस घंटे के अन्दर-अन्दर तत्कालीन सरकार ने सिविल-सर्विस का विधान तैयार करके उपस्थित कर दिया। इस सफलता के लिए वापसी पर, 4 मार्च 1880 को कलकत्ता में आपका उत्साह-पूर्ण स्वागत हुआ और श्री क्रिस्तोदास पाल की अध्यक्षता में सभा करके सार्वजनिक रूप से देशवासियों की ओर से आपको धन्यवाद देने का प्रस्ताव पास हुआ।

उसके कुछ ही महीने बाद, भारत की आवश्यकतायें ब्रिटिश जनता के समक्ष उपस्थित करने के लिए आपको फिर इंग्लैंड जाना पड़ा। उस समय आदिम जातियों की संरक्षक संस्था के वार्षिकोत्सव पर, 19 मई 1880 को, आपने एक बहुत महत्वपूर्ण भाषण दिया। जुलू-नरेश के प्रति ब्रिटिश सरकार की नीति की आलोचना करते हुए आपने कहा कि “विचारणीय विषय के पक्ष-विपक्ष में अपना कोई स्वार्थ न हो तब तो अंग्रेज़ बड़े अच्छे न्यायाधीश साबित होते हैं, पर जब इससे अन्यथा हो तो वे भी दूसरे मनुष्यों की ही तरह कमजोरियो से भरे हुए हैं। इसीलिए इंग्लैंड के कानून में यह आदर्श रखा गया है कि अपने मामले में स्वयं कोई अपना न्यायाधीश न बने। ”
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नवम्बर 1880 की शुरुआत में इस काम को निपटाकर आप हिन्दुस्तान लौटे, जबकि बम्बई के कावसजी इंस्टीट्यूट में माननीय माण्डलिक की अध्यक्षता में सभा करके आपका अभिनन्दन किया गया। बस, इसी समय से लालमोहन घोष ने भारत के राजनैतिक प्रश्नों में प्रमुख रूप से भाग लेना शुरू किया। 1883 में इलबर्ट-बिल के विरुद्ध उठे आन्दोलन में आपका जैसा शानदार भाषण
हुआ, कहते हैं, वैसा योग्यतापूर्ण और शानदार राजनैतिक भाषण पिछले पचास वर्षों में कोई नहीं हुआ। उसके कुछ मास बाद आप फिर इंग्लैंड गये। इस बार पार्लियामेंट के सदस्य बनने का आपका इरादा था। वहां अनेक लिबरल राजनीतिज्ञ आपसे बहुत प्रभावित हुए और कई निर्वाचन क्षेत्रों ने आपको अपने यहां से खड़ा करना चाहा। आखिर डेप्टफ़ोर्ड से आप खड़े हुए, लेकिन होमरूल बिल ओर लिबरल होने के कारण आयलैंड वालों के वोटों से आप वंचित रह गये और दो बार कोशिश करने पर भी असफल रहे। इस प्रकार चुने तो नहीं गये, फिर भी डेप्टफ़ोर्ड वालों ने आपकी प्रशंसा की और आपको एक शानदार मानपत्र दिया, जो सार्वजनिक रूप से लार्ड रिपन के हाथों आपको भेंट किया गया था। 1884 के अंत में आप हिन्दुस्तान लौट आये और फिर कलकत्ता में बेरिस्टरी करने लगे। 1892 के नये सुधारों की कौंसिल में प्रान्त के म्यूनिसिपल समूह के प्रतिनिधि होकर निर्वाचित हुए। कौंसिल में आपने सर चाल्स ईलियट के जूरी-नोटिफ़िकेशन पर इतना महत्वपूर्ण भाषण दिया, कि उसको उठा ही लिया गया।
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कांग्रेस के मंच पर कलकत्ता में 1890 में हुए छठे अधिवेशन में आये और मद्रास में 1903 में हुए उन्नीसवें अधिवेशन में राष्ट्र ने लालमोहन घोष को सभापति-पद का सम्मान प्रदान किया। इस अवसर पर आपने जो भाषण दिया था वह बहुत विद्वधत्तापूर्ण था और अबतक उसको कांग्रेस के योग्यतम भाषणों में माना जाता है। वक्ता के ही रूप में आप विख्यात भी बहुत हुए हैं। यहां तक कि जॉन ब्राइट और रोज़बरी जैसे वक्ताओं की उपस्थिति में अंग्रेंज़ों की सभाओं में आपने भाषण दिये ओर उन सभी ने आपकी सराहना की। ब्रिटिश साम्राज्य अन्तर्गत एक उपनिवेश के एक विख्यात प्रधानमंत्री ने तो आपका भाषण सुन कर आश्चर्य के साथ कहा था–यह काला आदमी, मि० घोष बोलता तो बहुत बढ़िया है। साफ़-सीधी और विषयानुकूल बात कहता है; और कौन-सी बात कहां ख़तम करनी चाहिए, यह बखूबी जानता है।” सन् 1909 में कलकत्ता में लालमोहन घोष का स्वर्गवास हुआ।
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