नारायण गणेश चंदावरकर का जीवन परिचय हिन्दी में

सर नारायण गणेश चंदावरकर का जन्म उत्तरी कर्नाटक के हनोवर शहर में रहने वाले एक संभ्रान्त परिवार में 1855 में हुआ था। अपने शहर और जिले के स्कूलों में कुछ साल पढ़ने के बाद 1869 में वह बम्बई चले गये और 1873 में एलर्फिस्टन कालेज में भर्ती हो गये। अपनी प्रतिभा और योग्यता के कारण वहां के प्रोफ़ेसर के कृपा पात्र होने में आपको अधिक समय नहीं लगा। समाज सुधार, देश-भक्ति, सार्वजनिक सेवा आदि की भावना आपके हृदय में कालेज जीवन में ही पैदा हो चुकी थी।

 

नारायण गणेश चंदावरकर का जीवन परिचय हिन्दी में

 

सन् 1877 में बी० ए० पास करके आप“इन्दुप्रकाश” के अंग्रेज़ी कालमों का सम्पादन करने लगे। दो साल बाद सम्पादन छोड़कर आपने कानून पढ़ना शुरू किया और 1881 में वकालत की परीक्षा दी। हाईकोर्ट में आपकी प्रतिभा खूब चमकी और शीघ्र ही ऊंची कोटि के वकीलों में गिने जाने लगे। वकालत के साथ ही सार्वजनिक जीवन में आपका प्रवेश हुआ। नारायण गणेश चंदावरकर को सार्वजनिक जीवन में आए थोड़ा ही समय हुआ था। उन दिनों की परिपाटी के अनुसार जब 1885 में पार्लिमेन्ट के चुनाव के समय इंग्लैंड की जनता के सामने भारतीय समस्याओं को रखने के लिए यहां से एक डेपुटेशन जाने लगा, तब आपसे भी उसमें जाने का आग्रह किया गया। इंग्लैंड में ह्रदयस्पर्शी और विवेचनापूर्ण भाषणों के कारण आपने खूब प्रभाव पैदा किया।

 

इंग्लैंड  से लौटकर कांग्रेस के पहले अधिवेशन में सम्मिलित हुए। उसके बाद तेरह वर्षों तक आप निरन्तर सार्वजनिक सेवा के विविध क्षेत्रों में लगन और उत्साह के साथ काम करते रहे। समाज-सुधार, शिक्षा और साहित्य में आप विशेष दिलचस्पी रखते थे। 1897 में आप यूनिवर्सिटी की ओर से बम्बई कौन्सिल के सदस्य चुने गये। कौन्सिल में भी समाज-सुधार तथा अन्य उपयोगी सार्वजनिक विषयों में आप विशेष रूचि दिखाते रहे। सन् 1900 में राष्ट्र ने नारायण गणेश चंदावरकर को वह ऊंचे से ऊंचा सम्मान दिया, जो वह दे सकता था। और आपको भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का अध्यक्ष नियुक्त किया गया।

 

नारायण गणेश चंदावरकर
नारायण गणेश चंदावरकर

 

लाहौर में होने वाली कांग्रेस के सभापति पद से दिया गया आपका भाषण आपकी योग्यता और देश-भक्ति का अच्छा परिचायक है। जनवरी 1901 में आपको हाईकोर्ट का स्थानापन्न जज नियुक्त किया गया। श्री रानाडे के देहान्त के बाद स्थायी तौर पर नियुक्त कर दिये गये। 1909 में आपने स्थानापन्न चीफ़ जस्टिस का काम भी किया। 1910 में नारायण गणेश चंदावरकर को सरकार ने ‘सर” की उपाधि दी। 1912 तक आप हाईकोर्ट के जज रहे। जजी के काल में आपने अपनी न्याय-बुद्धि, सूक्ष्म दृष्टि और सह्रदयता से सरकार व जनता दोनों में ख्याति प्राप्त की। इसके बाद आप कुछ समय तक इन्दौर के प्रधान मंत्री के पद पर रहे।

 

सरकारी पदो पर इतने दीर्घकाल तक काम करने के बाद भी आपकी स्पष्टवादिता और देश-भक्ति में किसी तरह की कमी न आई। 1917 में जब मांटेगू भारत आये, तब कांग्रेस लीग योजना के समर्थन में आपने एक बहुत विद्वत्तापूर्ण आवेदन-पत्र तैयार किया। भारत के शासन में सुधारों के आप दृढ़ पक्षपाती थे। श्रीमती ऐनी बेसेंट की गिरफ्तारी के विरुद्ध आपने जोरदार आवाज उठाई थी। फिर कुछ समय तक आप नरमदल की राजनीति में दिलचस्पी लेते रहे। जब गांधी जी 1919 में सत्याग्रह शुरू करने लगे थे, तब आपने उन्हें इतना उग्र क़दम उठाने से रोका था। जीवनी की अन्तिम घड़ी तक आप बम्बई के सार्वजनिक जीवन में कुछ न कुछ भाग लेते रहे। मई 1923 में बंगलौर में, जहां आप स्वास्थ्य-सुधार के लिए गये हुए थे,हृदय की गति बन्द हो जाने से नारायण गणेश चंदावरकर का देहान्त हो गया।

 

देश के प्रति योगदान

सर नारायण गणेश चंदावरकर की सार्वजनिक सेवायें भले ही जज बना दिये जाने से कांग्रेस के साथ बहुत समय तक सम्बन्धित न रह सकीं, लेकिन वे अगणित थीं। समाज-सुधार और शिक्षा के क्षेत्र में आपने बहुत काम किया। महाराष्ट्र में उन दिनों समाज-सुधार का प्रश्न बहुत महत्वपूर्ण था। आप न्यायमूर्ति गोविन्द महादेव रानाडे के इस विचार से सहमत थे कि राजनीतिक सुधारों से पहले समाज-सुधार की आवश्यकता है।

 

प्राथना-समाज के आप वर्षों प्रमुख कार्यकता रहे। सरकार को सामाजिक कुरीतियां दूर करने के लिए क़ानून का आश्रय लेना चाहिए, इसका आप हमेशा समर्थन करते रहे। शिक्षा के कार्यों में विशेष रुचि लेने के कारण बम्बई यूनिवर्सिटी के आप वाइस चांसलर बनाये गये थे। विद्यार्थियों से आपको विशेष प्रेम था। बरसों वे ‘स्टूडेंटस्‌ बद्ररहुड’ के प्रधान रहे। विद्यार्थियों के चरित्र निर्माण की ओर आप विशेष ध्यान देते थे। 1902 में लार्ड कर्जन ने नारायण गणेश चंदावरकर को शिक्षा कमीशन का सदस्य नियुक्त किया था।

 

मनुष्य समाज की सेवा, चाहे वह किसी भी मार्ग से हो, आपका प्रिय विषय था। इसीलिए हम उन्हें कभी नर्सिंग एसोशिएशन में पाते हैं, तो कभी जीव-दया-प्रचारिणी या शिशु-संवर्धिनी में और कभी कौंसिल या कोरपोरेशन में प्रजा की जीवनोपयोगी समस्याओं के लिए आन्दोलन करते हुए पाते हैं। यही कारण है कि जहां एक ओर आप सरकार द्वारा हाईकोर्ट की जजी ओर यूनिवर्सिटी की वायस चांसलरी पाते हैं, वहां दूसरी ओर जनता द्वारा अध्यक्ष पद पर आपका अभिषेक किया जाता है।

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